उदयपुर, 12 नवम्बर। देश विदेश में आध्यात्मिक नृत्यों के माध्यम से अपनी विशेष पहचान बना चुकी सुफी नृत्यंगना जिया लेम्ब्रू व उसके साथी कलाकारों ने गुरूवार शाम को यहां एतिहासिक जगमन्दिर में भारतीय शास्त्रीय संगीत व सूफी की वैभवता लिये काव्य रचनाओं पर आधारित नृत्यों के प्रदर्शन से करीब डेढ घण्टे तक उपस्थित सैकडों दर्शकों को बांधे रखा। इन प्रस्तुतियों के दौरान नृत्यांगना जिया की रोचक अदाकारी व चेहरे की भाव भंगिमाओं की अनूठी झलक से दर्शक कई बार भाव विभोर हो गये वही जलालूउददीन रूमी की काव्य रचनाओं ने उपस्थित अतिथियों की तालियां बटोरी। सशक्त प्रस्तुतियों में जिया ने कई बार देश व विदेश की एक मात्र सुफी नृत्यांगना होने तथा रूमी की काव्य रचना पर नृत्य के कम्पोजशन करने के पीछे रहे घण्टों रियाज को भी बखुबी दर्शाया। अपने आप में एक के बाद एक अनूठी प्रस्तुतियों में कलाकार ने ना केवल दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया, वहीं इन नृत्य विद्या के माध्यम से सुफी की पवित्रता व भगवान की आराधना के विरल प्रयास के साथ भगवान की आराधना से भी जोडे रखा।
महाराणा मेवाड चेरिटबल फाउण्डेशन द्वारा कार्तिक पूर्णिमा के उपलक्ष्य में आयोजित इस भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस नृत्य संध्या के मुख्य अतिथि श्रीजी अरविन्द सिंह मेवाड थे। समारोह में महाराज कुमार लक्ष्यराज सिंह मेवाड , बाईसा पदम्जा कुमारी मेवाड सहित राव उमराव, जागिरदार आदि उपस्थित थे।
जगत पिता बहमा के आराधना दिवस के रूप में मनाये जाने वाले कार्तिक पूर्णिमा के उत्सव के अवसर पर एतिहासिक जगमन्दिर में आयोज्य सुफी नृत्यों की पवित्र व पावन प्रस्तुतियां करीब डेढ घण्टे तक अनवरत रूप से जारी रही, जिसे छह से अधिक सह वाद्ययन्त्र कलाकारों व इतनी ही नृंत्यागनाओं के साथ जिया लूम्ब्रे ने अपनी मौलिक अदाओं के साथ बेहतरीन व भावपूर्ण प्रस्तुतियां दी। कार्यक्रम की शुरूवात समूह प्रार्थना से हुई । आडिसी नृत्य शैली मे कलाकारों ने इस प्रस्तुतियों के माध्यम से सृष्टि के निर्माता बहमा, इसके तत्वों के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर की ।
सुफीज - रिलिजियन ऑफ लव पर आधारित नृत्यों की पक्षधर इस कलाकार ने नृत्यों के दौरान सुफीज के महत्व, इसकी उत्पति कहाँ से होने पर प्रकाश डाला। आज की उनकी सारी प्रस्तुतियां मौलाना जलालूउददीन रूमी की काव्य रचनाओं पर तथा सुफी संगीत के अलावा ओडिसी मुद्राओं के ट्रांसलेशन पर आधारित थी। जिसके मूल भाव में इन नृत्यों को एतिहासिक व धार्मिक ईमारतों पर करने से, जहां मन को सकूनू मिलता है, वही प्यार की भावना तथा इसमें समर्पण की तथा उसकी पवित्रता और बढ जाती है । इन प्रस्तुतियों के दौरान विभिन्न आश्वर्यजनक, रोमांचकारी, व मनभावन चक्रों के साथ कलाकार ने ईश्वर के दोनो गुणो सगुण व निणुण का रोचक मनोहारी प्रदर्शन किया जिसने सम्पूर्ण प्रस्तुतियों के दौरान कई बार दर्शकों को झमने पर मजबूर कर दिया। सारी प्रस्तुतिय के मध्य काव्य पाठ का वाचन सूत्रधार जफर अली कराचीवाला, तथा टीवी कलाकार सोहराब आर्देशर व शहनाज पटेल ने किया ।
पूरी कार्यक्रम के दौरान कुल 12 प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बांधे रखा जिसमें कलाकारों की समूह व एकल प्रस्तुतिय शामिल थी। कलाकार के प्रदर्शन के पीछे की रचनाओं के भाव को कलाकार ने इस तरफ से प्रस्तुत किया कि जिस तरह आसमान में प्यार नही है तो वह साफ नही रह सकता, सूर्य में प्यार नही तो वह तपन के साथ उजाला नही दे सकता, नदियों में प्यार नही है तो आगे नही बढ सकती और पहाडों व जमीनों में प्यार नही है तो वह उपजाऊ नही हो सकते है। यह सारी भावनाएं जिया व उसके साथी कलाकारों के नृत्यों की कॉरियोग्राफी व चेहरे की भाव भंगिमाओं से भी साफ झलकी। नृत्यों में कलाकारों के हाव भाव, हाथों के संचालन, पैरों के सन्तुलन का प्रभाव अत्यन्त ही सुन्दर था। नृत्यों के दौरान एक साथ कई चक्करों के समावेश व सुन्तलन पर खुब दाद लूटी गई। सम्पूर्ण कार्यक्रम के दौरान कलाकारों व सह वाद्ययन्त्र वादकों ने अपनी अपनी प्रतिभाओं के कौशल का बेहतरीन प्रदर्शन किया। नृ्त्यों का निर्देशन व परिकल्पना स्वयं जिया लूम्बे* का था। गीतों को शास्त्रीय व सुफी शैली में मोहम्मद असदी ने गाया। संगीत संयोजन विक्रमजीत सिंह का था, वायलिन पर आमिर अली कमल, बंासुरी पर हिमांशु कनकिया, तरूण मिश्रा आदि ने संगत की। नृत्यों के दौरान प्रकाश प्रभाव संयोजन ने भी दर्शकों को प्रभावित किया। साथी कलाकारों में भावना शर्मा, अदिति मीरवानकर, श्वेता शेटटी, धनश्री मेनवार, तन्वी मेहरा व आशा नम्बाना ने भी दर्शकों का दिल जीता।
समारोह की शुरूवात मुख्य अतिथि श्रीजी अरविन्द सिंह मेवाड ने दीप प्रज्वलित कर की । श्रीजी अरविन्द सिंह मेवाड ने कहा कि प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने के लिये कडी मेहनत व सच्ची लगन की आवश्यकता होती है। सच्चे कलाकार की साधना वही है जो कलाकार लगन के साथ साध ले ।
उन्होंने कहा कि जिया लूम्ब्रे ने अपनी प्रस्तुतियों में प्रेम को परिभाषित करते हुये काव्य को भी नृत्य के माध्यम से परिभाषित करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की है। श्रीजी ने कहा कि कार्तिक पूर्णिमा के उपलक्ष्य में इन नृत्यों का प्रदर्शन ईश्वर के प्रति सृष्टि की सच्ची सरंचना का अनूठा उदाहरण व प्रेम प्रदर्शन है। कार्तिक पूर्णिमा का आज भी आदमी के जीवन काल में महत्वपूर्ण है। तथा मेवाड राजघराने में इस दिन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से कलाकारों को प्रोत्साहित करने की परम्परा कालान्तर से चली आ रही है। बहमा द्वारा रचित इस सृष्टि में हम अपने दायित्वों का ठीक ढंग से निवर्हन करे, ताकि इसका सुन्दर स्वरूप अक्षुण्य रह सके और वर्तमान पीढी को भावी पीढी के सामने किसी भी प्रकार से शर्मिन्दा ना होना पडे ।
उन्होंने कहा कि सृष्टि के पंच तत्वों का सन्तुलन बनाये रखने के लिये हमें सकारात्मक प्रयास करने होगे ताकि कार्तिक पूर्णिमा मनाये जाने की सार्थकता पूर्ण हो सके। उन्होंने कहा कि नृत्य, प्यार, सौहार्द, और प्रेम की एक विशेष भाषा है ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्रीजी ने सुफी नृंत्यागना जिया लूम्ब्रे व उनकी टीम के सारे साथी कलाकारों का पुष्पहार भेंट कर अभिनन्दन किया । शुरू में सुफी कत्थक नृंत्यागना मंजरी चतुर्वेदी ने जिया व उसकी टीम का परिचय तथा कार्यक्रम में प्रस्तुत किये जाने वाले परर्फोमेसेंस के बारे में बताया। । इस अवसर पर भव्य आतिशबाजी की गई ।