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| 30 August 2008 |
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राजस्थान को करीब १६ हजार करोड रू. की आवश्यकता - श्री चुन्नीलाल धाकड नई दिल्ली, ५ जुलाई। राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी राज्यमंत्री श्री चुन्नीलाल धाकड ने भारत निर्माण कार्यक्रम को पूर्ण करने की अवधि के लक्ष्य वर्ष २००८-०९ पर राजस्थान जैसे प्रांत के संबंध में पुनर्विचार करने की जरूरत पर बल देते हुए बताया है कि इसके लिए आवश्यक धनराशि १६ हजार करोड रू. का प्रबंध करने के साथ ही मानव श्रम और सामग्री की व्यवस्था अपने आप में एक चुनौती है। श्री धाकड गुरूवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में सतत ग्रामीण पेयजल आपूर्ति और सबके लिए स्वास्थ्य-२०१२ विषय पर राज्यों के पेयजल मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन में हुई चर्चा में भाग लेते हुए बोल रहे थे। उन्होंने बताया कि राजस्थान में भू-जल के गिरते स्तर, कम होती आवक और गुणवत्ता को देखते हुए सतही स्त्रोंतों पर निर्भरता ही एक मात्र विकल्प है। इसके लिए केन्द्र सरकार की मदद की जरूरत है। राज्य अपने बलबूते पर भारत निर्माण के लक्ष्य नहीं प्राप्त कर सकता। श्री धाकड ने बताया कि राजस्थान में ९४४७ करेाड रू. की लागत से अब तक कुल ४८ वृहद जल परियोजनाएं स्वीकृत की जा चुकी है जो कि निर्माणाधीन है लेकिन इनकी प्रगति धन की उपलब्धता पर निर्भर है। इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वे राजस्थान को अधिकाधिक धनराशि आवंटित करे ताकि भारत निर्माण कार्यक्रम को तेज गति से लागू किया जा सके। श्री धाकड ने बताया कि राजस्थान एक ऐसा प्रांत है, जहां पशुओं की संख्या और मानव जनसंख्या लगभग बराबर है। प्रदेश के लोगों के लिए कृषि के पश्चात पशुपालन ही आजीविका का प्रमुख आधार है। उन्होंने मांग की कि इस स्थिति को देखते हुए राज्य के सभी जिलों में ’पशु पेयजल‘ का प्रावधान भी रखा जाए। उन्होंने बताया कि भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि जल स्त्रोत १.६ मिलोमीटर पर उपलबध है, तो उस बस्ती को लाभान्वित मान लिया जाता है, वर्तमान परिस्थतियों में यह दूरी बहुत अधिक है। अतः इसे घटा कर आधा किलोमीटर कर दिया जाना चाहिए। इसी प्रकार ढाई सौ की आबादी पर एक हैण्डपम्प लगाने के दिशा-निर्देश है। राजस्थान जहां भू-जल बहुत गहरा है, पेयजल बहुत दूर से लाना पडता है और संस्थागत लागत अत्यधिक है और अधिकतर स्थानों पर हैण्डपम्पों में जल की आवक इतनी नहीं है, जितनी दिशा निर्देशों में नियत की है। अतः हैण्डपम्प की संख्या का आधार जल की उपलब्धता और मांग को ध्यान में रख कर किया जाए और इसे आबादी के आधार से मुक्त रखा जाना चाहिए। श्री धाकड ने सुझाव दिया कि ’कन्जरवेशन ऑफ वॉटर‘ के संदर्भ में ’टेलीस्कोपिक‘ दर लगाना ही उचित होगा, जिसमें अधिक उपयोग पर अधिक दर से उपभोक्ता को राशि देनी पडती है। वर्तमान में इस प्रकार की दरें राजस्थान में लागू की जा चुकी है। उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि केन्द्रीय मद में खर्च लगातार और समय पर हो, इसके लिए राज्यों को ७५ प्रतिशत धनराशि वर्ष के प्रारंभ में ही रिलीज कर देनी चाहिए।
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