नई दिल्ली, नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे २८वें अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेला के राजस्थान मण्डप में शीशे पर सोने की बारीक मीनाकारी की एक ऐसी अनूठी कला के आभूषणों का प्रदर्शन किया जा रहा है जिसे ’थेवा-कला‘ कहा जाता है। पीढी दर पीढी चलने वाली यह कला ’ट्रेड सिक्रेट‘ को बनाए रखने के लिए सिर्फ बेटे ही सीखते हैं और वंश परंपरा को आगे बढाते हैं। इसी ’थेवा-कला‘ से बने आभूषण इन दिनों व्यापार मेला में आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।
17वीं शताब्दी में तत्कालीन राजघरानों के संरक्षण में पनपी राजस्थान की इस बेजोड’ थेवा कला‘ को जानने वाले देश में अब गिने चुने परिवार ही बचे हैं। ये परिवार राजस्थान के नवगठित प्रतापगढ जिले में रहने वाले ’राज सोनी घराने‘ के हैं। जिन्हें इस अनूठी कला के लिए कई अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरूस्कार मिल चुके हैं।
’थेवा कला‘ विभिन्न रंगों के शीशों (काँच ) को चांदी के महीन तारों से बनी फ्रेम में डालकर उस पर सोने की बारीक कलाकृतियां उकेरने की अनूठी कला है। जिन्हें कुशल और दक्ष हाथ छोटे-छोटे औजारों की मदद से बनाते है।
इस कला में पहले काँच पर सोने की शीट लगाकर उस पर बारीक जाली बनाई जाती है, जिसे ’थारणा‘ कहा जाता है। दूसरे चरण में काँच को कसने के लिए चांदी के बारीक तार से बनाई जाने वाली फ्रेम का कार्य किया जाता है। जिसे ’वाडा‘ बोला जाता है। तत्पश्चात इसे तेज आग में तपाया जाता है। फलस्वरूप शीशे पर सोने की कलाकृति और खूबसूरत डिजाईन उभर कर एक नायाब और लाजवाब कृति का आभूषण बन जाती है। इन दोनों प्रकार के काम और शब्दों से मिलकर ’थेवा‘ नाम की उत्पत्ति हुई है। प्रारम्भ में ’थेवा‘ का काम लाल, नीले और हरे रंगों के मूल्यवान पत्थरों हीरा, पन्ना आदि पर ही उकेरी जाती थी, लेकिन अब यह कला पीले, गुलाबी और काले रंग के कांच के बहुमूल्य रत्नों पर भी उकेरी जाने लगी है।
प्रारंभ में थेवा कला से बनाए जाने वाले बाक्स, प्लेट्स, डिश आदि पर लोककथाएं उकेरी जाती थी
लेकिन अब यह कला आभूषणों के साथ-साथ पेंडल्स, इयर-रिंग, टाई और साडयों की पिन कफलिंक्स, फोटोफ्रेम आदि फैशन में भी प्रचलित हो चली है। थेवा कला को आधुनिक फैशन की विविध डिजाईनों में ढालकर लोकप्रिय बनाने के प्रयासों में जुटे जयपुर की ’जेवल ऐस‘ उपक्रम के मुख्य निष्पादन अधिकारी बताते हैं कि राजस्थान मंडप को लुप्त होती जा रही इस अनूठी कला को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार से परिचित कराने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है। चूकिं यहीं से सर्वप्रथम थेवा कला की नई डिजाईर्नों और इस कला को जबर्दस्त प्रचार-प्रसार और प्रोत्साहन मिला है।