डूंगरपुर 14 जनवरी/कल्पना कीजिए कि आपकी हथेली पर एक अलमारी हो, जिसमें आम अलमारी की तरह ही रेक्स बनी हो और मजे की बात तो तब है कि जब उनमें छोटी - छोटी किताबें ह जिनके पृष्ठ भी एक - एक कर खुलते जाएं और आप चाहें तो उन्ह पढते जाएं। चौंक गए न ! वैसे तो यह एक कपोल कल्पित बात लगती है परन्तु इसे सच कर दिखाया है भीलूडा के डॉ रजनीश जैन ने, जिन्होंने बनाया है हथेली से भी कम आकार का एक छोटा सा पुस्तकालय जिसे वे विश्व का सबसे छोटा पुस्तकालय कहते ह।
डूंगरपुर जिले के एक गांव भीलूडा के मूल निवासी डॉ रजनीश पेशे से चिकित्सक हैं और सागवाडा में अपना क्लिीनीक चलाते हैं। इनकी खासियत यह है कि वे पुस्तकों में छपे अक्षरों को छोटे से छोटे रूप में लिखते हैं और वह भी छोटे - छोटे कागजों पर, जिन्हें वे बाद में जोडकर एक पुस्तक का रूप दे देते हंे। रजनीश ने कई धार्मिक पुस्तकों को इस प्रकार छोटी - छोटी पुस्तकों के रूप में बदला है। और तो और इन्होंने अब इन पुस्तकों को कांच की बनी एक छोटी सी अलमारी में सजा कर रखा और इसे नाम दिया है मिनी पुस्तकालय। रजनीश बताते हैं कि इस वर्ष उन्होंने अपनी सबसे छोटी कलाकृति का निर्माण किया है जो कि उनके द्वारा अब तक तैयार की गई पुस्तकों में सबसे छोटी पुस्तक है। ॰.9 मिलीमीटर आकार की इस पुस्तक में 7 पृष्ठ हैं, जिसमें कि णमोकार महामंत्र लिखा गया है। रजनीश ने बताया कि इस पुस्तक में लिखे हुए अक्षरों का निर्माण उन्होंने नंगी आंखों से किया है। जबकि इस पुस्तक को पढने के लिए मैग्नीफाईंग ग्लास या सुक्ष्मदर्शी यंत्र की आवश्यकता रहती है।
वे कहते हैं कि इस प्रकार की सुक्ष्म रचना करने से उनकी एकाग्रता बढती है वहीं आध्यात्मिकता जगाने में यह कार्य सहायक रहा है। 28 वर्षीय रजनीश का जन्म 16 दिसंबर 1979 को हुआ। इनके पिता का नाम नरेन्द्र कुमार जैन व माता का नाम पुष्पा देवी जैन है। अपनी कॉलेज शिक्षा के दौरान एक बार ध्यान करते हुए उन्हें पहली बार इस तरह के किसी कार्य को करने की प्रेरणा मिली और वे इस कार्य में जुट गए। अहर्निश एकाग्रता पूर्वक किये गए श्रम की परिणिति हुई उनकी प्रथम सुक्ष्म पुस्तक ’ आदिनाथ चालीसा’ के रूप में जो कि मात्र 5 मिमी की है।
इसके बाद रजनीश ने पीछे मुड कर नहीं देखा और कई किताबों को इसी रूप में लिख दिया। उन्होंने 22 पृष्ठीय महावीर चालीसा, आशा रामायण, 1.8 मिमी आकार का 32 पृष्ठीय गीता सार जिसमें 284 शब्द हैं लिखे। रजनीश ने बताया कि वे अब तक 35 पुस्तकें लिख चुके हैं और उनकी कला - यात्रा आज भी जारी है। व्यस्त दिनचर्या में वे अपने मरीजों को देखते हैं, वहीं कुछ समय अपनी कला के लिए भी निकाल लेते हैं।
वे बताते हैं कि यह कार्य श्रमसाध्य तो है ही परन्तु इसमें सर्वाधिक आवश्यकता धैर्य और एकाग्रता की रहती है। वे इन्हें सामान्य कागजों पर पेन्सिल और पेन से लिखते हैं। लिखते समय वे किसी भी तरह के सुक्ष्मदर्शी यंत्र अथवा मैग्निीफाईंग ग्लास का प्रयोग नहीं करते है लेकिन इसे नंगी आंखों से सिर्फ देखा जा सकता है पढा नहीं जा सकता। सिर्फ पुस्तक ही नहीं वे 1.1 सेमी आकार के ग्रीटिंग भी बना चुके हैं और इन शुभकामना कार्डों को इन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सहित कई विशिष्ट लोगों को प्रेषित भी किया है।
इतना ही नहीं रजनीश विश्व की सबसे छोटी पतंग बनाने का दावा भी करते हं। श्रम करते हुए उन्हें तब अपार हर्ष हुआ जब वे 5 गुणा 5 मिलीमीटर की पतंग बनाने में सफल हुए और इस पतंग को उडाए जाने योग्य बनाया। विगत दिनों वे बांसवाडा में राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया एवं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य राज्यमंत्री भवानी जोशी के समक्ष इस पतंग को उडाने का प्रदर्शन कर चुके हैं।
रजनीश पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत, मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के हाथों प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त सामाजिक एवं स्थानीय स्तर पर भी सम्मानित किए गए हैं। शिल्पग्राम में भी रजनीश को इस कला के लिए स्वर्ण पदक प्रदान किया जाकर सम्मानित किया गया है।
उनकी इच्छा अब इस कार्य को गिनीज बुक में दर्ज करवाने की है। जिसके लिए वे अपने कार्य को पूर्ण उपयुक्त समझते हैं। इसके लिए वे निरन्तर प्रयासरत भी है। वहीं उनकी इच्छा एक ऐसे मंच की स्थापना को लेकर है जहां वे अपनी इन सुक्ष्म कलाकृतियों का प्रदर्शन आम लोगों और देशी - विदेशी पर्यटकों के समक्ष कर सकें। इस संबंध में गत दिनों उन्होंने जिला कलक्टर नीरज के. पवन से भी मुलाकात की। कलक्टर ने उन्ह इसे स्थानीय जिला संग्रहालय में प्रदर्शित करने के लिए कहा। वहीं कला को प्रोत्साहन हेतु 50 हजार रूपयों तक के ऋण की स्वीकृति का भी आश्वासन दिया।