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| 10 January 2009 |
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डूंगरपुर, ४ नवम्बर/ ‘‘ दीन धरम की बात चलें, धरम मेरा इन्सानी लिखना, जब भी मेरी कहानी लिखना नाम मेरा हिन्दुस्तानी लिखना ‘‘ हिन्दुस्तान के मशहुर कव्वाल असलम साबरी ने शुक्रवार रात्रिा में ऐतिहासिक गेपसागर झील की साक्षी में जब यह कलाम सुनाया तो शुक्ल पक्ष की रात में झील किनारे का माहौल देश भक्ति की रूमानियत से सराबोर हो उठा और वतन परस्ती की इस बंयानी पर हाजिर हजरात ने दिल खोलकर दाद लुटाई। यह शेर मशहूर मरूहूम शायर बिस्मिल नक्शबंदी की गजल का है। नक्शबंदी ने बांसवाडा जिले में उर्दू शायरी और साहित्य को नई ऊंचाईयां दी । डूंगरपुर स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में मनाये जा रहे वागड महोत्सव के रंगारंग सांस्कृतिक आयोजन की श्रृंखला के तहत शुक्रवार रात्रिा देश के मशहुर कव्वाल जनाब असलम साबरी ने ख्वाजा गरीब नवाज की शान में एवं कौमी एकता तथा अल्लाताला के प्रति मोहब्बत में े कलाम प्रस्तुत किए तो उपस्थित हजरात झूम उठे। उन्होंने प्रसिद्ध उर्दू शायर गालिब की गजले प्रस्तुत कर खूब वाहवाही लुटी। आरंभ में कव्वाल असलम’’ नैना मिला के मुझसे... नैना मिला के .....कलाम पर बडी देर तक श्रोता झूमते रहे और वाह वाह कहते रहे। लगभग एक घंटे तक अलसम साबरी ने अपने गुरु और शिष्य परम्परा का निर्वहन करते हुए जो कलाम पेंश किए तो उपस्थित हजरात झूमते ही रहे। उसके बाद असलम साबरी ने ख्वाजा गरीब नवाज की शान ए शौकत मे प्रस्तुत कव्वाली ‘‘ ये तो ख्वाजा का करम है , लेते ही नाम ख्वाजा का, तूफान टल गया, ख्वाजा की चौखट पर जो आया उसकी हर मुराद पुरी हुई, ये तो ख्वाजा करम है.... ‘‘ पर उपस्थित डूंगरपुरवासियों ने दिल खोल कर न केवल दाद दी बल्कि ख्वाजा के नाम पर प्रस्तुत हर कलाम पर एक के बाद एक कई लोगों ने नोटो की बरसात की । ख्वाजा साहब के सम्मान में पेश किए गए इस कलाम पर हर उम्र के श्रोताओं ने जमकर दाद दी और झूमते रहे। है मुमकिन नहीं कि ये दुनिया अपनी मस्ती छोड दे, हिन्दू काशी छोड दे, मुसलमां काबा छोड दे.....मैं न छोडुंगा तुम्हें, चाहे जमाना छोड दे कलाम के जरिये उन्होंने अपनी मौज की जिन्दगी के माने पेश किए । उन्हन गालिब की साफगोई को प्रस्तुत करने वाले शेरों पर काफी दाद पाई। .उन्होंने फैयाज लखनवी के शेर प्रस्तुत कर श्रोताओं को आकर्षित किया। देश के जाने माने कव्वाल असलम साबरी के साथ हारमोनियम पर अनवर जाफरी, बेन्जो पर निजाम साबरी, कोरस पर एजाज साहब एवं नाजीम साहब, तबला पर इम्तखाब साबरी व किफायत साबरी, ढोलक पर मुजफ्फर साबरी, की बोर्ड पर शेखर, ओक्टोपेड पर राहुल , हारमोनियम विट पर जफर साबरी ने सुमधुर संगत दी वही दिलकश गायकी के लिए मशहुर जीनत नियाजी व पूनम ढिल्लो ने कहकहों की पेशगी के साथ माहौल को खुशनुमा बनाया । कव्वाली के दौरान ही उन्होंने हिन्दुस्तान की गंगोजमनी तहजीब की सीख दी और फरमायां कि हमारा मुल्क सोने की चिडया कहा जाता था , यह सोना बेशकीमती गहनों के लिए इस्तेमाल होने वाला सोना नहीं बल्कि सारी दुनिया को इन्सानियत का सबक सिखाने वाली हमारी तहजीब ही रही है जिसकी सारी दुनिया कायल है। उन्होंने अपने अशआरों में कहा यह तहजीब ही हमारी तरक्की का निशानी है और जिस दिन यह तहजीब खो बैठेगे उस नुकसान की भरपाई कभी नहीं होगी। उन्होंने रिश्तों की रूमानियत, इश्कें हकीकत के बारे में भी तफ्सरा किया । कव्वाली में कलाम की पेशकश जहां झूमने को मजबूर करती रही वहीं अनवर जाफरी व जीनत नियाजी के बीच सवाल जवाबों का कव्वाली मुकाबला और उसमें महसूस होने वाली तकरार भी काबिले तारीफ रही। कव्वाली में जिला कलक्टर कुमारी मंजू राजपाल, जिला पुलिस अधीक्षक एन.एस.मौर्य, नगरपालिका अध्यक्ष शंकरसिंह सोलकी, उपाध्यक्ष के.के.गुप्ता, जनजाति परियोजना अधिकारी एवं वागड महोत्सव के प्रभारी अधिकारी टी.आर.जोशी सहित बडी संख्या में हजरात उपस्थित थे।
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