कुशल वित्तीय प्रबंधन ने दी विकास को नई दिशा 6 Dec
2007
मुख्यमंत्री के रूप में श्रीमती वसुन्धरा राजे ने जब शासन संभाला तो ‘‘खजाना खाली‘‘ का एक कृत्रिम वाक्य प्रदेश के विकास ही नहीं बल्कि साख पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहा था। श्रीमती राजे की राजस्थान को गर्व एवं स्वाभिमान से जीने की सीख के साथ राजकोषीय सुधारों की ऐसी सौगात दी
हनुमानगढ ६ दिसम्बर। किसी भी राज्य में विकास की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि शासन का वित्तीय प्रबंधन कैसा है ? विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता है या नहीं ? बाजार में साख कितनी है ? इन मापदंडों पर राजस्थान का आकलन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि गत चार वर्षों में प्रदेश ने न केवल कुशल वित्तीय प्रबंधन से देशव्यापी ख्याति अर्जित की अपितु विकास की गति को भी अपेक्षित रूप से बनाये रखने में सफलता दर्ज की।
मुख्यमंत्री के रूप में श्रीमती वसुन्धरा राजे ने जब शासन संभाला तो ‘‘खजाना खाली‘‘ का एक कृत्रिम वाक्य प्रदेश के विकास ही नहीं बल्कि साख पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहा था। श्रीमती राजे की राजस्थान को गर्व एवं स्वाभिमान से जीने की सीख के साथ राजकोषीय सुधारों की ऐसी सौगात दी कि पिछले चार सालों में एक दिन भी राज्य को विकास के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी महसूस नहीं हुई। सभी क्षेत्रें में विकास योजनाओं को स्रोत मिले तो वित्तीय प्रबंधन में किये गये नवाचारों से प्रदेश का देशव्यापी गौरव बढा।
ओवर ड्राफ्ट की समस्या से निजात, राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि, पूंजीगत व्यय में बढोतरी, वित्तीय मानकों सुधार, वित्तीय अनुशासन के लिए राज वित्तीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम लागू करने जैसे उपायों के साथ ही राजस्थान विकास एवं गरीबी उन्मूलन निधि के गठन जैसे कदमों से माली हालत में सुधार के संकेत ही नहीं मिले बल्कि राजस्व अधिकाय की स्थिति आई। यह सुखद ही कहा जायेगा कि फरवरी, २००४ के बाद प्रदेश को कभी ओवर ड्राफ्ट की स्थिति का सामना नहीं करना पडा। राजस्व प्राप्तियों में बढोतरी
राज्य के स्वयं के कर राजस्व में निरंतर वृद्धि होना निश्चिय ही वित्तीय प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में वर्ष २००३-०४ में १५.८८ प्रतिशत, २००४-०५ में १६.१३ प्रतिशत, २००५-०६ में १७.४१ प्रतिशत, २००६-०७ (संशोधित अनुमान) में १४.५१ तथा २००७-०८ (बजट अनुमान) में १४.१३ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। इसके ठीक विपरीत पूर्व सरकार के कार्यकाल में वर्ष २००१-०२ में ७ तथा २००२-०३ में यह वृद्धि १०.२७ रही। पूंजीगत परिव्यय में वृद्धि
राज्य सरकार ने स्थायी परिसम्पत्तियों के निर्माण पर बल देते हुए पूंजीगत परिव्यय में निरंतर वृद्धि पर ध्यान दिया है। वर्ष २००३-०४ शुद्ध ऋणों की ४२.४७ प्रतिशत,वर्ष २००४-०५ में ५१.५० प्रतिशत तथा २००५-०६ में लिये गये शुद्ध ऋणों की ६८.४७ प्रतिशत राशि पूंजीगत परिव्यय पर खर्च की गयी। वित्तीय वर्ष २००६-०७ (संशोधित अनुमान) में पूंजीगत परिव्यय शुद्ध ऋणों की ११४.२३ प्रतिशत व्यय हुई वहां २००७-०८ के अनुमानों के अनुसार ९३.४३ प्रतिशत राशि का पूंजीगत परिव्यय के लिए प्रावधान किया गया है। वित्तीय मानकों में सुधार राज्य सरकार के निरंतर प्रयासों से राजस्व एवं राजकोषीय घाटे में उल्लेखनीय सुधार आ रहा है। वर्ष २००१-०२ एवं २००२-०३ में राज्य का राजस्व घाटा, राजस्व प्राप्तियां का क्रमशः ३१.२३ एवं ३०.०७ था जो कि वर्ष २००४-०५ में घटकर १२.०६ प्रतिशत रह गया। वर्ष २००५-०६ में इसे मात्र ३.१७ प्रतिशत तक लाने में राज्य सरकार ने सफलता पाई।
वित्तीय वर्ष २००६-०७ में संशोधित अनुमान के अनुसार राजस्व आधिक्य राजस्व प्राप्तियों का ०.३८ था जो २००७-०८ में बजट अनुमानों के अनुसार ०.७५ प्रतिशत रहना अनुमानित है। राज्य में वर्ष १९९१-९२ के पश्चात् पिछले पन्द्रह वर्षों में पहली बार राज्य २००६-०७ (संशोधित अनुमान) में राजस्व आधिक्य की स्थिति में आया है। राज वित्तीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंध अधिनियम के अनुसार २००८-०९ में राजस्व घाटा शून्य तक लाया जाना था।
वर्ष २००१-०२ एवं २००२-०३ में राज्य का राजकोषीय घाटा जी.एस.डी.पी. का क्रमशः ६.३८ एवं ७.०९ प्रतिशत था जो कि वर्ष २००४-०५ में घटकर ५.४२ प्रतिशत रह गया एवं २००५-०६ में यह और घटकर ४.१५ प्रतिशत रहा। वित्तीय वर्ष २००६-०७ (संशोधित अनुमान) में राजकोषीय घाटा ३.४६ प्रतिशत रहने की संभावना है। राज वित्तीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंध अधिनियम में न्यूनतम औसत वार्षिक कमी ०.४ प्रतिशत करने तथा वर्ष २००८-०९ तक उसे जी.एस.डी.पी. के ३ प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके विरूद्ध वर्ष २००५-०६ एवं २००६-०७ (संशोधित अनुमान) में औसत वार्षिक कमी ०.९ प्रतिशत प्राप्त की गयी है जिसके २००८-०९ से पूर्व ही जी.एस.डी.पी. के ३ प्रतिशत तक सीमित रहने की पूरी संभावना है। केन्द्र सरकार से प्रोत्साहन
राज्य में कुशल वित्तीय प्रबंधन के परिणामों को भारत सरकार के स्तर पर भी पूरी सराहना मिली है। राजस्व घाटे में अपेक्षित सुधार करके न केवल वर्ष २००३-०४ एवं २००४-०५ की प्रोत्साहन राशि क्रमशः ५९.७७ करोड और ६०.६१ करोड रुपये भारत सरकार से प्राप्त की गयी। यही नहीं पूर्व के वर्षों की बकाया राशि १४६.२७ करोड रुपये भी भारत सरकार से प्राप्त हो गयी है। वित्तीय अनुशासन
राज्य सरकार ने राज वित्तीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंध अधिनियम को लागू किया। इसके साथ ही वित्तीय सुधारों को भी प्रभावी तरीके से लागू किया। इन्ही प्रयासों का परिणाम है कि वर्ष २००५-०६ से २००९-१० की अवधि में बारहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर १५४० करोड रुपये की ऋण माफी एवं लगभग ७०० करोड के ब्याज की बचत होने की संभावना है।
१२वें वित्त आयोग की सिफारिशों को दृष्टिगत रखते हुए बजट प्रबंध अधिनियम लागू करने तथा राज्य में स्वयं के स्तर पर राजकोषीय सुधार का रास्ता निर्धारित करने के आधार पर केन्द्र सरकार ने एक अप्रेल, २००५ को बकाया ऋण राशि का समेकन कर दिया है। साथ ही वर्ष २००५-०६ एवं २००६-०७ के लिए ३०८ करोड रुपये प्रतिवर्ष की दर से भारत सरकार द्वारा राज्य के ऋण लेखों में आवश्यक समायोजन कर दिया गया है। वर्ष २००७-०८ के लिए भी राज्य सरकार को उक्त लाभ के ३०८ करोड रुपये मासिक किश्तों में प्राप्त होना शुरु हो गया है। निधि का गठन
विकास योजनाओं के संचालन के साथ ही गरीबी उन्मूलन गतिविधियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार ने पहल करते हुए वर्ष २००६-०७ में राजस्थान विकास एवं गरीबी उन्मूलन निधि का गठन कर दिया है। पहले वर्ष इसके लिए १०० करोड रुपये की राशि हस्तांतरित की गयी। वर्ष २००७-०८ में इसे बढाकर २०० करोड रुपये कर राज्य सरकार ने विकास एवं गरीबी उन्मूलन के प्रति अपनी संकल्पशीलता का परिचय दिया है।
कुशल वित्तीय प्रबंधन एवं राजकोषीय सुधारों के इन प्रयासों का परिणाम रहा है कि आज प्रदेश बिना किसी संकोच के विकास की गतिविधियों को तेज गति से संचालित करने में सफल हुआ है।