मरू परम्परा में काव्य पाठ का हुआ आयोजन
14 Oct
2006
मरु परम्परा की मासिक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संध्या के अंतर्गत आज हिन्दी के प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीनारायण रंगा का काव्य पाठ सम्मपन्न हुआ। राजस्थानी और हिन्दी के प्रसिद्ध गीतकार शिवराज छंगाणी के सान्निध्य में सम्पन्न हुए इस आयोजन में श्री रंगा ने एक घण्टा पंद्रह मिनट तक अनवरत काव्य पाठ किया। अपने सस्वर काव्यपाठ में रंगा ने पिता, मुझे कफन मत ओढाओ, आवाज की मौत, दुमदार आदमी, आज की आवाज, अंतरराष्ट्रीय खटमल, मुझे रबर का बबुआ बना दो सहित इम्पोर्टेड गधों का देश, मदर्स डे जैसी व्यंग्यपरक काव्य रचनाएँ भी सुनाई।
अपने अध्य्क्षीय उद्बोधन में श्री शिवराज छंगाणी ने कहा कि रंगा का विविधवर्णी काव्य संसार हमारे अपूर्व अनुभव की छवियों में पूर्णता का रंग भरता है। उन्होंने रंगा के बहुआयामी व्यक्तित्व से आई संवेदना को उनकी काव्य ताकत करार दिया। कार्यक्रम में जनकवि हरिश भादाणी, भवानी शंकर व्यास"विनोद", गोपाल जोशी, बुलाकी शर्मा, मुलचंद रंगा, आदि उपस्थित थे।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में संस्था के निदेशक डा श्रीलाल मोहता ने काव्य संध्याओं की पुनर्वापसी के क्रम में संस्था की पहल को और उसके महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम संयोजन डा बृज रतन जोशी ने किया। आभार श्री लाल जोशी ने प्रकट किया।
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