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बीकानेर व्यापारीयों ने भेजे राजस्थान वित बजट २००७-०८ के लिये अपने सुझाव
13 Feb 2007

बीकानेर के सर्वांगीण विकास के लिये उठायी महत्त्वपूण्र् मांगेः बीकानेर को वायु सेवा से जोडने, बीकानेर शहर के विकास हेतु रेल बाईपास, व्यापारी कल्याण बोर्ड की स्थापना, बीकानेर के विकास हेतु विभिन्न विशिष्ठ उद्योगों, बिजली की कमी पुरी करने, बीकानेर की समस्त क्षतिग्रस्त सडकों, केन्दिरय जैल जो अब तक, बीकानेर में आई.आई.टी. कॉलेज खोलने इत्यादि।


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बीकानेर व्यापार मण्डल ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पत्र के माध्यम से बीकानेर व्यापारीयों ने भेजे राजस्थान वित बजट २००७-०८ के लिये अपने सुझाव भेजे है। व्यापार मण्डल के अध्यक्ष सुभाष चन्द मित्तल ने खबरएक्सप्रेस.कॉम के भेजे पत्र की कॉपी मे बताया पत्र के माध्यम से हमने बीकानेर जिले एवं संभाग के व्यापार में आने वाली समस्याओं एवं इस क्षेत्र के व्यवसाय विकास हेतु आवश्यक सुझाव राजस्थान सरकार के ध्यान में लाना चाहते है। जिसमें बीकानेर क्षेत्र मे होने वाले मुख्य व्यापारों के बारे मे बताते हुए लिखा हैः कच्ची ऊन एवं धागाः इसका मुख्य कारण प्राकृतिक रहा है। भेड सूखे वातावरण का जानवर है। इससे यहां ऊन की बहुतायत रही थी। कच्ची ऊन की अब इस क्षेत्र में कमी होने लगी है अतः अब उन का आयात किया जा रहा है। जिस पर १.६ प्रतिशत मंडी टैक्स लगाया जा रहा है जो पूर्णतः अनुचित है। यहां के व्यवसायियों ने धागा बनाने की मिले लगाई जो अब बिजली की कमी, डीजल पेट्रोल में (वेट का सेट ऑफ न मिलना) की कमी, पेचीदा कराधान के कारण यह उद्योग विकास से ज्यादा संघर्ष करता रहा है। बिजली आपूर्ति की गांरटी, इनसेंटिव स्कीम में किये गये वादों को पूरा किया जाना जरूरी है। यह व्यवसाय इस क्षेत्र में रोजगार, सरकार को राजस्व एवं धागे से यदि कॉर्पेट निर्मित करने जैसा उद्यम यहां किया जाये तो आशा है इस संक्षिप्त बिन्दु पर समुचित विचार किया जायेगा।
अनाज एवं दाले ग्वार तिल तिलहनः- बीकानेर में लूणकरणसर, खाजूवाला, नोखा, रायसिंहनगर, घडसाना, आदि कृषि उत्पादों की मंडिया है। अनाज दालों एवं तेल के घरेलू उपभोग के अलावा बीकानेर पापड, भुजिया नमकीन पर ब्राडेड एव अनब्राडेड की तलवार वैट कानून मं लटकाई गई है। इसके अलावा मुंगफली एवं सरसों दोनेां तिलहन है परन्तु मूंगफली पर कराधान की मार रहने से यह उद्योग यहा पिछडा है। भुजिया निर्माताओं को बिजली एवं डीजल की समस्या से निजात मिले तो यह व्यवसाय बीकानेर में रोजगार एवं राजस्व दे सकता है।
खनिज उद्योगः- बीकानेर में सफेद मिट्टी, जिप्सम बहुत प्रचुरता में होती है। यह एक प्राकृतिक उपहार है जिससे सिरेमिक उद्योग एवं प्लास्टर ऑफ पेरिस जैसा के कारण की ४० प्रतिशत खाने कानून की तकनीकी खामियों से या तो बंद है या अवैध खनन करने को मजबूर है। ऐसे में सिरेमिक्स उद्योग को भी हानि होती है एवं राजस्व का भी हानि होती है। पर्यावरण कानून को स्पष्ट परिभाषित किया जाय एवं इस क्षेत्र की प्राकृतिक सम्पदा से औद्योगिक विकास किया जाए इससे लिए राज्य सरकार को स्पष्ट खनिज नीति विकसित करनी चाहिए। जो खासकर बीकानेर क्षेत्र को भी संरक्षण दे।
जिप्समः- मुख्यरूप से बीकानेर क्षेत्र में है परन्तु खनिज नियमों में इसका खनन केवल त्ैडड एवं त्ैडक्ब् को ही दिया गया है। यह दोनों संस्थान इस क्षेत्र में पर्याप्त आपूर्ति नहीं कर पा रहे है। फलस्वरूप जिप्सम का अवैध खनन बहुत बडे स्तर पर किया जा रहा है। जो एक ऐसी समस्या है जिससे न केवल राजस्व हानि होती है बल्कि खनिज का सही उपयोग न होने से अवैध औद्योगिक विकास एंव श्रमिक शोषण एंव रोजगार हीनता ही बनी रहती है। सरकार ने अब इसे रोकने के लिए खनिज विभाग को डडत्क् ।बजण् की धारा २३ सी में अधिकार देकर अवैध खनन को रोकने हेतु उद्योगों के सर्वेक्षण पंजीयन, ट्रांजिट पास एवं उद्योगों के निर्धारण एवं रिटर्न भरने जैसा कानून बनाया हैं। खनिज विभाग एक तरफ तो रॉयल्टी वसूली को ठेके पर दकर काम चला रहा है। दूसरी ओर उद्योगों को खनिज कानून में लाकर उद्योगों की स्वतंत्रता को सीमित करने का कार्य कर रही है।
यदि समाधान करना है तो जिप्सम की प्राइेवेट लीज भी दी जानी चाहिए ताकि खनिजों को वैधानिक दोहन हो सरकार को राजस्व मिलें। उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति होने से व्यवसाय में वृद्धि होगी व क्षेत्र में राजस्व एवं रोजगार विकसित होंगे।
उपरोक्त सभी बिन्दुओं पर बजट मे विचार किया जाय एवं साथ ही मुख्य रूप से वैट कानून में ईधन (खास तौर से डीजल) का सेट ऑफ, ४० लाख से अधिक टर्न ऑवर का ऑडिट करने, एवं विभिन्न फार्मो वेट १० की पेचीदगी को कम करना एवं स्पॉट ऑडिट जैसे प्रावधान से राहत दी जानी चाहिए। अन्य कोई भी उपाय जो सरकार इस क्षेत्र के व्यवसाय एवं व्यापार के संरक्षण एवं विकास के लिए उचित समझे किया जाना चाहिए। इस क्षेत्र के व्यापारियों एवं व्यापार संथो से मंत्रना भी की जानी चाहिए। बीकानेर व्यापार उद्योग मंडल द्वारा १५ जनवरी, २००७ को विस्तृत ज्ञापन दिया जो पूर्णत सभी बिन्दुओं पर प्रकाश डालता है। उसे भी महत्व दिया जाना चाहिए।
बीकानेर व्यापार मण्डल के महामंत्री दिलीप कुमार पारिख ने बताया कि हमने राज्य सरकार को अगले बजट में संशोधन हेतु हमने अन्य कई महत्त्वपूर्ण सुझाव भी भेजे है। जिनम में प्रमुख है १ इनपुट टैक्स क्रेडिट वैट की आत्मा है। यह ऐसा विषय है कि जिस पर अभी और मंथन किया जाना आवश्यक हैं। वैट का एक उद्देश्य व्यवसाय की लागत कम करना भी है। वर्तमान रूप में इनपुट टैक्स क्रेडिट के प्रावधान वैट की मूल भावना के विपरित हैं। वर्ष के अंत में बची हुई इनपुट टैक्स क्रेडिट के रिफंड हेतु वर्ष की समाप्ति के एक वर्ष पश्चात् रिफंड हेतु आवेदन करने का प्रावधान है। इस प्रावधान में तुरंत प्रभाव से परिवर्तन का व्यवहारी को यह विकल्प दिया जाना चाहिए कि वह चाहे तो प्रत्येक तिमाही की समाप्ति के बाद रिफंड के लिए आवेदन करें। अथवा चाहे तो वर्ष की समाप्ति के बाद भी अगली तिमाही में देय कर से समायोजित करें। वर्तमान प्रावधानोमें बची हुई आई.टी.सी. के रूप में कार्यशील पूंजी का एक बडा हिस्सा डेढ से दो वर्ष के लिए ब्लॉक होकर अनुत्पादक हो जाता है।
समस्त खुदरा व्यापारियों को कम्पोजिशन स्कीम का विकल्प लेने की छूट होनी चाहिए चाहे उनका वार्षिक टर्न ऑवर कितना ही हो क्योंकि अधिसंख्यक वस्तुओं का अलग-अलग दरों से बील बनाना व हिसाब रखना खुदरा व्यापारी के लिए संभव नहीं है। हर खुदरा व्यापारी के पास कम्प्यूटर सुविधा नहीं है।
कर प्रदत्त मौजूद स्टॉक पर चुकाये गये पूरे कर की छूट दी जानी चाहिए। पूर्ववर्ती सैल्स टैक्स कानून  के अनुसार अधिक दर से चुकाये गये कर की पूरी छूट मिलनी चाहिए। अगर व्यवहारी द्वारा ऊंची दर से टैक्स चुका गया है तो ऐसी स्थिति में वह वैट इनपुट क्रेडिट का हकदार है। विशेष कर दवाओं के मामले में जहां अधिकतम खुदरा मूल्य पर प्रथम बिन्दु पर कर चुकाया गया है। धारा १९ के प्रावधानों को तद्नुसार तुरंत प्रभाव से परिवर्तित किया जाना चाहिए।
वैट कानून की धारा २५ मे करापवंचना व कर चोरी रोकने के प्रावधान है। इस में किस समय सीमा में कार्यवाही की जा सकती है उसका उल्लेख नहीं हैं। समय सीमा किसी भी कानून में आवश्यक प्रावधान होता है। समय सीमा निर्धारित नहीं होने से विभागीय अधिकारियों द्वारा अनावश्यक परेशान किये जाने का डर रहता है।
एक तरफा फैसलों को पुनः खोलने के अधिकार उपायुक्त, वाणिज्य कर विभाग को दिये गये है। लेकिन उपायुक्त द्वारा आवेदन निरस्त कर दिये जाने की दशा में उनके आदेश के खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं है। उपायुक्त द्वारा आवेदन निरस्त किये जाने के आदेश के विरूद्ध अपील का प्रावधान किया जाना अनिवार्य हैं।
वैट कानून के अंतर्गत माल के आयात निर्यात के दौरान परिवहनित किये जाने वाले घोषणा प्रपत्र शीघ्र छपवाकर उपलब्ध कराये जावे। तथा सभी राष्ट्रीयकृत बैंक को वैट टैक्स जमा करने के लिए अधिकृत किया जावे।
छोटे व्यापारियों की मदद हेतु वैट गणना खरीद व बिक्री रजिस्टर रखने एवं विवरणी तैयार करने के लिए सॉफ्टवेयर विभाग द्वारा निःशुल्क उपलब्ध कराये जाने चाहिए। गुजरात सरकार ने इस दिशा में प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय कदम उठाये है। वहां ऐसा सॉफ्टवेयर निःशुल्क विभागीय साइट से डाउनलोड कर प्राप्त किया जा सकता है।
मंडी टैक्स, मंडियों के विकास के लिए लगाया जाने वाला शुल्क है इस पर वैट टैक्स लगाया जाना अनुचित है स्पष्ट प्रावधान द्वारा मंडी टैक्स पर वैट नहीं लगाये जाने की घोषणा की जानी चाहिए।
व्यवसाय स्थल पर जाकर व्यवहारी फर्म की ऑडिट विभागीय अधिकारियों द्वारा किये जाने का प्रावधान घोर अव्यवहारिक व अदूरदर्शी कदम हैं। इससे भ्रष्टाचार पनपेगा तथा व्यापार व उद्योग को अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप झेलना पडेगा। विभागीय अधिकारियों की दुकान/फैक्टी में उपस्थिति से ग्राहक व श्रमिको को गलत संदेश जायेगा। यह प्रावधान घोर प्रतिगामी है इसे तुरंत वापिस लिया जाना चाहिए।
दवाईयों व कुछ अन्य मदों पर वर्तमान में खुदरा मूल्य पर करारोपण हो रहा है। एम.आर.पी. पर कर को उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार की विधिक शक्ति के भीतर मान लिया हैं। एम.आर.पी. पर टैक्स की वैट में व्यवस्था सराहनीय है, एम.आर.पी. पर बिक्री के प्रथम बिन्दु पर टैक्स चुकाने के बाद पुनः करारोपण नहीं होता है। इसके दायरे में आम उपभोक्ता की एम.आर.पी. आधारित दैनिक आवश्यकताओं की और वस्तुए भी लाई जा सकती है। एम.आर.पी पर कर व्यवस्था में एक सबसे बडी खामी यह है एम.आर.पी ईनवाईस पर चुकाये गये टैक्स को अलग दिखाये जाने की  अनिवार्यता है। ऐसा किया जाना अव्यवहारिक, कष्टकारी, श्रम साध्य व असार्थक प्रावधान है। बिक्री के अंतिम चरण में जहां व्यापारी आमतौर पर उपभोक्ता को माल बेचता है, वस्तु एवं उसके बिल पर एम आर.पी. खुदरा मूल्य कर सहित प्रदर्शित होता है बिल पर मूल्य एवं कर का विभाजन किया जाकर अलग अलग दिखाना अव्यवहारिक व श्रम साध्य है। आम उपभोक्ता के लिए इसकी कोई उपयोगिता भी नहीं  है। खुदरा मूल्य पर चुकाये गये माल (टैक्स पेड ऑन एम.आर.पी.) के बिलों में टैक्स अलग से दर्शाने  की कानूनी बाध्यता को तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए।
डीजल कई उद्योगों यथा सिरेमिक्स, कारपेट वूलन यार्न, मिठाई, नमकीन आदि के निर्माण के लिए अनिवार्य वस्तु है। वर्तमान में ऐसे उद्योगों को डीजल पर चुकाये गये कर का इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं दिया जा रहा है। जबकि डीजल उनकी लागत का एक बडा हिस्सा है। ऐसे महत्वपूर्ण घटकों पर इनुपट टैक्स क्रेडिट नहीं किया जाना वैट कानून की मूल अवधारणा के खिलाफ है। आदर्श वैट प्रणाली की भावना के अनुरूप डीजल पर तुरंत प्रभाव से वैट इनपुट क्रेडिट की जानी चाहिए।
स्वैच्छिक पंजीकरण की दशा में राजस्थान वैट कानून के अंतर्गत राज्य के भीतर कारोबार शुरू करने वाला व्यवहारी स्वैच्छिक पंजीयन हेतु आवेदन कर सकता है। कानून बाध्यकारी पंजीयन एवं स्वैच्छिक पंजीयन में पंजीकरण हेतु प्रतिभूति में बडा अंतर है। स्वैच्छिक पंजीयनकी दशा में १०,००० रूपये की नगद या राष्ट्रीय बचत पत्र के रूप बतौर जमानत जमा करना आवश्यक हैं। जबकि यह व्यवसायी कुछ समय पश्चात् ही उसकी बिक्री ५ लाख हो जाये तो बाध्यकारी पंजीयन की श्रेणी में बिना १०,००० रूपये की जमानत दिये पंजीयन प्राप्त कर सकता है। यह विभेद अनुचित हैं स्वैच्छिक पंजीयन पर १०,००० रूपये की जमानत के प्रावधान को हटाया जाना चाहिए।
व्यवसायी वर्ग को ३१.३.२००६ के स्टॉक पर उपलब्ध इनपुट टैक्स क्रेडिट की राशि को लेकर अभी तक संशय की स्थिति में रखा जा रहा है जबकि वैट का पहला वित्तिय वर्ष समाप्त होने जा रहा है।अभी भी व्यवसायियों को नोटिस देकर इनपुट टैक्स क्रेडिट के सत्यापन के लिए बुलाया जा रहा है। जबकि अधिकतर प्रकरणों में अब तक इनपुट टैक्स क्रेडिट का व्यवहारियों द्वारा समायोजन किया जा चुका है। निवेदन है कि विभाग अब नोटिस देकर जांच के रास्ते को बंद करें तथा करदाता को आश्वास्त करें कि उस द्वारा मांगी गई इनपुट टैक्स क्रेडिट फाइनल हैं लम्बे समय तक जांच को बकाया रख कर व्यापारी पर लटकती तलवार का प्रयोग खेदजनक हैं। कुछ अपवादों को छोडकर जिनमें करापवंचन की सूचना हो, व्यवसायी द्वारा मांगी गयी इनपुट टैक्स क्रेडिट को अविलम्ब फाइनल घोषित किया जाना चाहिए। तथा बकाया रकम पर १२ प्रतिशत की दर से ब्याज भी मिलना चाहिए।
वैट कानून की धारा ७३ के अंतर्गत जिन व्यवहारियों का पर्ण्यावृत (टर्न ऑवर) ४० लाख से ज्यादा है उन्हें सनदी लेखाकार (सी.ए.) से खातों का अंकेक्षण (ऑडिट) करवाकर अंकेक्षण प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होगा। ४० लाख की वित्तिय सीमा वर्तमान में कारोबार के स्वरूप को ध्यान में रखते है काफी कम एवं अव्यवहारिक है। इस सीमा को १०० लााख किया जाना चाहिए। ऑडिट रिपोर्ट का प्रारूप अभी तक जारी नहीं किया गया है। इसे अविलम्ब जारी करें ताकि व्यवहारी यह जान सके की इसमें क्या-क्या सूचनाऐं दी जानी होगी।
कपडा व्यापार से संबंधित कुछ मदों यथा ’’मेड अप्स‘‘ पर लगाये गये कर को हटाने का समिति ने अनुमोदन कर सरकार को मंजूरी के लिए भेज रखा है। दुर्भाग्यवंश आज तक छूट का नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ है। पडौसी राज्यों में ’’मेड अप्स‘‘ पर केाई वैट नहीं है। राज्य के कपडा व्यवसायी की परेशानी को ध्यान में रखते हुए छूट तुरंत घोषित की जानी चाहिए।
मुंगफली तेल व बिलोना तेल मिलों को सरसों तेल मिलों के अनुरूप आयुक्त महोदय द्वारा शीघ्र रिफंड प्राप्त करने योग्य ईकाई धारा १७ (२) में घोषित किया जाना चाहिए। वर्तमान में मुंगफली की खरीद पर ४ प्रतिशत कर चुकाया जा रहा है। तैयार माल, जो कि अधिकतर अंतर्राज्यीय बिक्री पर किया जाता है पर सी.एस.टी.२ प्रतिशत है। ऐसे में २ प्रतिशत टैक्स जो रिफंड बनता है उसमें कार्यशील पूंजी का बडा हिस्सा ब्लॉक होकर व्यावसायिक गतिविधियों पर प्रतिकुल असर डालता हैं। सरसों मिलों के लिए दिनांक १२.१०.२००६ का जारी परिपत्र की तर्ज पर मुंगफली व अन्य तिलहनों पर आधारित मिलों को तुंरत रिफंड की व्यवस्था की जानी चाहिए।
ढाबों के लिए कम्पोजिशन स्कीम की सीमा १ñ



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