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खुदा के लिए- ९/११ की अविस्मरणीय घटना का पुनः चित्र

5 Mar 2008
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The much-talked about Pakistani film, Khuda Kay Liye

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ इकबाल की ये पंक्ति सिर्फ किताबी पन्नों तक ही सीमित नहीं है बल्कि वास्तव में भी चरितार्थ होती नजर आ रही है। शायद इसलिए ऐसा पहली बार हुआ है जब भारत की धरती पर एक पाकिस्तानी फिल्म प्रदर्शित होने को तैयार है। शोएब मंसूर द्वारा निर्मित पाकिस्तानी फिल्म ’ख्ाुदा के लिए’ ९/११ के बाद होने वाले उस कठिन दास्तान को बयां करती है जिससे मुस्लिम समुदाय अब तक उभर नह पाया।


यह फिल्म पाकिस्तान, लंदन एवं दुबई में व्यवसायिक रुप से सफल होने के बाद भारत में ४ अप्रेल २००८ को रिलीज होने जा रही है। भारत में इस फिल्म का वितरण परसेप्ट पिक्चर कंपनी द्वारा किया जा रहा है, वहीं संगीत सोनी बी. एम. जी. रिलीज करेगी। इस फिल्म में जहां पाकिस्तानी अभिनेता शान और ईमान अली की मुख्य भूमिका होगी, वहीं नसीरुद्वीन शाह मुस्लिम मौलवी के किरदार में नजर आएगें।

 

संवेदनशील विषय पर आधारित इस फिल्म की कहानी आधुनिक विचारों वाले मुसलमानों के अपनी ही कौम में रुढवादियों द्वारा अपमानित होने तथा पश्चिमी देशों द्वारा खुद को उग्रवादी की नजर से देखे जाने की दास्तान को दर्शाती है।

सीमित बजट में बनी इस फिल्म की कहानी लाहौर के दो संगीतकार भाइयों के इर्द-गिर्द घूमती है जहां एक भाई उग्रवादी विचारों का समर्थक है वहीं दूसरे भाई को  ९/११ के बाद  अवैधानिक रुप से हिरासत में ले लिया जाता है। साथ ही फिल्म में एक अंग्रेज लडकी ’मैरी’ की भी कहानी है जिसके पिता उसकी जबरन शादी करना चाहते हैं।

कहानी में नया मोड तब आता है जब एक पाकिस्तानी युवा (शान) अपनी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाता है और उसी दौरान वहां ९/११ जैसी अनहोनी घटना होने के कारण शक की सूई उस पर ही मंडराने लगती है। वहीं दूसरी ओर उसके चाचा (हूंमाय काजमी) अपनी बहन ’मैरी’ जो घरवालों की मर्जी के खिलाफ एक गैर-मुसलमानी युवक से शादी करना चाहती है, उसे पाकिस्तान लाकर अफगानिस्तान के गांव में भेज देते हैं। जहां वे भागने की कोशिश करती हैं पर शेरशाह (हमीद शेख) द्वारा उसे वापस गांव ले आया जाता है।

यह फिल्म मुस्लिम समाज के कई संवेदनशील पहलुओं को उजागर करते हुए दो अलग-अलग विचारधाराओं (उदारवादी एवं रुढवादी) के बीच की दरार को दर्शाती है। जहां एक ओर कहानी का रुख आधुनिक ख्याल रखनेवाले मुसलमानों की ओर होता है जिन्हें अक्सर रुढवादियों द्वारा जीवन के प्रति सोच एवं  पाश्चात्य पहनावे को लेकर उत्पीडत करने का प्रयास किया जाता है वहीं दूसरी ओर इन्हीं पाश्चात्य देशों द्वारा सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से आंतकित किया जाता है।

अनुभवी व मंजे हुए निर्देशक शोएब मंसूर के डायरेक्शन में बनने वाली यह फिल्म काफी चर्चा में है। और हो भी क्यूं न, पाकिस्तान के ’सितारा-ए-इम्तियाज’ से नवाजे गए मंसूर जी की बात ही निराली है। वे न सिर्फ एक अच्छे निर्माता व निर्देशक हैं बल्कि एक उम्दा लेखक व संगीतकार भी हैं। उन्होंने छोटे पर्दे के फिफ्टी-फिफ्टी, अल्फा ब्रैवो चार्ली, गुल्स एंड गाईज् जैसे टीवी कार्यक्रमों का निर्देशन व निर्माण करके काफी वाहवाही बटोरी है। मशहूर गायक जुनैद जमशेद के गानों की जान’ कहलाने वाले मंसूर जी ने काफी सुपरहिट एलबमों का भी कुशल निर्देशन किया है। ’दिल-दिल पाकिस्तान’ एंव एतबार जैसे मशहूर गानों का संगीत देकर उन्होंने पहले ही लोगों के दिल में अपनी एक खास जगह बना ली है। शायद इन्हीं वजहों से उन्हें पाकिस्तान सरकार की ओर से ’प्रेसिडेंसियल प्राइड ऑफ परफॉमेंस’ एंव ’सितारा-ए-इम्तियाज’ के अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है।

गोवा फिल्म फेस्टीवल में विशेष रुप से सराही जा चुकी इस फिल्म का सन्देश है कि धर्म के प्रति आस्था मन में होती है दिल से एक सच्चा मुसलमान होना जरूरी है क्योंकि इस्लाम सिर्फ कुर्ता पजामा पहनने, दाढी बढाने या पर्दे तक ही सीमित नहीं है।

उम्मीद है कि फिल्म ’खुदा के लिए’ दो मुल्कों के बेहतर संबंधों की एक मजबूत डोर साबित होगी जो लोगों तक अच्छा पैगाम पहुंचा सके।



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