मीडिया ट्रायल की सीमाएं निर्धारित होनी चाहिए - मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन 15 Dec
2007
भारत के मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन ने लम्बित प्रकरणों के निस्तारण के लिए मोबाईल कोर्ट की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि न्यायिक मामलों में मीडिया ट्रायल की सीमाएं निर्धारित होनी चाहिए
जयपुर, मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन शनिवार को जोधपुर के जयनारायण व्यास स्मृति भवन टाऊन हॅाल में बार काउंसिल अॅाफ इण्डिया एवं बार काउंसिल अॅाफ राजस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय नेशनल लॅा कान्फ्रेंस का दीप प्रज्ज्वलित कर उद्घाटन करने के बाद मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। उन्होंने कहाकि मीडिया ट्रायल से सेसन एवं मजिस्ट्रेट कोर्ट सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हैं। देश में इसके नियंत्रण के लिए अभी तक कोई कठोर कानून नहीं है। ब्रिटेन एवं आस्ट्रेलिया आदि देशों में इसके लिए कानून बनाकर सीमाएं निर्धारित की गई है।
उन्होंने कहाकि नए कोर्ट बनाने के लिए फण्ड दिया जाना आवश्यक है। विभिन्न अदालतों में लम्बित मामलों के निस्तारण में गत वर्ष २५ प्रतिशत की वृद्वि हुई, लेकिन नए मामलों को दर्ज करने में ३० प्रतिशत की वृद्वि होने से यह कार्य और कठिन हो गया है। देश के चौदह हजार न्यायाधीश लंबित प्रकरणों की संख्या के हिसाब से काफी कम हैं। उन्होंने कहाकि लंबित प्रकरणों के मामले में ध्यान देने योग्य बात यह है कि पंाच वर्ष से पुराने लंबित प्रकरणों की संख्या कुल मामलों के मुकाबले १० से १५ प्रतिशत ही है।
उन्होंने लंबित प्रकरणों के शीघ्र निस्तारण के लिए दूर दराज गांवों में मोबाईल कोर्ट की आवश्यकता पर बल दिया। यह कार्य तभी संभव है जब इसके लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारें पर्याप्त फण्ड प्रदान करें । उन्होंने कहाकि भूमण्डलीकरण की चुनौतियों से भारतीय लीगल प्रणाली भली भांति प्रतियोगिता करने में सक्षम है। विधि के क्षेत्र में अच्छे शिक्षण संस्थान हैं और मेधावी विधिवेता तैयार हो रहे हैं। विदेशी लीगल प्रणाली को समझने के लिए विदेशों में विद्यार्थियों को भिजवाया जाना चाहिए। इसके लिए बार कौंसिल भली भांति विचार विमर्श कर प्रस्ताव तैयार करें। उन्होंने प्री बारगेनिंग के मामले में भी सर्तक रहने पर बल दिया तथा लीगल फ्रेम वर्क में ही बहस करने की जरूरत बतायी।
विशिष्ट अतिथि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे ने कहाकि सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए लोकतंत्रिक व्यवस्था के सभी स्तम्भों की सहभागिता जरूरी है। उन्होंने सहज एवं त्वरित न्याय की आवश्यकता बताते हुए कहाकि न्यायालयों में लम्बित मामलों का त्वरित निस्तारण की जरूरत है। नागरिकों को सामाजिक एवं आर्थिक न्याय के साथ ही उनके अधिकारों की रक्षा होनी भी जरूरी है। उन्होंने कहाकि ऐसी शासन प्रणाली सर्वोतम है जो सामान्य लोगों की आकंाक्षाओं को पूरा करें। उन्होंने न्यायिक प्रणाली में सूचना कंरंति के युग में अधिकाधिक सूचना टेक्नोलोजी के उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया ।
उन्होंने फास्ट ट्रेक न्यायालयों में त्वरित न्याय प्रदान करने की सफलता पर चर्चा की और कहाकि लोक अदालतों आदि के प्रयोग कारगर साबित हो रहे हैं। उन्होंने जोधपुर में विधि शिक्षा के लिए जोधपुर में केन्द्र स्थापित करने की जरूरत पर बल दिया और कहाकि राज्य सरकार इसकी सफलता में अपना पूरा सकि्रय सहयोग देगी। उन्होंने कहाकि देश में दो भारत दिखाई देते हैं एक तरफ अकूत सम्पति, संसाधन व सेवाएं हैं वहीं इसके विपरीत गरीबी, कुपोषण तथा साधनविहिनता दिखाई देती है। उन्होंने सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सभी का उत्थान करने के लिए सभी के सहयोग की सहभागिता पर बल दिया।
केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहाकि रूल आफ ला के आधार पर ही लोकतंत्र चलता है। इसे सुचारू बनाने के लिए विधिवेता एवं न्यायाधीशों की मुख्य भूमिका होती है। सभी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का भली भांति निर्वहन करें तो आम आदमी की आजादी बनी रहती है। उन्होंने कहाकि वर्तमान में भूमण्डलीकरण की चुनौतियों से कोई भी अछूता नहीं है। विदेशी बैंको का आगमन, बीमा एवं एयर पोर्टो का निजीकरण कुछ वर्षो पूर्व असंभव सा लगता था लेकिन आज की यही हकीकत है। उन्होंने देश की न्यायिक प्रणाली पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहाकि हमारी न्याय प्रणाली ब्रिटिश न्याय प्रणाली से भी अधिक स्वतंत्र है और हमारी न्याय प्रणाली अपना महत्व रखती है। उन्होंने कहाकि ऐसी न्याय प्रणाली से ही साठ वर्ष पुराना लोकतंत्र मजबूती से चल रहा है।
उन्होंने लीगल प्रोफेशन में गुणवता की जरूरत पर बल दिया । इससे भूमण्डलीकरण की चुनौतियों से लडने में सक्षम हो सकेंगे। उन्होंने कहाकि ज्ञान में वृद्वि ही सफलता का आधार है। इसके लिए शैक्षणिक संस्थानों का सुदृढीकरण होना चाहिए। इसी के दृष्टिगत वर्तमान में सभी राज्यों में विधि एकेडमी को स्थापित किया गया है।
राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बालिया ने कहाकि वर्तमान में भूमण्डलीकरण के कारण सभी क्षेत्रों में तेजी से बदलाव आया है। वर्तमान परिस्थितियों के साथ विधि सामंजस्य बनाने के लिए निरन्तर अद्यतन रहने की आवश्यकता है। नेशनल ला कान्फ्रेंस इसके लिए एक महत्वपूर्ण आयोजन है। विधि सम्मत कुशल शासन आज की महत्ती आवश्यकता है। उन्होंने कहाकि वैश्विक स्पर्धा में विजन एवं स्ट्रेटेजी की महत्ती भूमिका होती है।
बार काउंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष एस.गोपाकुमारन नायर ने कहाकि लीगल प्रफेशन वर्तमान में कई प्रकार की चुनौतियंा झेल रहा है। बेंच एवं बार मिलकर देश को सही दिशा देने में सक्षम है। वर्तमान में हमारी न्याय प्रणाली पर लोगों का पूरा भरोसा है। जनता के विश्वास को बनाए रखनें के लिए न्यायाधीशों को उनकी आकंाक्षा पर खरा उतरना जरूरी है। इसके लिए न्यायिक प्रणाली को और अधिक सुदृढ बनाया जाए। उन्होंने कहाकि आमजन के कल्याणार्थ बेंच एवं बार को एक होना जरूरी है।
राजस्थान बार काउंसिल के अध्यक्ष अशोक मेहता ने अपने स्वागत भाषण में कहाकि न्यायिक क्षेत्र में नई चुनौतियां बढती हुई जनसंख्या एवं बदलते परिवेश के साथ सामंजस्य बनाने के लिए नेशनल ला कान्फ्रेंस जैसे आयोजन की महत्ती आवश्यकता है। संगोष्ठी के संयोजक एवं बार काउंसिल आफ इंडिया के उपाध्यक्ष जे.आर. बेनीवाल ने कहाकि बदलते परिवेश में ज्ञान का आदान प्रदान जरूरी है।
संगोष्ठी के सह संयोजक एवं बार काउंसिल आफ राजस्थान के उपाध्यक्ष मनीष सिसोदिया ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एवं केन्द्रीय विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने नेशनल ला कान्फ्रेंस-०७ की स्मारिका का विमोचन किया।