गुरूवार, 8 नवंबर, 2007 को रूप चौदस या नरक चतुर्दशी दिन होगा। इस दिन धर्मराज चित्रगुप्त व यमराज दोनों का पूजन किया जाता है।
दीपावली, लक्ष्मी पूजा एवं चोपड़ा (बही-खाता) पूजा का मुहुर्त :
सुबह 06:50 से 11:50
दोपहर 12:23 से 04:50
संध्या 05:57 से 09:12
रात 09:12 to 10:47
रात्रि 11:57 to 12:48
दीपावली पूजन के शुभ लग्न
वैसे तो दीपावली को प्रदोषकाल में कभी भी पूजन किया जा सकता है लेकिन यदि लग्न शुध्दि का ध्यान रखा जाये तो अति उत्तम होगा। अलग अलग व्यक्तियों के नाम से अलग अलग मुहुर्त बनते है फिर भी स्थिर लग्न में महालक्ष्मी का पूजन किया जाये तो यह विशेष रूप से फलदायी होता है। गुजरात और महाराष्ट्र में चौघडिया के अनुसार पूजन किया जाता है । इसमें शुभ, अमृत, लाभ चौघड़िये शुभ माने गये है।
स साल दीपावली पूजन के शुभ चौघड़िये
शुभ चौघडिया सुबह ८,०४ से ९.३१ तक।
लाभ का चौघडिया, दोपहर .१.५० से ३.१६ तक।
अमृत का चौघडिया दोपहर. ३.१६ से ४.४२ तक।
वृश्चिक लग्न सुबह ८.३४ से १०.४९ तक, वृष ल्गन रात्रि. ७.३९ से ९.३९ तक, सिंह लग्न रात्रि .२.०४ से ४.१२ तक रहेगा।
बेहतर हो अगर आप अपनी जन्म राशि के अनुसार लक्ष्मी पूजन के लिए उपयुक्त मुहुर्त में पूजा करें।
शुक्रवार, 9 नवंबर, 2007 को कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या को दीपावली पर्व मनाया जाएगा। इस दिन महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए अनुष्ठानपूर्वक पूजन करने का विधान है।
इस क्रम में गणेश, सरस्वती, महाकाली, कुबेर, षोडश मातृका, कलश, नवग्रह पूजन किया जाता है। साथ ही नवीन बही-खाते, लेखनी-दवात, घर-दुकान के प्रमुख द्वार, दीपमाला का भी पूजन किया जाता है।
महालक्ष्मी के विभिन्न आठ अंगों का आठ सिद्धियों की प्राप्ति हेतु पूजन किया जाता है। दीपावली की रात्रि का लक्ष्मी प्राप्ति हेतु विशेष तांत्रोक्त महत्व है। इस दिन संपूर्ण रात्रि जागरण करके 'लक्ष्मी' को प्रसन्न करने के लिए लक्ष्मी प्रदाता श्री सूक्त, पुरुष सूक्त, लक्ष्मी सूक्त, विष्णु सतस्रनाम, लक्ष्मी यंत्र पूजन आदि का अपनी आवश्यकतानुसार जाप अथवा हवन किया जाता है। विशेषकर श्रीयंत्र का तंत्रोक्त पूजन किया जाता है।
दीपावली क्रम में :
'सरस्वती' के रूप में बही-खातों का पूजन किया जाता है।
'महाकाली' के रूप में स्याही की दवात का पूजन किया जाता है।
कुबेर के रूप में तिजोरी का पूजन किया जाता है।
घर व व्यापारिक प्रतिष्ठान के प्रमुख द्वारों पर स्वस्ति वाचक चिन्ह आदि अंकित कर उनका पूजन किया जाता है।
दीपक जलाकर उन्हें क्रमबद्ध सजाकर महालक्ष्मी का प्रकाश के रूप में पूजन किया जाता है। इन दीपकों से देवस्थान, घर, व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सजाया जाता है।
दरिद्रता नाश हेतु, आर्थिक प्रगति में बाधा निवारण हेतु, आर्थिक उन्नति हेतु विभिन्न स्तोत्र, सहस्रनाम, कवच व वेद अथवा पौराणिक मंत्रों का अनुष्ठान दीपावली की रात्रि में किया जाता है।
प्रसन्नता व्यक्त करने हेतु आतिशबाजी की जाती है। मित्रों, स्नेहियों को शुभकामनाएँ प्रेषित की जाती हैं। मिठाई व उपहार का वितरण किया जाता है।
बुजुर्ग व पूज्य व्यक्तियों के चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त किए जाते हैं।
इस तरह दीपावली महापर्व को लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
विशेष : इसी दिन गायों के सींग आदि को सजाकर उन्हें घास व अन्न प्रदान कर अगले दिन गोवर्धन पूजन हेतु आमंत्रित किया जाता है।