बांसवाडा में ९ मई से श्रीयंत्र प्रतिष्ठा अनुष्ठान समारोह, नई पीढी को प्राच्यविद्याओं का प्रशिक्षण देने १७ मई से प्रशिक्षण शिविर
19 Apr
2007
बांसवाडा, १९ अप्रेल/गायत्री मण्डल बांसवाडा के तत्वावधान में आगामी ९ से १३ मई तक बांसवाडा के वनेश्वर मन्दिर परिसर में श्रीयंत्र प्रतिष्ठा महानुष्ठान समारोह आयोजित किया जाएगा। इसमें श्रीविद्यार्चन पद्धति के अनुसार श्रीयंत्रों की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी और विभिन्न दुर्लभ विधियों से अभिषिक्त किया जाएगा।
इसी प्रकार गायत्री मण्डल द्वारा आगामी १७ मई से २६ मई तक वनेश्वर शिवालय परिसर में पौरोहित्य, कर्मकाण्ड एवं ज्योतिष प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जाएगा। इसमें बांसवाडा, डूंगरपुर, चित्तौडगढ तथा संभाग के विभिन्न हिस्सों से प्रशिक्षणार्थी हिस्सा लगे। इन प्रशिक्षणार्थियों को विषय विशेषज्ञों द्वारा प्राच्यविद्याओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
यह निर्णय गायत्री मण्डल के अध्यक्ष एवं जाने-माने प्राच्यविद्यामर्मज्ञ ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल की अध्यक्षता में यहां वनेश्वर मन्दिर परिसर के मानस भवन में सम्पन्न गायत्री मण्डल की बैठक में किया गया।
इसमें पोरोहित्य एवं ज्योतिष प्रशिक्षण शिविर को प्रभावी स्वरूप दिए जाने और वेद एवं प्राच्यविद्या के प्रचार-प्रसार को गति प्रदान करने के लिए गायत्री मण्डल की शिक्षा समिति का गठन किया गया है।
राजकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक डॉ. दिनेश द्विवेदी इस समिति के संयोजक बनाए गए हैं। समिति के सदस्यों में पं. भालचन्द्र शुक्ल, पूर्णाशंकर आचार्य, सूर्यशंकर झा, राकेश शुक्ल, हर्षदराय नागर, धनपतराय झा, इन्द्रशंकर झा, प्रदीप शुक्ला, नरेन्द्र आचार्य, राजेश त्रिवेदी, विद्यासागर शुक्ल, विनय भट्ट आदि शामिल हैं।
इसी प्रकार गायत्री मण्डल के भूमि विवाद के समाधान की कार्यवाही के लिए दिनेश भट्ट को संयोजक बनाया गया।
बैठक में बेणेश्वर धाम पर वेद, ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड की कक्षाओं के संचालन के लिए बेणेश्वर पीठाधीश्वर गोस्वामी अच्युतानंद महाराज के सान्निध्य में विद्यालय संचालन की कार्यवाही करने का प्रस्ताव लिया गया।
बैठक में बताया गया कि बांसवाडा एवं प्रतापगढ में गायत्री मण्डल द्वारा वेद विद्यालय खोले जाने के लिए राज्य सरकार एवं अकादमी के स्तर पर कार्यवाही शीघ्र की जाएगी।
बैठक में अध्यक्षीय उद्बोधन में गायत्री मण्डल के अध्यक्ष ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल ने वेद, कर्मकाण्ड और ज्योतिष विधाओं के मौलिक स्वरूप में प्रचार-प्रसार और भावी पीढी तक इनका संवहन करने पर जोर दिया और कहा कि वर्तमान पीढी को व्यवसायिकता एवं संकीर्ण दायरों से बाहर निकल कर सार्वजनीन सेवा के लिए आगे आना चाहिए तभी प्राच्यविद्याओं का संरक्षण-संवर्द्धन संभव है।
बैठक में पं. धरणीधर शास्त्री, जगदीश मेहता, पं. गिरीश महाराज, पं. विजयकुमार त्रिवेदी,रमेश जोशी आदि ने भी विचार रखे।
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