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सेवा धर्म छूटा पीछे, बांसवाडा मे चिकित्सा व्यवस्था बनी धंधा

14 Jan 2008
बांसवाडा जिले में चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं बनी धंधा, सरकारी और प्राईवेट डॉक्टरों की जुगलबंदी से मरीज भगवान भरोसे, सरकारी मशीनरी से गायब हुई ईमानदारी, आदिवासी क्षेत्र बने डॉक्टरों की प्रयोगशाला और मरीजों की मण्डी डॉक्टरों में लगी होड पैसा बनाने की, सेवा का धर्म पीछे छूटा, अस्पतालों में करोडों के काम बेमानी, सरकारी डॉक्टरों की रुचि प्राईवेट अस्पतालों में
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बांसवाडा (वागड विजन), राजस्थान का जनजाति बहुल बांसवाडा जिला चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं में अराजकता के नाम पर हर हमेशा चर्चित रहा है। इस समूचे क्षेत्र में अब यह सेवाओं की बजाय धंधे के रूप में जबर्दस्त फल-फूल रहा है। इसमें विभागीय अधिकारियों के साथ ही पुलिस और प्रशासन से लेकर राजनेताओं तक की शह मिल रही है।
हाल के वर्षों में बांसवाडा जिले में चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और अराजकताओं का जो ताण्डव मचा वह बेमिसाल है।
बांसवाडा जिला मुख्यालय सहित जिले भर में चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं और कार्यक्रमों तथा निर्माण कार्यों के नाम पर करोडों रुपयों की धनराशि खर्च की गई मगर मानव संसाधन में मूल्यहीनता और संवेदनशून्यता की वजह से यह जगत सेवा से कहीं ज्यादा अब धंधा बन चला है। कुछेक डाक्टरों और चिकित्साकर्मियों को छोड दें तो हालत अत्यन्त दयनीय ही है।
विभागीय अधिकारियों की स्थिति यह है कि वे राजनेताओं और आला अफसरों के पूछल्ले बनकर उनकी शरण में स्वच्छन्द होकर हर मनचाहा काम कर गुजरते रहे हैं। विभागीय अधिकारियों की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि वे पुलिस और प्रशासन तथा सत्तारूढ एवं विपक्षी सभी तरह के नेताओं को खुश करने का रामबाण वशीकरण मंत्र सिद्ध कर चुके हैं।
बांसवाडा जिला मुख्यालय के राजकीय महात्मा गांधी चिकित्सालय के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी लम्बे समय से विवादों में हैं। जनता के रहनुमाओं की कृपा से जूनियर होते हुए भी पीएमओ के पद पर बैठकर उक्त अधिकारी के कार्यकाल में विवादों का लम्बा सिलसिला चला। उनके खिलाफ जांचें भी विचाराधीन रही हैं। प्रदेश के एक काबीना मंत्री ने तो कलक्ट्री में अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों की मौजूदगी में पांच-छह माह पूर्व ही पीएमओ को एपीओ कर देने के निर्देश दिए थे। लेकिन काबीना मंत्री के आदेश भी हवा हो गए।
बांसवाडा जिला मुख्यालय सहित जिले भर में नीम-हकीमों का जाल फैला हुआ है और ईलाज के नाम पर सैकडों दुकानें चल रही हैं। इसी प्रकार जिले में सौ से अधिक प्राईवेट नर्सिंग होम और प्रसूति केन्द्र चल रहे हैं। गरीबी से त्रस्त जनजाति बहुल बांसवाडा जिले में मरीजों को मौत की दावत देने वाली, पैसा बनाने वाली इन फैक्ट्रियों द्वारा चिकित्सा और स्वास्थ्य विभागीय मानदण्डों का पालन तक नहीं किया जा रहा है। एनेस्थेसिएसिस्ट कहीं हैं नहीं, ईलाज के यंत्र नहीं हैं, ब्लड बैंक और जांच की सुविधाएं तक नहीं हैं, बावजूद इसके धडल्ले से ऑपरेशन किए जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन सुविधाओं की स्पष्ट उपलब्धता के बारे में आदेश दिए हुए हैं मगर जिले में कहीं कोई पालना नहीं हो पा रही है।
नर्सिंग होम और प्राईवेट अस्पतालों में नर्स-कंपाउण्डर के नाम पर जो लोग लगे हुए हैं वे अनपढ हैं या कम पढे-लिखे हैं। चिकित्सा और स्वास्थ्य विभागीय अधिकारियों और जिला प्रशासन के अफसरों के लिए काली कमाई के इस बहुत बडे बाजार में सब जायज हो चला है। इंसानों की मौत इनके लिए कोई मायना नहीं रखती। हालात ये हैं कि ज्यादातार ऐसे केन्द्रों में स्टरलाइज करने तक की व्यवस्था नहीं है।
एकाध को छोडकर जिले का एक भी निजी अस्पताल या नर्सिंग होम चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के निर्धारित मानदण्डों को पूरा नहीं कर रहा है। लेकिन अफसरों और नेताओं को खुश करने के सारे मानदण्डों पर खरे उतरने की वजह से सेवा के नाम पर सरेआम लूट का यह धंधा बेरोकटोक जारी है। इन निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की गतिविधियों के निरीक्षण पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ज्यादातार में चोरी छिपे लिंग परीक्षण और अवैध गर्भ समापन की गतिविधियां होने लगी हैं। कभी-कभार मरीजों की मौत पर बवाल उठता है तब खानापूर्ति के लिए जिला प्रशासन और चिकित्सा विभाग के अधिकारी अच्छा अभिनय कर लेते हैं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बचा लेते हैं प्राइवेट डॉक्टरों को
प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टरों की लापरवाही से मौत के मुंह में समा जाने वाले मरीजों का पोस्टमार्टम भी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर करते हैं, ऐसे में निजी अस्पतालों में जाकर मोटी रकम पाने वाले ये डॉक्टर पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी ऐसी दे देते हैं जिससे प्राईवेट अस्पताल के दोषी डॉक्टर साफ-साफ बच निकलते हैं।
जिला और पुलिस प्रशासन का भी इसमें सहयोग कम नहीं आंका जा सकता। जानकार लोगों का यह भी कहना है कि कई बार निजी नर्सिंग होम में ईलाज के दौरान् संभावित मौत को देखकर ये डॉक्टर मरीज की किडनियां और दूसरे महत्वपूर्ण अंग निकाल लेते हैं और इन्हें देश-विदेश के बडे गिरोहों को बेच देते हैं।
आम तौर पर ऐसे मरीजों के पोस्टमार्टम से मृतक के परिजनों धार्मिक रूढय की वजह से बचते हैं लेकिन यदि कुछ मामलों में बवेला मचने पर पोस्टमार्टम हो भी जाए तो पोस्टमार्टम करने वाले वे ही सरकारी डॉक्टर होते हैं जिनके इन धंधेबाजों से दोस्ताना रिश्ते होते हैं। इसी प्रकार किसी भी प्रकार की बीमारी वाले मरीज के ऑपरेशन के वक्त उसकी एक किडनी निकाले जाने की आशंकाएं भी बनी रहती है। गरीब और अशिक्षित जनता को पता ही नहीं चलता कि उसकी एक किडनी डॉक्टर ने बडी ही चालाकी से निकाल ली है।
इस तरह की कारगुजरियां कर लाखों का खेल खेलने वाले प्राईवेट डॉक्टरों के लिए सरकार के नुमाइन्दों और सरकारी डॉक्टरों को खुश करना कौन सी बडी बात है।
आदिवासी क्षेत्रों में नर्सिंग होम या प्राइवेट अस्पताल चलाना मौजूदा समय में सबसे अच्छा धंधा बन गया है। अधिकांश नर्सिंग होम या प्राईवेट अस्पताल इनके मालिकों द्वारा खुद चलाए जा रहे हैं। इनमें पूरा परिवार ईलाज से लेकर आपरेशन तक के काम कर डालता है क्योंकि जब धंधा ही बना डाला है तो परिवार से बाहर पैसा क्यों जाए। कहीं भी जूनियर डॉक्टर तक नहीं है, दूसरे पदों के बारे में तो सोचना भी व्यर्थ है। परिवार के लोग और घर के नौकर-चाकर मिलकर ही इन नर्सिंग होम्स और प्राईवेट अस्पतालों/क्लीनिकों को चला रहे हैं।
तनख्वाह सरकार से, सेवा प्राईवेट अस्पतालों में
प्राईवेट अस्पतालों और नर्सिंग होम्स की सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के साथ इस कदर जुगलबन्दी है कि जब भी कोई समस्या भरा मामला आता है तब ये सरकारी अस्पताल के डॉक्टर को कॉल कर लेते हैं। सरकारी डॉक्टरों की हालत ये है कि वे सरकारी अस्पताल में अपनी अच्छी सेवाएं दें या न दें, मगर प्राईवेट अस्पताल के कॉल पर झट पहुंच जाते हैं,  भले ही वे सरकारी ड्यूटी पर क्यों न हों। न मरीज की चिन्ता, न नियंत्रण अधिकारियों का भय। सरकारी डॉक्टर ऐसे कामों में अपने आकाओं को हर हमेशा खुश रखते हैं ताकि सब लोग खुशी-खुशी सरकारी नौकरी का लुत्फ उठा सकें। अपने घरेलू क्लीनिकों की कमाई से भी इनका पेट नहीं भरता। सरकारी तनख्वाह काफी कम होने से परेशान इन सरकारी डॉक्टरों के लिए प्राईवेट क्लीनिक या नर्सिंग होम वरदान बने हुए हैं।
मरने वाले मरते रहें, हमें क्या?
प्राईवेट क्लीनिकों और नर्सिंग होम्स में डॉक्टरों की लापरवाही से हर माह काफी संख्या में लोगों की मौतें होती हैं। लेकिन इनके संचालकों द्वारा इनकी मौत की सूचना ग्राम पंचायतों अथवा नगरपालिकाओं को कभी नहीं भेजी जाती। जबकि जन्म या मृत्यु की सूचना जन्म मृत्यु पंजीयन अधिनियम म भिजवाने के लिए ये कानूनन बाध्य हैं। इन हालातों के बावजूद जन्म मृत्यु पंजीयन के मुख्य रजिस्ट्रार के रूप में न तो किसी कलक्टर में इनके खिलाफ कार्यवाही का साहस रहा है, न ही सांख्यिकी विभाग में।
सरकारी डॉक्टरों के भरोसे चल रहे हैं निजी अस्पताल
बांसवाडा मुख्यालय और जिले के विभिन्न क्षेत्रों में बडी संख्या नर्सिंग होम और प्राईवेट अस्पताल ऐसे हैं जिनमें सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और सरकारी चिकित्सा व स्वास्थ्यकर्मी (नर्स, कंपाउण्डर, टैक्नीशियन और चपरासी) अपनी सेवाएं देते हैं। कई अस्पताल और नर्सिंग होम ऐसे हैं जिनमें कोई डॉक्टर नहीं है लेकिन इनमें मरीजों को भर्ती करने से लेकर सभी प्रकार के ऑपरेशन और ईलाज होते हैं। ये काम सरकारी डॉक्टरों और चिकित्साकर्मियों के पवित्र हाथों से होते हैं।
यहां नहीं, वहां अच्छा ईलाज होता है
बांसवाडा जिला मुख्यालय के राजकीय महात्मा गांधी चिकित्सालय सहित जिले के काफी सरकारी अस्पतालों की हालत ये है कि जब भी कोई मरीज ईलाज या ऑपरेशन के लिए वहां प्रवेश करता है, दलाल उसके पीछे पड जाते हैं और कहते हैं कि यहां नहीं, वहां ईलाज और ऑपरेशन कराओ, अच्छा काम होगा। फिर निजी अस्पतालों में काम करने वाले सरकारी डाक्टर और चिकित्साकर्मी भी ऐसे मरीजों को अपने लाभ के लिए सरकारी अस्पतालों की छवि खराब होने की बात कह कर अपने निर्जी नर्सिंग होम या प्राईवेट अस्पताल में भेज देते रहे हैं।
सरकारी क्षेत्र के कई डॉक्टर, कम्पाउण्डर, नर्स आदि निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में नियमित सेवाएं देते हैं। ऐसे सरकारी नुमाइन्दों द्वारा अपने व्यक्तिगत लाभ और पैसा बनाने की गरज से सरकारी अस्पतालों की छवि को जानबूझकर बिगाडा जा रहा है। ये लोग सरकारी अस्पतालों में रुचि से काम नहीं करते हैं और इनका सारा समय मरीजों को अपने निजी केन्द्रों की ओर भेजने पर केन्दि्रत होता है।
गांवों में हालत खराब
ग्रामीण क्षेत्रों में एक ओर नीम-हकीमों का जाल बिछा है, आदिवासियों और गरीबों में कुपोषण तथा अन्य कारणों से बीमारियों का संक्रमण है, ऐसे में सरकारी उप स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, अस्पतालों आदि में से अधिकांश में डॉक्टरों व चिकित्साकर्मियों की ड्यूटी समय में मौजूदगी नहीं रहती। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के जिलाधिकारियों से सांठ-गांठ के चलते इनके खिलाफ कभी कोई प्रभावी कार्यवाही भी नहीं हो पाती।
सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कमी और सरकारी चिकित्साकर्मियों की ड्यूटी के प्रति संवेदनहीनता ही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से नीम-हकीमों और प्राईवेट क्लीनिकों का धंधा परवान चढ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी चिकित्सा विभागीय सेहत के रखवालों के प्राईवेट डॉक्टरों से रिश्ते पारिवारिक हो चले हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में संविदा के आधार पर लगे डॉक्टरों को भी कोई भय नहीं है। कभी आगे की पढाई के नाम पर, तो कभी और किसी बहाने, ये पदस्थापन स्थल से गायब रहते हैं या ड्यूटी के प्रति लापरवाह रहते हैं।
क्षेत्रवासियों में इस बात को लेकर आश्चर्य है कि भवानी जोशी जैसे अव्वल दर्जे के ईमानदार, जनता के लिए समर्पित एवं लोकसेवी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य राज्यमंत्री के अथक प्रयासों के बावजूद इन हालातों पर कोई काबू क्यों नहीं पाया जा सका है। जबकि भवानी जोशी की बदौलत ही बांसवाडा जिले में चिकित्सा सेवाओं की वहबूदी के नाम पर करोडों रुपया खर्च हुआ है।
बांसवाडा जिले के बुद्धिजीवियों और विभिन्न संस्थाओं की ओर से जिले की चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली तथा इस क्षेत्र में व्याप्त भारी गडबडयों को लेकर राज्य और केन्द्र सरकार को विस्तृत ज्ञापन भिजवाए गए हैं। इनमें माग की गई है कि बांसवाडा जिले के इन हालातों पर विस्तृत जांच तथा कार्यवाही के लिए न्यायिक अधिकारियों का उच्चस्तरीय मिशन बनाकर बांसवाडा भेजा जाए तथा बांसवाडावासियों के हित में सख्त निर्णय लिए जाएं।



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