बांसवाडा... चाहे जहाँ जमाओ डेरा और मस्ती से रहो, मैदानों और सडकों किनारे बेतरतीब पसरे हैं डेरे
12 Apr
2007
राजस्थान का बांसवाडा जिला ऐसे लोगों के लिए स्वर्ग है। परायी धरती पर ठाठ से रहने वालों की सेवा में बांसवाडा शहर बहुत उदार है। यह समूचा इलाका वह पुण्य भूमि है जिसके बारे में कहा जाता है- ’सबै भूमि गोपाल की।‘
पूरा शहर और आस-पास का इलाका अतिक्रमणों और अतिक्रमणकारियों तथा भू माफियाओं के लिए खुले चरागाह के रूप में मशहूर है ही, पिछले कुछ समय में सार्वजनिक क्षेत्रों पर भी अस्थायी रैन बसेरे अपनी संख्या लगातार बढाते जा रहे हैं।
बांसवाडा, १२ अप्रैल/जिनके पास रहने को जमीन नही हैं, खानाबदोश हैं, भिखारी हैं या फुटपाथी धन्धे वाले। या फिर काम-धन्धों की झंझट से दूर मौज-मस्ती से खाने-पीने वाले। ऐसे सभी लोगों के लिए अच्छी खबर है।
इन्हें दुनिया में चाहे पनाह न मिले, राजस्थान का बांसवाडा जिला ऐसे लोगों के लिए स्वर्ग है। परायी धरती पर ठाठ से रहने वालों की सेवा में बांसवाडा शहर बहुत उदार है। यह समूचा इलाका वह पुण्य भूमि है जिसके बारे में कहा जाता है- ’सबै भूमि गोपाल की।‘
पूरा शहर और आस-पास का इलाका अतिक्रमणों और अतिक्रमणकारियों तथा भू माफियाओं के लिए खुले चरागाह के रूप में मशहूर है ही, पिछले कुछ समय में सार्वजनिक क्षेत्रों पर भी अस्थायी रैन बसेरे अपनी संख्या लगातार बढाते जा रहे हैं।
शहर के बीच मैदानों व सार्वजनिक स्थलों में, सडकों के किनारे तथा खाली पडी जमीन पर बडी सख्या में ऐसे अनजान लोगों के डेरे जमे हुए हैं जिनके बारे में न प्रशासन को पता है न पुलिस को।
काफी संख्या में तम्बू जमाए बैठे इन डेरे वालों को पनपाने में जिला प्रशासन तथा नगरपालिका के साथ ही पुलिस महकमा भी पीछे नहीं है। लगातार बेरोकटोक पसरते जा रहे डेरों की वजह से दूर-दूर तक यह संदेश चला गया है कि बांसवाडा की सरजमीं पर चाहे जहां डेरा जमा कर बरसों तक बने रहे, कोई पूछने वाला नहीं है। इसी वजह से डेरों की संख्या बढती जा रही है।
इन डेरे वालों मदानों, रास्तों के किनारों, फुटपाथों से लेकर सार्वजनिक भवनों तक को नहीं छोडा है। पूरे के पूरे परिवार के साथ मस्ती से रह रहे इन लोगों के लिए अपने डेरे ही सब कुछ हैं। डेरों की वजह से गंदगी, बदबू, कीचड आदि के साथ ही आस-पास के इलाकों म इनकी हरकतों से लग परेशान हैं।
खाना पकाने के लिए ये डेरे वाले आस-पास के सरकारी दफ्तरों में बेखौफ घुस जाते हैं और पेडों को काट-काट कर ले जाते हैं। इसके अलावा इनकी स्वेच्छाचारिता इतनी की हर मनचाहा काम ये कर गुजरते हैं। झुण्ड में होने की वजह से कोई इन्हें रोकने-टोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पुलिस और प्रशासन पर इनकी शिकायत करने का कोई अर्थ इसलिए नहीं है कि इनमें दृढ इच्छाशंक्ति का अभाव है या कोई और गुप्त मजबूरी।
बांसवाडा शहर के बीच खेल गतिविधियों का एकमात्र पारंपरिक कुशलबाग मैदान अब खेल गतिविधियों की बजाय भिखारियों और डेरे वालों के कब्जे में है। साल भर यह मैदान इन लोगों के लिए अपने डेरे के रूप में काम आता है। इस वजह से खेल गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं और गन्दगी का जमावडा हो रहा है।
इन डेरे वालों के लिए कुशलबाग मैदान ही अपना घर बन गया है जो मुक्ताकाशी रसोईघर और आरामगाह, शयन स्थल से लेकर मूत्रालय-शौचालय और रैन बसेरे के रूप में पूरी मनमर्जी से इस्तेमाल किया जा रहा है। बावजूद इन सबके न तो नगरपालिका ही कोई ध्यान दे रही है, न जिला प्रशासन या पुलिस।
कुशलबाग मैदान का कोई कोना ऐसा नहीं बचा है जो इन भिखारियों और डेरे वालों के कब्जे से छूटा हो। न केवल कुशलबाग मैदान गन्दगी का केन्द्र बन गया है बल्कि आस-पास के तमाम दफ्तरों व दुकानों वाले लोग इन डेरे वालों की बदमाशियों से परेशान ह।
आस-पास के दफ्तरों में घुस कर पेडों को काटने, ईंधन के लिए रोजाना लकडयों की चोरी से लेकर ये लोग वे सारे काम इन दफ्तरों के परिसरों में करते हैं जिनसे परिसर गन्दगी से भरते जा रहे ह। आस-पास के दफ्तरों के परिसरों में घुस कर ये लोग पेड काट देते हैं और सूखने के बाद डालिया काट कर अपने काम में लाते हैं।
अवकाशों के दिनों में ये डेरे वाले दफ्तरों से सामान चुराने जैसे हथकण्डे अपनाने से भी बाज नहीं आते। इसके अलावा ये पानी भरने भी इन दफ्तरों में दीवार फांद कर घुस आते हैं।
ग्रीष्मावकाश की वजह से कुशलबाग मैदान में इन दिनों बच्चों की खेल प्रवृत्तियां जारी हैं लेकिन मैदान के हर कोने में दिन-रात डेरा डाले ये भिखारी और खानाबदोश लोगों का जमावडा बच्चों के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
न तो पुलिस और न ही प्रशासन के पास इस बात की जानकारी है कि ये डेरे वाले कहां से आए हैं और इनका मकसद क्या है। मैदान में ही नहाने-धोने से लेकर कपडे सुखाने तक की गतिविधियों ने पूरे मैदान के सौन्दर्य को तहस-नहस करके रख दिया है।
आए दिन इन लोगों द्वारा शराब पीकर उत्पात मचाने की घटनाएं होती रहती हैं लेकिन पुलिस और प्रशासन अब तक इन्हें कुशलबाग मैदान से बेदखल करने का साहस नहीं जुटा पाया है। आस-पास के दफ्तरों में काफी संख्या में हरे पेड इन डेरे वालों की भेंट चढ चुके हैं और कुछ दिन और यदि डेरे बने रहे तो कोई आश्चर्य नहीं कि कुशलबाग मैदान के आस-पास के दफ्तरों के परिसरों से पेडों का नामोनिशान न रहे।
यही हाल कॉलेज मैदान और शहर के दूसरे मैदानों का है। शहरवासियों का मानना है कि इन डेरों वालों की गतिविधियां संदिग्ध है लेकिन इस पर कोई गंभीर नहीं है।
यही हाल पूरे बांसवाडा जिले की है जो डेरों वालों, अपराधियों और भिखारियों के लिए खुला चरागाह बना हुआ है। नगरपालिकाओं से लेकर ग्राम पंचायतें तक इस दिशा में मौन हैं। यही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इन डेरे वाले खानाबदोशों की हरकतों से इस जिले को कानून व्यवस्था के लिए नई जंग लडनी पडे।
बांसवाडा शहर की विभिन्न संस्थाओं और बुद्धिजीवियों ने लगातार बढते जा रहे डेरों की वजह से उत्पन्न समस्याओं के बारे में मुख्यमंत्री को विस्तृत ज्ञापन भिजवाया है जिसमें डेरों वालों से अवैध रूप से किराया लेकर शहर के मैदानों, रास्तों और सार्वजनिक स्थलों पर डेरों को आवास सुविधा देने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है और स्पष्ट आरोप लगाया है कि पुलिस, प्रशासन और नगरपालिका के कतिपय अफसरों और कर्मचारियों की खुली मिलीभगत की वजह ही वह कारण है कि बांसवाडा डेरों के शहर में तब्दील होता जा रहा है।
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