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बनास का लोकार्पण

2 May 2008
विश्व पुस्तक मेले में आयोजित लोकार्पण समारोह में बिष्ट ने कहा कि बनास जैसी पत्रिकाओं का आना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वे लघु पत्रिका आंदोलन को नयी नयी दिशाओं में विस्तार देती हैं। उन्होंने राजस्थान से पूर्व में निकली अनेक लघु पत्रिकाओं को याद करते हुए कहा कि श्बनासश् इस परम्परा को और आगे ले जायेगी।
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Hindi Magazine from Chittaurgarh Banas Launched चित्तौडगढ, छोटे-छोटे शहरों से लघु पत्रिकाओं का अधिकाधिक प्रकाशन बेहद जरूरी है क्यों कि छोटे शहरों से निकल रही पत्रिकाएँ ही समकालीन यथार्थ की रचनात्मक अभिव्यक्ति करने में सक्षम हैं। उक्त विचार प्रसिद्ध कथाकार, संस्कृतिकर्मी एवं श्समयांतरश् के संपादक पंकज बिष्ट ने सम्भावना, चित्तौडगढ द्वारा प्रकाशित लघु पत्रिका श्बनासश् के लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए। नई दिल्ली में सम्पन्न विश्व पुस्तक मेले में आयोजित लोकार्पण समारोह में बिष्ट ने कहा कि बनास जैसी पत्रिकाओं का आना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वे लघु पत्रिका आंदोलन को नयी नयी दिशाओं में विस्तार देती हैं। उन्होंने राजस्थान से पूर्व में निकली अनेक लघु पत्रिकाओं को याद करते हुए कहा कि श्बनासश् इस परम्परा को और आगे ले जायेगी। श्बनासश् के सम्पादक पल्लव ने बताया कि प्रवेशांक हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कथाकार स्वयं प्रकाश पर केन्दि्रत किया गया है और अब आगे के अंकों में समकालीन रचनाशीलता की प्रभावी प्रस्तुति का प्रयास किया जाएगा।
 प्रसिद्ध समीक्षक और हंस के स्तम्भकार भारत भारद्वाज ने बनास के प्रवेशांक को स्वयं प्रकाश पर केंन्दि्रत करना उल्लेखनीय बताते हुए कहा कि स्वयं प्रकाश की कहानियाँ निम्न मध्यवर्गीय परिवार के छोटे कैनवास पर वैश्वीकरण के जाल में फंसे समाज के बडे चित्र उकेरने में सक्षम हैं। भारद्वाज ने सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए श्बनासश् के सम्पादक मण्डल को बधाई देते हुए कहा कि अब सामग्री की गुणवत्ता के साथ प्रस्तुतीकरण की सुन्दरता भी आवश्यक है। गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के डीन प्रो. अनूप बैनिवाल ने कहा कि श्बनासश् के प्रकाशन में दक्षिण राजस्थान की बंजर धरती को उर्वरा बना दिया है। प्रो. बैनिवाल ने कहा कि प्रवेशांक में प्रकाशित लेख कथा आलोचना की दृष्टि से अत्यंत पठनीय हैं जिनसे एक नयी बहस की शुरुआत सम्भव है। सुखाडया विश्वविद्यालय के डॉ. आशुतोष मोहन ने प्रवेशांक में प्रकाशित विभिन्न संस्मरणों और स्वयं प्रकाश के पत्रों की चर्चा की।
 आयोजन की अध्यक्षता कर रहे चर्चित कथाकार प्रेमपाल शर्मा ने लेखकों पर इस तरह के विशेषांकों को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे हिन्दी साहित्य की समृद्धि का अहसास होता है। शर्मा ने स्वयं प्रकाश की कहानी अशोक और रेनू की असली कहानीश् को विक्रम सेठ के उपन्यास श्ए सूटेबल ब्वॉयश् से अधिक मूल्यवान और भारतीय यथार्थ के करीब बताया। लोकार्पण समारोह में कर्मेन्दु शिशिर, कुमार मुकुल, डॉ. राजकुमार वर्मा, प्रो. सुधीर चौहान सहित अनेक युवा पाठक मौजूद थे। समारोह का संयोजन श्बनासश् के सह संपादक मिहिर ने किया और अंत में सम्पादन सहयोगी गजेन्द्र मीणा ने आभार व्यक्त किया।



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