की दृष्टि से विविधता वाले राजस्थान में कृषि विकास को गति देना चुनौती माना जा सकता है परन्तु दृढ इच्छा शक्ति के साथ संकल्प हो, तो यह चुनौती अवसर में बदल जाती है।
जयपुर, ४ दिसम्बर, २००७ जलवायु की दृष्टि से विविधता वाले राजस्थान में कृषि विकास को गति देना चुनौती माना जा सकता है परन्तु दृढ इच्छा शक्ति के साथ संकल्प हो, तो यह चुनौती अवसर में बदल जाती है। गत चार वर्षों में इसी सोच को आगे बढाते हुए राज्य सरकार ने कृषि क्षेत्र को विविधता के साथ बहुआयामी बनाया। उत्पादकता बढाने के साथ वैज्ञानिक एवं वैश्विक व्यापार चुनौतियों के अनुरूप बनाने के लिए नीतिगत बदलाव के साथ ठोस व्यूहरचना पर काम शुरू किया।
मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे की सोच और दृष्टिकोण को आगे बढाते हुए कृषि आय में वृद्धि, जल संसाधन का बेहतर उपयोग, उपज का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए विपणन श्रृंखलाओं का सृजन, ग्रेडिंग, पैकिंग, मूल्य संवर्धन एवं निर्यात सुविधाओं का विकास जैसे ठोस कदम उठाये गये। राज्य सरकार ने कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए बजट में उत्तरोतर वृद्धि की। वर्ष २००३-०४ के ४३.५१ करोड के मुकाबले २००७-०८ में १२०.६९ करोड करोड रुपये का प्रावधान किया गया। इसी का परिणाम है कि वर्ष २००५-०६ में सरसों का ४३.८६ लाख मीट्रिक टन और वर्ष २००६-०७ में गेहूं का उत्पादन ७७.५६ लाख टन हुआ जो एक रिकार्ड है। नवाचारों ने दी नई दिशा
अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए कृषि क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता ही नहीं दी गई अपितु अनेक नवाचार भी सामने आये। किसान की आमदनी एवं रोजगार बढाने तथा कृषि एवं पशुपालन विकास की रणनीति बनाने के लिए राष्ट्रीय कृषि आयोग के अध्यक्ष एवं विश्व विख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में टास्क फोर्स का गठन किया गया। इस टास्क फोर्स के अधीन छह अलग-अलग समूह बनाये गये हैं। इस समूह की पहली रिपोर्ट प्राप्त हो गई जिस पर कार्यवाही की जा रही है। टास्क फोर्स की सिफारिश पर अमल करते हुए राज्य किसान आयोग का गठन किया गया है। राजस्थान आयोग गठित करने वाला देश का दूसरा प्रदेश है। उत्पादकता वृद्धि के सार्थक प्रयास फसल विशेष की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि एवं लागत में कमी लाने के लिए जिलेवार विशिष्ट परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। भरतपुर, नागौर, जयपुर, सीकर में सरसों एवं जौ, बीस जिलों में दलहनी फसलें, कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड में सोयाबीन के उत्पादन में वृद्धि के लिए लक्षित कार्यक्रम चलाया गया। रबी २००७-०८ में गेहूं में टारगेट ३०+ बीज प्रतिस्थापन दर बढाने के लिए अभियान प्रारंभ किया गया है।
अब तक कृषि विश्वविद्यालयों की अनुशंषाओं के आधार पर दस कृषि जलवायविक क्षेत्र के आधार पर पैकेज ऑफ प्रैक्टिस बनती थी। इसे अधिक सुसंगत बनाने के लिए छोटे क्षेत्रें के लिए अब ५९ कृषि पारिस्थितिकी स्थितिवार पैकेज ऑफ प्रेक्टिस विकसित रबी २००७-०८ से इसकी शुरूआत की जा रही है। जल संरक्षण पर अधिक जोर राज्य में जल की कमी को देखते हुए लोगों में संरक्षण एवं सदुपयोग की चेतना जाग्रत करने के लिए प्रदेश भर में किसान महोत्सव- जल चेतना यात्र निकाली गयी। प्रत्येक ग्राम पंचायत में आयोजित महोत्सव में खेती बाडी की समस्याओं के साथ-साथ फसलों में उत्पादकता वृद्धि, गुणवत्ता सुधार, लागत में कमी, फसलोत्तर प्रबन्ध, फार्म प्लान आदि पर चर्चा की गई। प्रदेश की ९ हजार १८९ ग्राम पंचायतों में किसान महोत्सवों में ५९.२३ लाख किसानों ने भाग लिया।
इसी तरह खरीफ २००७ से पूर्व विभिन्न कृषि योजनाओं से कृषकों को लाभान्वित करने के लिए ११ से २० जून २००७ तक ग्राम पंचायत स्तर पर ९ हजार १८३ विशेष शिविर लगाये गये। इनमें कृषकों को उन्नत तकनीकी की जानकारी के साथ साथ बीज, जैव उर्वरक के पैकेट एवं बीज मिनीकिट वितरित किये। अभियान में ४ लाख पुरूष एवं महिला कृषकों ने भाग लिया। अमूल्य नीर योजना देश के कुल उपलब्ध पानी का मात्र एक प्रतिशत राज्य में उपलब्ध है। इसलिए पानी की प्रत्येक बूंद अमूल्य है। उपलब्ध पानी में से ८० प्रतिशत से ज्यादा खेती में सिंचाई के काम आता है। खेती में एक-एक बूंद का सदुपयोग हो, इसके लिए वर्ष २००५-०६ से अमूल्य नीर योजना शुरू की गई। इस योजना में सिंचाई पाइप लाईन, फव्वारा व ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाने के लिए किसानों को आर्थिक सहायता दी जा रही है। कुएं से खेत तक पानी पहुँचने में २०-२५ प्रतिशत पानी की छीजत होती है। अतः क्यारी, धोरे के बजाय सिंचाई पाइप लाईन काम में लेने से यह छीजत रोकी जा सकती है। इसी तरह फव्वारे से ३० से ४० प्रतिशत तथा ड्रिप पद्धति से ७५ प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। वर्ष २००७-०८ में किसानों को ५१.५७ करोड रुपये की सहायता का प्रावधान है तथा अनुदान की प्रक्रिया को सरल बना दिया गया है। भारत सरकार द्वारा पुरस्कार रबी अभियान २००४-०५ में उत्पादन, उत्पादकता एवं कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि के लिए देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर भारत सरकार द्वारा राज्य को अवार्ड प्रदान किया गया। इसके तहत एक करोड रुपये प्रोत्साहन राशि तथा चांदी का एक फलक प्रदान किया गया। फसलों के क्षेत्रफल, उत्पादकता व उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि विभाग द्वारा विभिन्न विस्तार गतिविधियों के आधार पर राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद ने राज्य को पुरस्कार प्रदान किये हैं। वर्ष २००४-०५ के लिए हनुमानगढ जिले को सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट अवार्ड व वर्ष २००५-०६ के लिए झालावाड जिले को द्वितीय सर्वोत्तम पुरस्कार मिला। उन्नत बीज-उर्वरक वितरण में वृद्धि किसानों को पर्याप्त मात्र में उन्नत बीज एवं उर्वरक की उपलब्धता बढाने की दिशा में ठोस प्रयास सामने आये। वर्ष २००३-०४ के ५.१३ लाख क्विंटल के मुकाबले वर्ष २००७-०८ में १३.२० लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों का वितरण किया गया। इसी तरह वर्ष २००३-००४ के १६.४५ लाख मैट्रिक टन की तुलना में २००६-०७ में १९.९३ लाख मीट्रिक टन उर्वरक वितरण किया गया। वर्ष २००७-०८ में २३.८४ लाख मीट्रिक टन उर्वरक वितरण का लक्ष्य रखा गया है। कृषि योजनाएं आफ द्वार
किसानों एवं पशुपालकों को उन्नत तकनीक योजनाओं का लाभ प्रदान करने के लिए कृषि, उद्यान, पशुपालन एवं कृषि विपणन विभाग ने पिछले दो वर्षों में शिविरों का आयोजन कर कृषकों को देय सुविधाओं का लाभ दिया गया। वर्ष २००६ एवं २००७ में ग्राम पंचायत स्तर पर लगाये गये शिविरों में लाखों किसानों को लाभान्वित किया गया। यहीं नहीं अखबारों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं प्रकाशनों के माध्यम से भी किसानों को योजनाओं की जानकारी दी गई।
किसानों को उन्नत खेती का प्रशिक्षण किसानों के अन्तर्राज्यीय भ्रमण जैसे कदमों से भी उन्हें लाभान्वित किया गया। महिला कृषकों को राज्य सरकार के खर्चे पर राष्ट्रीय भ्रमण पर ले जाया गया। अनुदान की स्वीकृति महिलाओं के नाम
वर्ष २००६-०७ से कृषि विभाग की योजनाओं यथा- मिनिकिट, फसल प्रदर्शन, स्प्रिंकलर, पौध संरक्षण उपकरण, कृषि यंत्र में देय अनुदान की स्वीकृतियां केवल महिलाओं के नाम से ही जारी करने का निर्णय लिया गया। वर्ष २००६-०७ में ही चार लाख से अधिक फसल बीज मिनिकिट वितरण कर महिलाओं को लाभाान्वत किया गया। वर्ष २००७-०८ में भी सात लाख से अधिक फसल बीज मिनिकिट का वितरण कृषक महिलाओं में किया गया है।
वर्ष २००६-०७ से कृषि विषय लेकर १०+२ में अध्ययनरत छात्रओं को १००० रुपये से बढाकर ३००० रुपये तथा कृषि स्नातक स्तर पर अध्ययनरत छात्रओं को ३००० रुपये से बढाकर ५००० रुपये प्रति छात्र प्रति वर्ष प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। वर्ष २००७-०८ से कृषि विषय में पीएचडी करने वाली छात्रओं को १० हजार रुपये प्रति छात्र प्रति वर्ष प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। गत ३ वर्षों में १०९.७७ लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि ४८११ छात्रओं को दी गयी। राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना
किसानों को प्राकृतिक आपदा, अनावृष्टि, सूखा, फसल रोग, तूफान, ओलावृष्टि आदि से फसल में नुकसान की दिशा में सुरक्षा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना राज्य में लागू की गई। इसमें संसूचित फसलों की संख्या में वृद्धि की गई तथा मुआवजे के भुगतान की प्रक्रिया को तेज व तर्कसंगत बनाया गया। खरीफ २००३ से अब तक आठ फसलों से दौरान प्रदेश के १८ लाख से अधिक किसानों को ५२९ करोड से अधिक की राशि का मुआवजा दिया गया। योजना में लघु, सीमान्त किसानों के ५ प्रतिशत प्रीमियम राशि का भुगतान राज्य सरकार द्वारा किया जा रहा है। मुआवजा राशि में राज्य सरकार ने २७५ करोड रुपये गत ४ वर्षों में वहन किये। एग्रीकान्क्लेव
कृषि, पशुपालन व डेयरी संबंधी वर्तमान स्थिति, भविष्य की चुनौतियाँ, किसानों की समस्याएं और उनके समाधान के लिये भारतीय उद्योग परिसंघ के सहयोग से किसानों, उद्योगपतियों, कृषि विशेषज्ञों का राज्य स्तरीय एग्रीकान्क्लेव अगस्त २००५ में जयपुर तथा अप्रेल २००७ में झालावाड में आयोजित किया गया। इसी तरह के कान्क्लेव संभाग मुख्यालयों पर आयोजित किये जा रहे हैं, जिनमें जुलाई २००६ में कोटा तथा अक्टूबर २००७ को उदयपुर में आयोजित किया गया। इसमें तीनों पक्षों में आपसी समझ विकसित हुई है।