नहीं मनाते चोवटिया जोशी होली, पुष्करणा समाज की एक जाति के लिए शोक का विषय है होली।
1 Mar
2007
सैंकडों साल पहले जब होली का दहन किया जा रहा था उस समय इसी जोशी जाति की एक महिला अपने एक बच्चे को गोद में लेकर होली की परिक्रमा कर रही थी। कहते हैं कि यह बच्चा अचानक ही महिला की गोद में से छुटकर जलती हुई होली में जा गिरा।
पुष्करणा ब्राह्मणों में कईं रीति रिवाज प्रचलित है। ब्राह्मणों का यह समाज आज पूरी दुनिया में फैला है। इस समाज की एक जाति है जोशी। जहाँ पूरी दुनिया के लिए होली उल्लास व मस्ती का त्यौंहार है वहीं पुष्करणा समाज की जोशी जाति के लिए होली शोक का त्यौंहार है। होलकाष्टक शुरू होते ही जोशी जाति के घरों में खाना बनना बंद हो जाता है। इस जाति के लोग इन दिनों में अपने घर में तडका य छौंक नहीं लगाते। इस जाति के होली का त्यौंहार गम का त्यौंहार है। ऐसा क्यों होता है इसके पीछे एक कहानी है। इस कहानी के अनुसार आज से सैंकडों साल पहले जब होली का दहन किया जा रहा था उस समय इसी जोशी जाति की एक महिला अपने एक बच्चे को गोद में लेकर होली की परिक्रमा कर रही थी। कहते हैं कि यह बच्चा अचानक ही महिला की गोद में से छुटकर जलती हुई होली में जा गिरा। अपने बच्चे को बचाने के लिए यह महिला भी जलती होली में कूद गई। इस सारे प्रकरण को देख रहा परिवार का आदमी भी इस जलती होली में जा कूदा। इस सारे प्रकरण में इन तीनों की मौत हो गई। कहते ह फिर यह महिला सती के रूप में पूजी जाने लगी और इसी महिला ने जोशी जाति को होली मनाने से मना कर दिया। इस तरह सैंकडों सालों से होली का यह त्यौंहार पुष्करणा समाज की जोशी जाति के लिए शोक का त्यौंहार बन गया। कहते हैं कि जब भी इस जोशी जाति में होली के दिन पुत्र पैदा होगा और वह एक साल जिंदा रहेगा और उसे होली की परिक्रमा निकलवाई जाएगी तब से जोशी जाति होली मनाना शुरू कर देगी। सैंकडों सालों से जोशी जाति को इंतजार है उस देवदूत का जो होली के पैदा हो और शोक के इस त्यौंहार को खुशी में बदल दें। जब होली का दहन होता है तो जोधपुर, पोकरण, में यह पूरी तरह से घोंषणा की जाती है कि अगर कोई जोशी यहां है तो वह अपने घर में चला जाए। होली के इस त्यौंहार में जब जोशियों के यहां खाना नहीं बनता तो उनके रिश्तेदार व सगे संबंधी उनके यहां खाना भेजते हैं और उनके उनके खाने पीने का प्रबंध करते हैं। तो यह है भारत और भारत की संस्कृति का एक रूप।
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