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प्रधानमंत्री ने द इंडियन सीईओ-ए पोर्ट्रेट ऑफ एक्सीलेंस पुस्तक का विमोचन किया
18 Jul 2007

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प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिह ने आज यहां द इंडियन सीईओ-ए पोर्ट्रेट ऑफ एक्सीलेंस पुस्तक का विमोचन किया । इस अवसर पर प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ इस प्रकार है-
Dr. Manmohan Singh releasing a book “The Indian CEO: A Portrait of Excellence” मुझे इस पुस्तक का विमोचन करते हुए अत्यंत खुशी हो रही है । यह पुस्तक बहुमूल्य शोध की देन है । मैं अनुसंधान दल, इस अनुसंधान से जुडे मुख्य कार्यकारी अधिकारी और इस अनुसंधान कार्यक्रम को चलाने की पहल के लिए अपने प्रमुख सचिव श्री नायर को बधाई देता हूं । मैं यह अध्ययन शुरू कराने के लिए सार्वजनिक उद्यम चयन बोर्ड और भारत पेट्रोलियम लिमिटेड को भी बधाई देता हूं ।
 मुझे उस सम्मेलन में भाग लेने की याद आ रही है जो इस शोध कार्य के निष्कर्षों पर विचार विमर्श के लिए आयोजित किया गया था । जैसा कि मैंन उस समय कहा था, मैं व्यक्तिगत नेतृत्व के महत्व पर बहुत विश्वास करता हूं, लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि सबसे सक्षम नेताओं पर भी कई अनिवार्य बाधाएं थोपी गईं हैं। इसलिए कई बार यह निष्कर्ष निकालना मुशिकल होता है कि कोई परिणाम नेता कि क्षमता की देन है या फिर उस माहौल की खामियों की देन हैं जिसमें वह काम कर रहा है ।
 इसलिए मैं मानता हूं कि इस अध्ययन में मुख्य कार्यकारी अधिकारियों खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के कार्यकारी अधिकारियों की उस माहौल में भूमिका और निष्पादन को प्रासंगिक बनाया गया है जिसमें वह काम करता है । सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए, यह माहौल सरकार तथा बाजार दोनों के द्वारा ही तय किया जाता है।
 मुझे यह जानकर आचिर्य नहीं हुआ है कि यह शोध कार्य इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि बाहरी माहौल, जिसे बाउंड्री मैनेजमेंट भी कहा जाता है, भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यकारी अधिकारियों के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है। मैं इस अध्ययन के एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष से इस बात से सहमत हूं कि कारोबार और नियामक के रूप में सरकार के बीच रिश्ता और ज्यादा पारदर्शी और ज्यादा अनुमान लगाने योग्य होना चाहिए तथा यह रिश्ता कम अनिश्चितताओं वाला और कम समय खपत वाला होना चाहिए ।
 इस अध्ययन में बताया गया है कि भारत में विनियामक प्रक्रिया का धुंधलापन और अनिश्चितता हमारे उद्यमों  के विकास और नये उद्यमों के प्रवेश में बडी बाधा है । मैं आफ इस दृष्टिकोण से सहमत हूं कि सरकार को नियंत्रण और दखल की बजाय सार्वजनिक उद्यमों के कार्यकरण में हितधारक बनना चाहिए । मुझे याद आ रहा है कि अगस्त २००४ में प्रधानमंत्री के रूप में मेरे कार्यकाल की शुरूआत में मैंने केन्दीय मंत्री परिषद में अपने सभी साथियों को लिखा था कि राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत हम सभी के लिए यह अनिवार्य है कि हम सार्वजनिक उद्यमों को मजबूत और सक्षम बनाएं । मैं ईमानदारी से स्वीकार करता हूं कि हमें अभी इस दिशा में काफी कुछ करना है ।    
 उसी माह, मैंने अपने मंत्रिमंडल के साथियों का ध्यान इस बात की ओर भी दिलाया था कि वे यह सुनिशिचत करें कि सार्वजनिक उद्यम अच्छे निगमित प्रशासन और आचरण के सर्वमान्य बुनियादी नियमों का पालन करें । मेरा मानना है कि दरअसल सार्वजनिक उद्यमों को अच्छे निगमित प्राासन का आदर्श बनना चाहिए ताकि निजी क्षेत्र के उद्यम भी उनका अनुकरण करें । सार्वजनिक उद्यमों को संचालन संबंधी पूरी स्वायत्ता देने, विवि बाजार में मुकाबला करने और सफल होने में सक्षम बनाने के अलावा संबंधित मंत्रालयों का यह दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि यह उद्यम अच्छे निगमित प्राासन के तौर तरीके अपनाए । बहुधा यह शिकायत मिलती है कि दरअसल मंत्रालय ऐसा करने की बजाय विपरीत कार्यों को बढावा देते हैं । ऐसी घटनाओं को प्रकाश में लाया जाना चाहिए और सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए ।
 पुस्तक में की गई एक टिप्पणी से मैं काफी चितित हूं कि हालांकि सार्वजनिक उद्यमों के प्रमुख Dr. Manmohan Singh releasing a book “The Indian CEO: A Portrait of Excellence” अपने मातहतों को सशक्त बनाने में उत्कृष्ट कार्य करते हैं लेकिन वे खुद सरकार द्वारा फिलहाल काफी कुछ अधिकारविहीन बना दिए गए हैं । यह माहौल बदला जाना चाहिए और हमें एक ऐसा माहौल तैयार करना चाहिए जो पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक उद्यमों में सुधार की बजाय सार्वजनिक उद्यमों के निजीकरण के प्रनि पर ज्यादा ध्यान दिया गया है । कभी-कभी वित्तीय मजबूरियों तथा क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए निजीकरण पर विचार किया जाता है लेकिन कुछ लोग इसे सार्वजनिक उद्यमों को बाउंड्री मैंनेजमेंट के बोझ से निजात दिलाने के रूप में भी देखते हैं । बाउंड्री मैंनेजमेंट की समस्या और इससे जुडे बोझ से हमारा प्रयास सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को सशक्त बनाना होना चाहिए इसके लिए उनपर प्राासनिक तथा राजनीतिक पकड को ढीला करना होगा और सरकार तथा संसदीय जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में सुधार लाने की जरूरत होगी। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर व्यापक आम सहमति और सुविज्ञ बहस को बढावा देना होगा।  ससंदीय जवाबदेही सार्वजनिक उद्यमों के दिन प्रतिदिन के प्रबंधन में मंत्रीस्तरीय या राजनीतिक दखल के रूप में नहीं होनी चाहिए । मैं चाहूंगा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम और ज्यादा उदार माहौल में काम करें । मैं चाहूंगा कि सार्वजनिक उद्यमों के बोर्ड और शीर्ष प्रबंधमंडलों को पर्याप्त रूप से अधिकार संपन्न बनाया जाए ताकि वे जिस माहौल में काम कर रहे हों उस माहौल को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले सकें ।
 मुझे जानकारी है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में कई प्रतिभाशाली और समर्पित मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। इस अध्ययन में भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है। अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया है कि भारतीय कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विकसित देशों के कार्यकारी अधिकारियों की तुलना में बेहतर हैं । लेकिन हम सफलता की कुछ गिनी चुनी कहानियों से ही संतोष नहीं कर सकते । हमें भारी संख्या में विवि स्तर के ऐसे प्रबंधक चाहिए जो अपनी कंपनियों में आमूल परिवर्तन ला सकें और भारतीय उद्यमों को उच्च विकास के रास्ते पर आगे बढा सकें ।
 मुझे इस अध्ययन में एक निष्कर्ष से काफी खुशी हुई है जिसमें कहा गया है  न्नभारतीय बोर्ड इस बात को समझ सकते हैं कि मुख्य कार्यकारी अधिकारी, हालांकि महत्वपूर्ण है लेकिन वह उद्यम की सफलता का एक हिस्सा मात्र है। संगठित रूप से मिलकर काम करने वाले कई लोगों की प्रतिभा और ऊर्जा से ही उद्यम सफलता हासिल कर सकते हैं । जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा वाली इस दुनिया में किसी भी उद्यम के लिए सफलता की कुंजी मिलकर काम करने की आदत डालना है । जैसा कि अध्ययन में सुझाव दिया गया है, मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को व्यक्तिगत प्रतिभा को बढावा देने के साथ-साथ अपनी टीम को ऊर्जावान बनाने पर भी ज्यादा जोर देना चाहिए । एक अच्छे मुख्य कार्यकारी अधिकारी को यह समझना चाहिए कि  उसका कार्य एक ऐसा माहौल तैयार करना है जिसमें अन्य लोग अपना सर्वश्रेष्ठ निष्पादन दे सकें ।
 मुझे इस बात की खुशी है कि आगे का रास्ता तलाशने की दिशा में इस अध्ययन में जवाबदेही के साथ साक्तीकरण, सभी हितधारकों की भूमिका को मान्यता देने और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में कार्य करना सीखने के महत्व पर बल दिया गया है । मैंने इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि आपका अध्ययन यह मानता है कि भारतीय सार्वजनिक उद्यमों में अन्य देाों के उद्यमों की तुलना में राजनीतिक तथा प्रशासनिक दखल कहीं बहुत ज्यादा है और हम सभी का यह मिला जुला प्रयास होगा कि इस क्षेत्र में हम सुधारों को प्रोत्साहन दें । सरकार का यह प्रयास होगा कि वह इस स्थिति को बदले । मुझे आाा है इस अध्ययन से सार्वजनिक उद्यमों के प्रबंधन और सार्वजनिक नीति में सुधारों के पक्ष में सार्वजनिक राय कायम करने में मदद मिलेगी ।




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