बीकानेर, तेजी से बदलती जिन्दगी में आज वाहनों का उपयोग लगातार बढ रहा है यदि जिला परिवहन विभाग के आंकडों पर विश्वास करें तो केवल बीकानेर में 45 से 50 नए वाहन प्रतिदिन शोरूम से निकलते है। एक ओर वाहनों की बिक्री के आंकडे तेजी से ऊपर बढ रहे है वहीं दूसरी ओर पेट्रोल एवं डीजल के दाम आसमान छू रहे है। वाहनों की बढती बिक्री से पर्यावरण प्रदूषण का खतरा भी आज हमारे सामने है। पेट्रोल और डीजल का उपयोग दैनिक जीवन में इतना बढ गया है कि इसकी खपत को देखते हुए वैज्ञानिक तो भविष्य में इसकी उपलब्धता पर चिंता जाहिर करने लगे है। अब वैज्ञानिक भी पेट्रोल और डीजल के विकल्प के रूप में बायोडीजल पर ज्यादा जोर दे रहे है। बीकानेर के इंजीनियरिंग कॉलेज में भी बायोडीजल बनाने पर काम चल रहा है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोजेक्ट सुपरवाईजर एसोसिएट प्रोफेसर ओ.पी. जाखड के अनुसार यहां रतनजोत से बायोडीजल बनाने का काम पिछले तीन वर्षों से चल रहा है । मगर जिले में रतनजोत की पैदावार ज्यादा नहीं होने की वजह से अन्य विकल्प खोजे गये है जिसमें निबोली एवं तुबा प्रमुख है। जाखड ने बताया कि रतनजोत के मुकाबले बीकानेर एवं इसके आस पास के मरू क्षेत्र में नीम एवं आक के पेडों की अधिकता होने के कारण यदि निबोली एवं तुबे से बायोडीजल बनाने में पूरी तरह सफलता हासिल होती है तो भविष्य में पेट्रोल और डीजल की खपत को कम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अभी तक अलग-अलग चरणों में इसका प्रयोग किया गया है। डीजल में 5 से 20 प्रतिशत तक बायोडीजल मिलाकर इंजन चलाए गये है। जिसके परिणामस्वरूप यह सामने आया है कि अगर डीजल में 5 से 10 प्रतिशत बायोडीजल मिलाया जाए तो ज्यादा से ज्यादा एफिसियेंसी आती है और अगर बायोडीजल की मात्रा 15 से 20 प्रतिशत की जाए तो इकोनोमिकल मेंटिनेंस कम होता है। जाखड ने बताया कि अगर 20 प्रतिशत से ज्यादा इसकी मात्रा को बढाया जाता है तो मैटिनेंस बढ जाता है। इसलिए अभी तक हुए प्रयोग के आधार पर 10 से 20 प्रतिशत बायोडीजल मिलाकर इंजन चलाया जा सकता है। बायोडीजल पूरी तरह प्रदूषण रहित तो है ही साथ ही इसकी कीमत भी पेट्रोल एवं डीजल की तुलना में कम है।
‘कॉलेज में निबोली से बायोडीजल बनाने पर काम किया जा रहा है। इसके लिए कॉलेज परिसर में एक हजार नीम के पेड लगाए गए है, वर्तमान में कॉलेज परिसर में 7000 से ज्यादा नीम के पेड है।