बांसवाडा, एक जुलाई/ बांसवाडा के जिला प्रमुख एवं प्रमुख आदिवासी नेता महेन्द्रजीतसिंह मालविया ने बेणेश्वर पीठाधीश्वर के गृहस्थाश्रम अंगीकार कर लेने को लेकर उपजे विवाद को निरर्थक बताया है और कहा है कि यह पर म्पराओं और धर्म-शास्त्र के अनुरूप है। उन्होंने प्राचीन पर म्पराओं, पुराणों और धर्मशास्त्रों के उद्घरण देते हुए स्पष्ट किया है कि महन्त द्वारा विवाह रचा लिया जाना गृहस्थ धर्म के सनातन मूल्यों और उ*चतम मानदण्डा ें भरी परम्पराओं को पुष्टि देता है। मालविया ने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक एवं धर्म-अध्यात्म पर म्पराओं में भगवान, ऋषि-मुनियों से लेकर गृहस्थ संतों का दीर्घकालीन इतिहास रहा है। संत परम्परा में गृहस्थ संतों की महत्ता सर्वोपरि रही ह ै जिन्हने संसार के भीतर रहकर अनासक्त जीवनयापन कर गृहस्थ धर्म का निर्वाह करते हुए जगत का परिपालन किया और ईश्वर से साक्षात्कार किया। ऐसे में गृहस्थ धर्म को हीन बताने और महन्त के विवाह को विवाद का विषय बनाना अनौचित्यपूर्ण है। जिला प्रमुख ने कहा कि संत मावजी महाराज, हरि मन्दिर तथा निष्कलंक स म्प्रदाय विशेष की परम्पराओं में विवाह की परम्परा रही है और इसके निषेध का कही कोई विधान नहीं है। इसके अलावा स्वयं मावजी की वाणी और चोपडों के हवाले से अर्से से यह श्रवण किया जाता रहा है कि पूर्ववर्ती पीठाधीश्वरों की तरह ही नवमी गादी गृहस्थी हो जाएगी। इसलिए यह विवाह प्रक्रिया पर म्पराओं के अनुरूप तथा मावजी महाराज की वाणी को सत्य सिद्घ करती है जिनके प्रति लाखों लोगों की अगाध श्रद्घा सदियों से रही है। मालविया ने श्रद्घालुओं से अपील की कि वे इस समूचे मामले में माव पर म्पराओं, गादी की मर्यादा और धर्म-संस्कृति की परिपाटियों को समझें तथा इसके अनुरूप आचरण करते हुए इस गादी के प्रति श्रद्घा और आस्था को बरकरार रख ते हुए सद् गृहस्थ के रूप में सकारात्मक चिन्तन और लोक मंगल की भावनाओं के साथ गृहस्थ संत के निर्देशन में जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति तथा पुण्यार्जन और ईश्वर आराधना के माध्यम से जीवन को सफलता दें। जिला प्रमुख ने कहा कि बेणेश्वर और संत मावजी महाराज की पर म्पराएं श्रद्घा और आस्था का सागर लहराती रही हैं और इस वजह से यह धर्म धाम और मावजी देश-दुनिया में प्रसिद्घ हैं। इस प्रसिद्घि को और अधिक बढाने तथा माव परम्पराओं के माध्यम से धर्म और अध्यात्म की भावना के व्यापक प *चार-प्रसार के लिए सभी वागडवासियों को खुले दिल से जुटने की आवश्यकता है। इसके साथ ही सामाजिक समरसता और सौहार्द को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सभी समाजों, संगठनों, संतों-महन्तों, मठाधीशों आदि को मिलजुल कर भागीदारी निभानी होगी।