संबंध चोली-दामन का, अब नहीं रहा
7 Jan
2008 दो विषय अथवा वस्तुओं के पारस्परिक संबंधों की पुष्टिं तब तक अधूरी-अधूरी सी लगती है, जब तक उनके घनिष्ठ संबंध की व्याख्या 'चोली दामन' के संबंध के साथ संयुक्त न कर दी जाए।
दो विषय अथवा वस्तुओं के पारस्परिक संबंधों की पुष्टिं तब तक अधूरी-अधूरी सी लगती है, जब तक उनके घनिष्ठ संबंध की व्याख्या 'चोली दामन' के संबंध के साथ संयुक्त न कर दी जाए। मसलन राजनीति और भ्रष्टाचार, राजनीति और अपराध, राजनीति और छलछद्म के मध्य पारस्परिक संबंधों की घनिष्ठता की सटीक व्याख्या करने के संदर्भ में चोली-दामन के संबंधों की घनिष्ठता का जिक्र करना आवश्यक हो जाता है, वरन् संबंध अधूरे-अधूरे से लगते हैं। चोली-दामन के मध्य जितने पुराने संबंध है, उतना पुराना ही यह मुहावरा है। हो भी क्यों ना, यह मुहावरा मानवीय कोमल भावनाओं को सीधे-सीधे जो छूता है।
जब कभी चोली-दामन अथवा अकेली चोली का जिक्र चलता है, तो 'चोली के पीछे क्या है?' का प्रश्न सहज ही उत्पन्न हो जाता है। यह मानव-जिज्ञासा का प्रश्न है। जिस शायर ने 'चोली के पीछे क्या है?' के प्रश्न को सार्वजनिक किया है, उसी ने बताया है, 'चोली के पीछे दिल है।' दिल है, जो धड़कता है। दिल्ल धड़कता है, तो अंग-अग फड़कता है। उन्नीसवीं सदी तक दिल की इस धड़कन को छिपाने का रिवाज था। उम्र के एक नाजुक मोड़ पर युवा दिल जब धड़कना प्रारंभ करते थे, तो दिलदार उसे छिपाने का प्रयास करने लगते थे। जिसे शरम-हया पता नहीं किन-किन दकियानूसी शब्दों से नवाजा जाता था। इतना अवश्य है कि दिल की धड़कन छुपाई जाती थी और उसे शालीनता माना जाता था।
अपवाद स्वरूप दो-चार दिलदार चोरी-छिपे एक-दूसरे को धड़कते दिल की आवाज सुनाने में अवश्य सफल हो जाते होंगे, किंतु सामान्यतया ऐसा नहीं होता था। दिल की धड़कने छुपाने के लिए बालाएं चोली के ऊपर दामन का प्रयोग करती थी। चोली से दामन सरकने नहीं देती थीं, क्योंकि धड़कते दिल की धड़कने छुपाने में अकेली चोली कामयाब नहीं थी। संभवतया उसी जमाने में इस मुहावरे का जन्म हुआ होगा।
चोली-दामन की यह घनिष्ठता उन्नीसवें दशक तक रही। बीसवीं सदी के आते-आते चोली पर से दामन की पकड़ ढीली होने लगे। दामन चोली स्थल से खिसक कर घाघरे की दिशा में लटकने लगा। जो संबंध कभी चोली-दामन के मध्य थे वह घाघरे और दामन के मध्य दिखलाई देने लगे। इस प्रकार चोली-दामन के इस मुहावरे की प्रासंगिकता पर धीरे-धीरे सवालिया निशान स्पष्ट होने लगा।
बीसवीं सदी के बहिर्गमन द्वार तक आते-आते ब्रिटेन साम्राज्य की तरह घाघरा भी सिकुड़ने लगा और उसने अपना नाम मिनीस्कर्ट रख लिया। दामन तो बेचारा गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गया। मगर बदकिस्मती से मुहावरा अभी तक प्रचलन में है। शायद किसी भाषा-विज्ञानी का ध्यान इस और नहीं गया है।
अब हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। आज के जवां दिलों के लिए शालीनता धड़कते दिल की धड़कन छुपाने में नहीं उसे व्यक्त करने में है। मेढ़क की तरह फुदकता दिल हथेली पर लिए घूमते हैं। बागीचों में पार्को में, प्राचीन एतिहासिक इमारतों के साय में और आधुनिक मॉल्स में जहां कहीं भी मौका मिल जाए, एक-दूजे को दिल की धड़कनों से वाकिफ कराने में मशगूल हो जाते हैं। क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का युग है, इसलिए स्वच्छंद रूप से व्यक्त कर रहे हैं। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को नए आयाम दे रहे हैं। पुराने मूल्यों को उनके अंजाम तक पहुंचा रहे हैं।
सौंदर्य-बोध और स्वतंत्रता के इस युग में दामन का औचित्य क्या? दामन युवा शब्दकोष से बहिर्गमन कर गया है, चोली का आकर भी निरंतर सिकुड़ने की प्रगति पर है। फिर न जाने क्यों चोली-दामन के संबंध को फिजूल महत्व देकर क्यों प्राचीन मुहावरों की लकीर पीटी जा रही है। हमारा सुझाव है-'गधे के सिर से सींग गायब' थोड़ा अभद्र लगता है, अमानवीय लगता है, अत: इस मुहावरे के स्थान पर 'चोली से दामन गायब' के मुहावरे को प्रचलन में लाया जाए। उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है, इक्कीसवीं सदी में शरम-ओ-हया ऐसे गायब हो गई जैसे चोली से दामन।