सूरतगढ, व्यापार मण्डल के अध्यक्ष मोहनलाल डेलू ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने की मांग की है। पत्र में श्री डेलू ने लिखा है कि राजस्थानी विश्व की समृद्धतम भाषाओं में से एक है। इसका 2500 वर्ष पुराना इतिहास है। इसमें लिखित लाखों हस्तलिखित ग्रंथ संग्रहालयों में पडे हैं। इसी तरह आजादी से पूर्व सम्पूर्ण राजपूताना की रियासतों की राजभाषा राजस्थानी थी। कहा गया है कि भाषा विज्ञान के आधार पर राजस्थानी एक स्वतंत्र भाषा है। अध्यक्ष ने पत्र में बताया कि मराठी, हिन्दी, ब्रज, नेपाली का आदिकाल, मध्यकाल का साहित्य लिपि मुडिया में लिखा गया है। राजस्थानी स्वतंत्र व्याकरण है। पाकिस्तान में जो राजस्थानी व्याकरण चलती है उसका नाम राजस्थानी कायदौ है। शिकांगो विश्वविद्यालय अमेरिका के दक्षिण एशियाई भाषा विभाग में राजस्थानी व्याकरण चलती है। इसके कई तरह के शब्दकोष हैं। पदमश्री सीताराम लालस का सबसे बडा राजस्थानी शब्दकोष है, जिसमें 2 लाख 50 हजार शब्द हैं। कहा गया है कि केन्द्र सरकार की साहित्य अकादमी में भारतीय भाषाओं के समकक्ष राजस्थानी को मान्यता दे रखी है। साथ ही दुनिया भर में शोधार्थी राजस्थानी विषयों में शोध कर रहे हैं। श्री डेलू ने बताया है कि दुनिया भर के सांस्कृतिक समारोहों में राजस्थानी कलाकार अपनी अमिट छाप छोड चुके हैं। अनेक तर्क देते हुए डेलू ने कहा है कि इतनी गौरवशाली इतिहास वाली राजस्थानी भाषा का नाम भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित नहीं होना 13 करोड राजस्थानियों का अपमान है और हमारे जनप्रतिनिधि अपनी भाषा में शपथ नहीं ले सकते यह जनतंत्र का हनन है। पत्र में चेतावनी दी गई है कि अगर राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं दी गई तो जनता का धैर्य टूट जाएगा और उग्र आंदोलन का रूप ले लेगी।