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जनकवि हरीश भादाणी नही रहे
2 Oct 2009

साहित्य जगत मे शोक की लहर


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Pelagian e-Dictionary: Hindi to English and Enlgish Dictionary width=

बीकानेर, जनकवि के नाम से विख्यात हरीश भादाणी ने आज सुबह अपने निवास पर अंतिम सांस अपने सबसे छोटी पुत्री कविता व्यास के छबीली घाटी स्थित निवास पर ली। वे 76 वर्षीय के थे भादाणीजी अपने पीछे पत्नी एक पुत्र व तीन पुत्रियों सहित भरा पुरा परिवार छोड के गये है। उनके निधन से साहित्य जगत मे शोक की लहर छा गयी है जैसे ही भादाणीजी के निधन की सूचना मिलि निवास पर कवि, साहित्यकार, लेखक व शहर के गणमान्य व्यक्ति पहुंचे और उन्होने भादाणीजी श्रृद्वासूमन अर्पित किये। हरीशजी ने पिछले लम्बे समय से बीमार चल रहे थे और हाल ही उनका कोठारी मेडिकल हॉस्पिटल मे ऑपरेशन भी हुआ था जिसके बाद डॉक्टर्स ने उन्हे आराम करने की सलाह दी थी। भादाणीजी के अंतिम इच्छानुसार उन्होने देह दान की घोषणा की। पारिवारिक सुत्रो से मिलि जानकारी के अनुसार कल सुबह ९ बजे उनकी अंतिम यात्रा छबीलि घाटी से निकाली जायेगी जो कोटगेट, केइएम रोड, अलख सागर रोड होते हुए सरकार पटेल मेडिकल कॉलेज पहुंचेगी जहां उनके देह का दान किया जायेगा। उनके अंतिम दर्शन के लिए शव उनकी छोटी पुत्री के निवास पर रखा गया हे।

Famous Poet Jankavi Harish Bhadani Passes away स्व. हरीशजी भादाणी की निम्नलिखित पुस्तके उल्लेखनीयं रही अधूरे गीत (हिन्दी-राजस्थानी) 1959, सपन की गली (हिन्दी गीत कविताएँ) 1961 कलकत्ता, हँसिनी याद की (मुक्तक) सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर 1963, एक उजली नजर की सुई (गीत) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966 (दूसरा संस्करण-पंचशीलप्रकाशन, जयपुर), सुलगते पिण्ड (कविताएं) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966, नश्टो मोह (लम्बी कविता) धरती प्रकाशन बीकानेर 1981, सन्नाटे के शिलाखंड पर (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर1982, एक अकेला सूरज खेले (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1983 (दूसरा संस्करण-कलासनप्रकाशन, बीकानेर 2005), रोटी नाम सत है (जनगीत) कलम प्रकाशन, कलकत्ता 1982, सड़कवासी राम (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1985, आज की आंख का सिलसिला (कविताएं) कविता प्रकाशन,1985, विस्मय के अंशी है (ईशोपनिषद व संस्कृत कविताओं का गीत रूपान्तर) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1988, साथ चलें हम (काव्यनाटक) गाड़ोदिया प्रकाशन, बीकानेर 1992, पितृकल्प (लम्बी कविता) वैभव प्रकाशन, दिल्ली 1991 (दूसरा संस्करण-कलासन प्रकाशन, बीकानेर 2005), सयुजा सखाया (ईशोपनिषद, असवामीय सूत्र, अथर्वद, वनदेवी खंड की कविताओं का गीत रूपान्तर मदनलाल साह एजूकेशन सोसायटी, कलकत्ता 1998, मैं मेरा अष्टावक्र (लम्बी कविता) कलासान प्रकाशन बीकानेर 1999, क्यों करें प्रार्थना (कविताएं) कवि प्रकाशन, बीकानेर 2006, आड़ी तानें-सीधी तानें (चयनित गीत) कवि प्रकाशन बीकानेर 2006, अखिर जिज्ञासा (गद्य) भारत ग्रन्थ निकेतन, बीकानेर २००७

स्व. भादाणी की दो प्रसिद्ध कविताऐं:- 


2. रोटी नाम सत है

रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है

ऐरावत पर इंदर बैठे

बांट रहे टोपियां


झोलिया फैलाये लोग

भूग रहे सोटियां

वायदों की चूसणी से

छाले पड़े जीभ पर

रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है


रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है

बोले खाली पेट की

करोड़ क्रोड़ कूडियां

खाकी वरदी वाले भोपे

भरे हैं बंदूकियां

पाखंड के राज को

स्वाहा-स्वाहा होमदे

राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है


रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है

बाजरी के पिंड और

दाल की बैतरणी

थाली में परोसले

हथाली में परोसले


दाता जी के हाथ

मरोड़ कर परोसले

भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है


रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है



2. जिण हाथां आ रेत रचीजै से


बोलैनीं हेमाणी.....

जिण हाथां सूं

थें आ रेत रची है,

वां हाथां ई

म्हारै ऐड़ै उळझ्योड़ै उजाड़ में

कीं तो बीज देंवती!

थकी न थाकै

मांडै आखर,

ढाय-ढायती ई उगटावै

नूंवा अबोट,

कद सूं म्हारो

साव उघाड़ो औ तन

ईं माथै थूं

अ आ ई तो रेख देवती!

सांभ्या अतरा साज,

बिना साजिंदां

रागोळ्यां रंभावै,

वै गूंजां-अनुगूंजां

सूत्योड़ै अंतस नै जा झणकारै

सातूं नीं तो

एक सुरो

एकतारो ई तो थमा देंवती!

जिकै झरोखै

जा-जा झांकूं

दीखै सांप्रत नीलक

पण चारूं दिस

झलमल-झलमल

एकै सागै सात-सात रंग

इकरंगी कूंची ई

म्हारै मन तो फेर देंवती!

जिंयां घड़यो थें

विंयां घड़ीज्यो,

नीं आयो रच-रचणो

पण बूझण जोगो तो

राख्यो ई थें

भलै ई मत टीप

ओळियो म्हारो,

रै अणबोली

पण म्हारी रचणारी!

सैन-सैन में

इतरो ई समझादै-

कुण सै अणदीठै री बणी मारफत

राच्योड़ो राखै थूं

म्हारो जग ऐड़ो?



जनकवि हरीश भादाणी के बारे मे हरीवंशराय बच्चन की राय थी की कविताओं में विकास की दिशा अवश्य दिखाई देती है। उनका हृदय भावनापूर्ण है और नए पुराने दोनो ही माध्यमों से वे अपने को अभिव्यकत कर रहे है। घटनाओं और परिस्थितियों की प्रतिक्रिया तीव्रता के साथ उनके अन्तर से होती है और उतनी ही शीघ्रता के साथ उसे शब्दों में बांधने का प्रया भी करते है। किसी भी कवि की रचना में इन चीजों का पाया जान बहुत ही शुभ लक्षण है और उनकी संभावनाओं का परिचायक है।



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