भारतीय वांगमय में प्रचलित कहावतों और मुहावरों का अपना एक तथ्यगत आधार होता है। ऐसी ही एक कहावत है- 'जंगल में मंगल। ' जंगल, जो प्रकृति के उन्मुक्त विलास का प्रतीक है, जिसके स्वच्छन्द वातावरण में मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी निर्द्वन्द्व भाव से विचरण करते हैं।
सांसारिक वर्जनाओं और कुण्ठाओं से दूर प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण में मानव मन भी आह्लादित हो आनंद के जिस रस का पान करता है उसका अनुभव अपने आप में अद्वितीय एवं वर्णनातीत होता है।
वनवासियों की तो सारी लीला भूमि ही यह वनांचल है। उनका जीवन भी प्रकृति की तरह ही उन्मुक्त और स्वच्छन्द हुआ करता है। उनकी अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएं हैं , प्रणय का अपना एक अलग अनूठा अन्दाज है , जिसके परिदृश्य इस अंचल में पूरी गर्मियों में सहज ही दिखाई देते हैं।
वनवासी अंचल के प्रणयी दम्पत्तियों के लिए गर्मियों की रातें किसी मधुयामिनी से कम नहीं होती , जिनमें पूनम की धवल चांदनी जहां रूप-सौन्दर्य को बहुगुणित करती है तो काली अमावस अभिसार रात्रि में धडकनों में समाए होते हैं आंचलिक संस्कृति के लोक रंग।
बंधे-बंधाये ढर्रों के शहरी परिवेश से दूर भारतीय संस्कृति के अनूठे मौलिक तत्वों से रूबरू होने के अवसर मेलों-पर्वों में मिलते हैं , वहीं प्रणयोत्सवों की दीर्घ श्रृंखला दो-तीन माह तक लोगों को आह्लादित करती रहती है। ये ही वे दिन होते हैं जब जीवन की एकरसता टूटती है और उमंग-उल्लास की अभिवृद्धि का अहसास होता है।
अक्षय तृतीया प्रणयोल्लास का वार्षिक महापर्व होता है जब हजारों तरुणियां और तरुण दाम्पत्य सूत्र में बंध कर नई जिन्दगी की शुरुआत करते हैं।
वनवासियों की विचारधारा और मूल परिवेश उदात्त भावों से भरा होता है। अपनी जीवनशैली में युधिष्ठिर की ईमानदारी , भीम जैसी बलिष्ठ काया तो अर्जुन जैसा लक्ष्य संधान भाव रखते हैं। इनमें नहीं हुआ करती-खुद के लिए संचय की प्रवृत्ति। इनके निशाने अर्जुन की तरह सधे हुए होते हैं , उसी तरह जीवन के विविध आनंद एवं आत्मतोष पाना ही इनके चरम संधान का विषय है। लोकवाद्यों की धुनों पर लोक नृत्यों का आनंद यहां की परम्परा का अह्म हिस्सा है।
पुरुष घुटनों तक धोती, ऊपर अंगरखा या झब्बा, सर पर रंग-बिरंगा फेंटा, कमर में कन्दौरा, तरकश और हाथ में तलवार या लाठी लिये, तो महिलाएं अपनी पारम्परिक लाल-काली टिपकियों वाली सूती ओढनी , इसी से मेले खाती काँचली (ब्लाउज), पांवों में चाँदी के गहनों की झंकार , हाथों में खनकती चूडयां, गले में चाँदी की हँचली और नाक में नथ, बालों में रंग-बिरंगे पुष्प लगाए उन्मुक्त हास्य बिखेरती हुई विचरण करती हैं तब इस अंचल की आभा बहुगुणित हो जाती है।
वनवासियों में नाते-रिश्ते पहले से तय नहीं हुआ करते , बल्कि मेलों-पर्वों आदि में वनवासी तरुण-तरुणियां प्रकृति की साक्षी में पसन्दीदा जीवनसाथी का चयन करते हैं। इस दृष्टि से आजकल के परिचय सम्मेलनों की विचारधारा का आदि , स्रोत इन्हें कहा जा सकता है। फसल कट जाने के बाद ही वनवासी पाते हैं फुरसत व विश्राम के क्षण।
ये ही वे दिन होते हैं जब प्रकृति भी उन्मुक्त हो निहारती है प्रणयोल्लास को। वनाँचल के जंगल युगों से साक्षी रहे हैं दाम्पत्य के रस-रंग भरी मुद्राओं और मधुर मिलन के भावों के।
इस सीमावर्ती अंचल के बांसवाडा, डूंगरपुर , प्रतापगढ, गुजरात के दाहोद, झालोद, पंचमहल और मध्यप्रदेश के थान्दला, झाबुआ , रतलाम आदि इलाकों के वनवासी परिवार इन्हीं फुरसत के क्षणों में जमा होकर तय करते हैं संबंधों की भागीरथी की दिशा।
बाजारों में वनवासी नर-नारियों खासकर दुल्हे-दुलहिनों का सैलाब बडा ही मनोरंजक बन पडता है। ये मुंह में पान का बीडा दबाए , आँखों पर रंगीन चश्मा , कानों पर रंग-बिरंगे पसन्दीदा पुष्प, ढोल-ढमकों , थालियों-कौण्डियों के नाम पर श्रृंगार सिक्त वागडी गीत गाते थिरकते लोगों का दिग्दर्शन बडा ही आनन्ददायी हो उठता है।
समूचा पर्वतीय परिवेश, वृक्ष-लतादिक आदि भी सब की सब लगता है जैसे वनवासियों का जीवन संगीत सुनने मचल उठती हैं। इन दिनों ये स्वर लहरियां प्रतिध्वनित होकर अपना अलग ही राग छेड कर लोगों को मदमस्त करने लगी हैं।
विवाहोत्सवों की अनूठी परम्पराओं के साथ ही वनवासी परस्पर श्रृंगारित गीतों एवं धारदार संवादों के साथ गैर , घूमर , वालर इत्यादि नृत्यों में मस्त होते हैं। ये ही वे दिन होते हैं जब सारा वनांचल विवाहोत्सवों के रंग छिटकता है। अनगिनत दुल्हे-दुलहिन इन दिनों प्रणय के सागर में जमकर गोते लगाते हैं। मादक बयारें रग-रग में आनन्द और मस्ती का संगीत छेड जाती हैं।
ये दिन केवल अल्हड किशोरों को ही नहीं वरन् आबाल-वृद्ध सभी नर-नारियों को यौवन रस से सराबोर कर देने वाले होते हैं। जनजातीय अंचल में विवाह के रंगों की छटा कुछ अलग ही रंग बिखेरती है। पूरी गर्मियां जीवन्त उत्सव में तब्दील हो जाती हैं , जब लोकवाद्यों की लहरियों एवं मंगल गान के समवेत स्वरों पर थिरक उठता है वनवासी परिवेश। महुए की मंदिर गंध वातावरण में एक उन्माद सा घोलती है और भीनी-भीनी खुशबू में हिलोरे लेने लगात है यौवन का ज्वार। गली-कूंचों , गांव-बीहडों एवं ढाणियों में बिखरने लगता है एक मादक संगीत।
वनवासियों में विवाहोत्सव की अपनी एक विशिष्ट परम्परा रही है। उल्लास के रंग में सराबोर बारातियों को अल्हड मस्ती का रंग बिखेरते जहां-तहां सहज ही देखा जा सकता है। इस उमडते हुए ज्वार को देख कर लगता है जैसे किसी के रोके रूकने वाला नहीं है- यह अंतर वेग। गांव-शहर , मेलों-हाट बाजारों में दाम्पत्य के रंग उण्डेलती , पुष्पहारों से सजी ये ढोलियां एक विशेष आकर्षण से युक्त होती हैं।
यौवन की मदमस्ती में थिरकते हुए पग और हाथों में , कौंधती तलवार श्रृंगार और पौरुष का समवेत दृश्य उपस्थित करती है। यह अहसास कराता है जैसे गंधर्वों के पृथ्वी पर उतर आने का दृश्य संभवतः ऐसा ही होता होगा।
यही तो वे दिन हैं विवाहों के, जब वनवासी मस्ती का सागर उफान पर ला देते हैं। रोम-रोम उल्लास एवं स्नेह-आनंद से आप्लावित हो उठता है। परस्पर तेज संवादों एवं धारदार गीतों की विशेष ताल और लय पर बरसात हो और वह भी श्रृंगार से भरपूर , तब की तो बात ही क्या है? इन्हीं दिनों पान की दुकानों पर बीडे चबाते, होठों को लाल किए हास-परिहास में डूबे तरण-तरणियों का उल्लास भी देखते ही बनता है।
फोटोग्राफी का भी एक अद्भुत चाव दिखाई देता है इनमें , जिसके वशीभूत हो पूरे परिवार एवं आत्मीयजनों के साथ अपनी छवि को कैमरे में कैद कराने के लिए इनका तांता लगा रहता है। वागडी गीतों एवं संवादों के कैसेट्स चारों और बजते हुए विवाहोत्सव का समा बांधते रहते हैं।
हर रंग और रस का आस्वादन करते हुए अपनी सादगी और उछाह में सम्पूर्ण संस्कृति को उजागर कराने वाले वनवासियों का यह लम्बा चलने वाला मंगल उत्सव याद दिलाता है पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी की पंक्ति- ' वसन्त आता नहीं, लाया जाता है।'
ग्रीष्म की प्रचण्ड दुपहरी में फूलता हुआ पलाश भी ऐसे ही किसी वसन्तोत्सव का संदेश देता है अनुराग की लाल चटख लालिमा बिखेरते हुए। ये विवाहोत्सव ही है जहां प्रणय का उन्माद छलक-छलक कर एक दूसरे को अपनी रसधारा में डूबोता है। इस दृष्टि से जंगल में मंगल की उक्ति को इस वनाँचल में पूरी तरह घटित होते हुए देखा जा सकता है।
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