कईं गंभीर शिकायतों के चलते यूआईटी, बीकानेर की सचिव प्रियंका गोस्वामी को एपीओ कर देने के बावजूद यूआईटी कर्मचारियों के भष्ट्राचार के कीर्तिमान गढ देने के लिए इनके हौंसले अभी भी परवान पर है। अफसरों की मिलिभगत कहे या बेइंतहा छुट, इन्ही के कारण बूलन्द हौंसले वाले इन बाबूओं को इस बात की भी परवाह नही है की आकंठ रिश्वत मे डूबी इस व्यवस्था को लेकर जब आम आदमी के सिर से पानी ऊपर चला जायेगा तो सरकार को मजबूरन इनके खिलाफ सख्त कदम उठाना ही पडेगा।
रिश्वतखोरी इस कार्यालय मे अब चरम तक पंहुच चुकी है, काम करवाने के लिए यहां पर खुली बोली लगाई जाती है। और अगर कोई इस व्यवस्था मे विश्वास नही करता है तो इनको सरकारी पावर का बखूबी इस्तेमाल करते हुए आफ जूते घिसवाना अच्छी तरह आता है। और जरूरी नही की केवल जूते घिसवा लेने से आपका काम करने केलिए ये राजी हो जायेंगें, ये तो केवल आपको सीख देने के लिए किया जाता है, काम तो आपका तभी ही होगा जब आप इस व्यवस्था के हिस्सेदार बनकर भेट न चढा दो, नही तो पुरी फाइल के ही गुम हो जाने मे ज्यादा देर नही लगती हे।
सामाजिक ताने बाने द्वारा दी हुई छुट कि ”आटे मे नमक चलता है“ को ही आज अपना मुख्य अधिकार समझ कर इन कर्मचारियों ने मानवीय संवेदनाओं को भी ताक पर रख दिया है, ये लोग गरीबों व निम्न आय वर्ग वालों को भी नही छोडते है। और तो और, यहां पे ही वो ही संवेंदनाहीन जवाब, गरीब तो मरने के लिए होता है।
इस कार्यालय मे भष्ट्राचार की सीमा तो यहां तक पहुंच गई है कि आज उसी सामाजिक ताने बाने का आधार जिसने इस व्यवस्था को पलने दिया है, को आज जोर का झटका धिरे से दे रहा है, जी हां इस कार्यालय मे अगर आप किसी जान-पहचान या रिश्ते के आधार पर भी काम की उम्मीद लेकर जा रहे है तो वो रिश्तेदार या दोस्त आपसे या तो तुरंत आपसे नजर फेर लेगा और या फिर अपना हिस्सा छोडने की दुहाई देकर अपने सहकर्मीयों को उनकी हिस्सेदारी दिलवाकर आफ ऊपर एक बहुत बडा एहसान कर देगा है।
अगर आप यूआईटी कार्यालय मे जाएंगे तो आसानी से देख सकते है की रोजाना १०-२० आदमी तो ऐसे मिल ही जायेगें जिनके प्रकरण २ से ३ महीने तक लम्बित पडे है क्योंकि उन्होने बाबुओं व अफसरों को घुस देना स्वीकार्य नही है। स्थिति देखिये कि यहां पर बाबु रिश्वत देकर खडे हुए अन्य आदमीयों को रिश्वत नही देने वाले के बारे मे ऐसे समझाता है कि ”यह साला ऐसे ही रोज आयेगा और हम इससे रिश्वत से ज्यादा के पैसे का तो पेट्रौल ही जलवा देंगे। और चुंकि इसके पैसे देने की हैसियत नही है इसलिए टाइम की तो कोई कीमत है नही इसलिए बर्बाद कर सकें उतना ही थोडा है“।
नैतिकता की बात करना तो अब इनके सामने बिल्कुल बेमानी सा हो गया है। दोस्त या रिश्तेदार होने के नाते अगर इन कर्मचारियों से कोई इस विषय पर जिज्ञासावश पूछ भी ले तो बडे गरीबदास बनते हुए उल्टा प्रश्न सामने रख देते है कि इतनी महंगाई मे क्या सरकारी तनख्वाह से पार पड सकती है? अब क्या उत्तर दे इस बात का कि जिसको आप निचोड रहे है उसको तो आपसे आधी तनख्वाह भी नसीब नही होती है, और जैसे तैसे करके जिन्दगी की कुल जमा पूंजी इकट्ठी करके अपने परिवार के लिए एक छोटे सा मकान बनाने के सपने को साकार करने की खातिर इस विभाग मे भुखण्ड के लिए आते है।
इनके कईं जवाब तो ऐसे होते है कि जैसे की इनका कोई कसूर ही नही है, जैसे दूसरे कर्मचारि भी रिश्वत ले रहा है तो इनके लिए भी अब ऐसा करना नैतिक कर्तव्य हो गया। ”इस सीट पर आने के लिए फलां अफसर को इतने देने पडे है - वापस कमायेंगे नही कया“ या फिर नेताओं पर आक्षेप कि ”ये भी तो खाते है“, और कुछ नही तो व्यापारियों के अनैतिक धन्धों की दुहाई देते हुए इनके पास भी रिश्वत लेने के लिए लाइसेन्स होने जैसा दावा ठोक देते है।
यह लेखन हमने कोई हव्वा बनाने के उद्देश्य से नही लिख रहे है, बल्कि इसकी सच्चाई तो आप एक बार आम आदमी बनकर चले जाइये, आपको अपने आप ही दिख जायेगी। हमारा उद्देश्य तो यह है कि सरकार इस निरंकुश होती जा रही रिश्वतखोरी पर तुरंत रोक लगाए। और इसके लिए सरकार के साथ आपको भी इस बात के लिए प्रतिबद्ध होना होगा की आपका काम दो दिन मे हा या दो महीने मे, रिश्वत किसी भी स्थिति मे नही देनी है। शायद गांधीजी के अंहिसा पथ का यह नवीन उदाहरण हमे एक बार फिर एक स्वच्छ समाज मे सही मायने वाली आजादी से जीने का सुअववर देदे।
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आनन्द आचार्य