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धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन विकास के ठोस प्रयास
10 May 2007

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हनुमानगढ १० मई,।राज्य सरकार की नई धार्मिक पर्यटन नीति के अनुरूप राज्य में पर्यटन को बढावा देने के लिए किये गये प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। आध्यात्मिक धरोहर के जीर्णोद्धार पर देवस्थान विभाग ने गत तीन वर्षों में ११५ मन्दिरों  के जीर्णोद्धार पर ३ करोड १५ लाख रुपये की राशि व्यय की है। इसस मंदिरों के रख-रखाव के साथ-साथ पर्यटन को भी बढावा मिला है।
धार्मिक पर्यटनः- विगत तीन वर्षों में राज्य में धार्मिक पर्यटन को बढावा देने के लिए प्रमुख तीर्थ स्थलों पर यात्रियों के लिए पानी, बिजली, रहवास, सडक, उद्यान आदि की बुनियादी  सुविधाओं का विकास करवाया जा रहा है। राज्य सरकार की नवीन धार्मिक पर्यटन नीति के तहत प्रमुख तीर्थ स्थल स्थल मंदिर, श्री श्रीनाथ जी, नाथद्वारा में ३२ लाख, सांवलियाजी तीर्थ चित्तौडगढ में २० लाख, श्री खाटू श्यामजी में २० लाख, श्री गोगाजी गोगामेडी में १ करोड, श्री त्रिपुरा सुन्दरी बांसवाडा में ४ करोड ३६ लाख, श्री सिद्धी विनायक जी मंदिर बांसवाडा में ४७.१० लाख तथा श्री द्वारिकाधीश जी मंदिर झालरापाटन ७५ लाख रुपये के विकास कार्य करवाये जा रहे हैं।
आस्था स्थलों का जीर्णोद्धारः- देवस्थान विभाग न विगत तीन वर्षों में विभाग के सीधे प्रबंधाधीन ११५ मंदिरों के जीर्णोद्धार पर ३१५.१४ लाख की राशि योजना एवं संयुक्त निधि मद के अंतर्गत व्यय की है। राज्य सरकार द्वारा वर्ष २००६-०७ में ४१ मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए ६६०.९५ लाख रुपये आयोजना मद से ६० लाख रुपये संयुक्त निधि मद से तथा १० लाख रुपये आयोजना भिन्न मद के अंतर्गत कुल ७३०.९५ लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
 इसी तरह पर्यटन विभाग ने भी मेवाड-वागड धार्मिक पर्यटन सरि्कटके अंतर्गत ५८० लाख रुपये एवं बृज क्षेत्रा के धार्मिक पर्यटन सरि्कटके अंतर्गत ४७०.०७ लाख रुपये की योजना बनाई हैं।
अपना धाम-अपना काम-अपना नाम योजनाः- देवस्थान विभाग के सीधे प्रबंधाधीन मंदिरों की रिक्त पडी भूमि अथवा संपदाओं का विकास पंजीकृत ट्रस्टों के माध्यम से बी.ओ.टी. तथा एम.ओ.टी. आधार पर जनोपयोगी उद्देश्यों के लिए करवा कर उपयोगी बनाने हेतु अपना धाम-अपना काम- अपना नाम योजना बनाई के लिए है। इससे मंदिरों के विकास में जन सहभागिता को बढावा मिलेगा।
ट्रस्टों की जनहित भागीदारीः- ट्रस्टों की जनहित में भागीदारी के उद्देश्य से सुनामी पीडतों के सहायतार्थ ४६.७७ लाख रुपये विभिन्न न्यासों द्वारा मुख्यमंत्री सहायता कोष में जमा करवाये गये एवं बाढ पीडतों की सहायतार्थ सार्वजनिक ट्रस्टों को प्रेरित कर मुख्यमंत्री सहायता कोष में ४१.७१ लाख रुपये की राशि भिजवाई गई है। महावीर कैंसर एवं अनुसंधान केन्द्र के सहयोग से १० स्थानों पर कैंसर शिविर आयोजित करवाये गये जिसमें ४०९२ रोगी लाभान्वित हुए।
मंदिर संस्कृति का पुनर्जीवनः- देवस्थान विभाग द्वारा प्रबंधित एवं नियंत्रित मंदिरों तथा विभिन्न सार्वजनिक मंदिरों में मंदिर परम्परानुसार उत्सव एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। इसके अतिरिक्त नव वर्ष, मीरा पंचशती, पुष्कर मेला, नवरात्रि, बसन्तोत्सव, बेणेश्वर मेला, महाशिवरात्रि, रंगीली होली, राजस्थान दिवस, ऋषभदेव जन्मोत्सव, वैशाख पूर्णिमा, पाटोत्सव, जन्माष्टमी आदि पर्वों पर विभाग द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किय गये।
 इसके अतिरिक्त देवस्थान विभाग एवं नारायण सेवा संस्थान,उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में उदयपुर में अनूप जलोटा भजन संध्या एवं कामां में भी श्री गोकुल चन्द्रमाजी पुष्टिमार्गीय उत्सव मनाया गया।
ट्रस्टों के माध्यम से विभागीय मंदिरों का प्रबंधनः- विभागीय सुपुर्दगी नीति अंतर्गत विगत तीन वर्षों में ९ मंदिरों की सेवा- पूजा एवं सुचारु देख-रेख के लिए विभिन्न पंजीकृत प्रन्यासों को सुपुर्दगी अथवा गोद दिया गया है, जिनमें श्री चतुर्भुज जी खिजूर चांदपोल जयपुर, श्री भुवनेश्वरजी ग्राम करौली (डूंगरपुर), श्री लक्ष्मण जी गोवर्धन(भरतपुर), श्री धनेश्वर जी, पांच महादेवजी गणगौर घाट(बोरसली घाट) उदयपुर, मंदिर श्री सत्यनारायणजी गेपसागर की पाल (डूंगरपुर), श्री लक्ष्मीनारायणजी नानीगली जगदीशचौक, उदयपुर, मंदिर श्री मंगलेश्वरजी महादेव ग्राम मगरदा तहसील कुशलगढ जिला बांसवाडा, मंदिर श्री अर्जुन सूर्य शिरोमणि, बाग के पास राजोरा, (करोली), श्री किशोरी श्यामजी तथा राधाकुण्ड (मथुरा) मंदिर शामिल हैं।
सार्वजनिक प्रन्यासों का नियंत्राणः- राजस्थान राज्य में सार्वजनिक मंदिरों, मठों एवं अन्य धार्मिक व पुण्यार्थ संस्थानों का पंजीयन करने एवं उनके प्रशासन हेतु राजस्थान सार्वजनिक प्रन्यास अधिनियम १९५९ के प्रावधान दिनांक १.७.१९६२ से लागू किए गए हैं। इस अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्रन्यासों के सर्वेक्षण, पंजीकरण, संपत्ति विनियोजन, लेखा नियंत्राण, अंकेक्षण तथा प्रन्यासों के संबंध में प्राप्त होने वाली शिकायतों की जांच के दायित्व का निर्वहन देवस्थान विभाग द्वारा किया जाता है। अधिनियम के प्रावधानों के तहत विभाग के क्षेत्रीय सहायक आयुक्तों को पंजीकरण एवं जांच तथा लेखा नियंत्राण की शक्तियां प्रदत्त है। अधिनियम की धारा ३७ के अनुसार देवस्थान आयुक्त राजस्थान राज्य में स्थित समस्त धार्मिक न्यासों के कोषाध्यक्ष हैं तथा उन्हें अधिनियम की धारा ७ के तहत राजस्थान राज्य में स्थित समस्त धार्मिक लोक न्यासों के अधीक्षण की शक्तियां प्रदत्त हैं। इस अधिनियम के प्रावधानों को क्रियान्वित करने तथा सार्वजनिक प्रन्यासों के प्रशासन पर अधीक्षण करने का दायित्व देवस्थान आयुक्त को सौंपा गया है।
अचल सम्पदा का प्रबंधनः- देवस्थान विभाग द्वारा प्रबंधित  एवं नियंत्रिात मंदिरों के प्रबंध एवं नियंत्राण की दृष्टि से राजकीय प्रत्यक्ष प्रभार श्रेणी के ३९० मंदिर एवं संस्थान, राजकीय आत्मनिर्भर श्रेणी के २०४ मंदिर एवं संस्थान तथा ४०० राजकीय सुपुर्दगी श्रेणी के मंदिर  हैं।
राज्य के बाहर स्थित मंदिर एवं संपदाएंः- राजस्थान राज्य के बाहर देवस्थान विभाग के प्रबंध एवं नियंत्राणाधीन मंदिर एवं संपदाएं प्रमुख तीर्थ स्थलों पर स्थित हैं। विभागीय मंदिर एवं उनके साथ संलग्न संपदा उत्तरप्रदेश राज्य में वृन्दावन, मथुरा, गोवर्धन, राधाकुण्ड बरसाना आदि स्थानों पर स्थित है तथा उत्तरांचल राज्य में हरिद्वार, नैनीताल एवं उत्तरकाशी में, गुजरात राज्य में द्वारिका में एवं महाराष्ट्र राज्य में औरंगाबाद व अमरावती तथा नई दिल्ली राज्य में स्थित है।
धार्मिक मेलों का आयोजनः- विभाग विगत तीन वर्ष के दौरान राजकीय मंदिरों में होने वाले उत्सवों, जयंतियों एवं मेलों की पंरपरा को पुनर्जीवित करने के विशेष प्रयास किए गए । विभाग द्वारा मुख्यतया राजकीय मंदिरों में प्रति वर्ष स्थायी रूप से बडे पैमाने पर मेलों का आयोजन किया जाता है जिनमें श्री गोगाजी, गोगामेडी (हनुमानगढ), श्री केलादेवी जी (भरतपुर), श्री ऋषभदेव जी (उदयपुर) माताजी मावलियान(जयपुर) तथा श्री चारभुजा जी (राजसमंद) प्रमुख हैं।




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