मेडतासिटी। राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमति वसुंधरा राजे अगला विधानसभा चुनाव जीतकर राज्य में दूसरी बार भाजपा की सरकार बनाने के लिए संकल्प वध होकर कार्य कर रही है। वहीं मेडता विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ता आपसी तालमेल की कमी के कारण बिखरे हुए नजर आ रहे है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण भाजपा के विजय संकल्प महाकुंभ रैली से लौटकर आये कार्यकर्ताओं ने आपबीती सुनाकर प्रस्तुत किया। मेडता शहर से इस रैली में तीन बसों में बूथ संयजको को भरे जाने की सम्भावना को ध्यान में रखकर कार्यकर्ताओं को जयपुर ले जाने की जिम्मेदारी मेडता भाजपा मंडल के अध्यक्ष अनिल दिवाकर एवं पदाधिकारी जिम्मे थी। रैली जाने से पूर्व कार्यकर्ताओं के साथ मंडल द्वारा तालमेल नहीं बिठाये जाने के कारण एक बस तो रवाना होने से पूर्व रद्द कर दी गई। इसके के बाद दो बसें जयपुर में गई जिसमें एक मिनी बस और एक बडी बस शामिल थी। इन दोनों बसों में मात्र 5-7 बूथ संयोजकों पर छोडकर ऐसे लोगों को रैली ले में जाया गया जिनकी संख्या मात्र दो बसों में 39 थी जिसमें 14 महिलाएं शामिल थी। जिनकी रैली में कोई आवश्यकता नहीं थी। इन बसों को रात्री 11 बजे ही जयपुर रवाना करकर भाजपा के मंडल अध्यक्ष अनिल दिवाकर व महामंत्री श्यामलाल बोराणा यहीं रूक गये। और इन बसों में जाने वाले कार्यकर्ता की जिम्मेदारी किसी भी अन्य पदाधिकारी को नहीं दी। इसके कारण इन बसों में गये कार्यकर्ता को आते-जाते भारी परेशानी का सामना करना पडा। दूसरी तरफ मडल के अध्यक्ष अनिल दिवाकर व महामंत्री श्यामलाल बोराणा सुबह कार द्वारा इस रैली में भाग के लिए जयपुर गये। मगर रैली में भी इन्होने कार्यकर्ता से दूरी बनाये रखी। जिसके कारण रात्री को कार्यकर्ता ने दूरभाष पर इन को खरी खोटी सुनाई इसी तरह भाजपा के मंच पर हमेशा दिखाई देने वाले बडे नेता भी कार्यकर्ता से रैली के दौरान या तो दूर रहे या उन्होने रैली में जाने ही मुनासिब नहीं समझा। यहां तक कि इस चुनाव भाजपा से टिकट मांगने वाले ने भी उम्मीदवार से इन कार्यकर्ता की देखभाल करना जरूरी नहीं समझा। लगता है कि भाजपा के पदाधिकारियों ने पिछले उपचुनाव से शायद कोई सबक नहीं लिया। क्योंकि उस उपचुनाव में कार्यकर्ता की आपसी खींचातान के कारण मेडता की जीती हुई सीट उपचुनाव में कांग्रेस के झोली में चली गई। और यदि स्थिति बरकरार रही तो समय अपना इतिहास वापस दोहरा दे तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। यदि ऐसा होता है तो कार्यकर्ताओं को पहले की तरह पांच वर्ष तक सत्ता से दूर रहने का दंश झेलना पड सकता है। समय रहते भाजपा के उन उच्च पदाधिकारियों को अपना घर ठीक कर लेना चाहिए। जो यहां आते है और कमरे मे बैठकर मिटिंग करकर चले जाते है । अन्यथा बाद मे पछतावे के अलावा कुछ नहीं रहेगा।