Sunday, 01 November 2020

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जन-जन के हितैषी और लोकप्रिय थे पं. गोकुल प्रसाद पुरोहित


Labour Leader Gokul Prasad Purohitबीकानेर की धरती ने जिस निर्भीक, जुझारू और औलिया किस्म के परदुख-कातर जन नेता को जन्म दिया है, वह एकमेव नेता थे जन-जन के हितैषी और लोकप्रिय पं. गोकुल प्रसाद पुरोहित।
पं. शिवरतन जी पुरोहित के इस पुत्र ने कलकत्ता में जन्म लिया था और बंगभूमि के क्रांतिचेता, ऊर्जस्वी वातावरण में पल बढकर उन्होंने स्वतंत्रता, उदात्त मानव प्रेम, समानता और शोषण मुक्त समाज के जीवनदायी आधारभूत तत्वों का बोधपाठ बाल्यकाल में ही अर्जित कर लिया था।
अल्पायु में ही वे देश के स्वाधीनता संग्राम में कूद पडे थे। उन्होंने महान विभूतियों का लम्बा सम्फ-संसर्ग मिला था। उग्र किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती से प्रेरणा लेकर बिहार में तथा काले पानी की सजा काट कर आए क्रांतिकारी श्री योगेश शुक्ल के साथ उन्होंने बंगाल में प्रारंभिक जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष बिताये थे। अन्याय के विरूद्ध संघर्ष करने तथा राजनीतिक मंचों पर ईमानदारी से डटे रहने के जीवंत गुर उन्होंने  ऐसी ही विभूतियों के उन्मुक्त विश्वविद्यालय में अर्जित किए थे। यही कारण है कि वे जीवन पर्यन्त प्रखरता और जीवट से जूझते रहे थे।
राजस्थान में लौट कर आने के बाद उन्हें श्री माणिक्यलाल वर्मा, श्री मोहनलाल सुखाडया एवं श्री रमेश चन्द्र व्यास के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने का अवसर मिला था । उनकी नेतृत्व क्षमता अद्भूत थी । स्वाधीनता आंदोलन के साथ साथ उन्होंनेमेवाड में सामंतों और जागीदारों के बेगारी व बेदखली के अत्याचारों के विरूद्ध जिस प्रखरता के साथ किसानों को तैयार करके आरजिया, मांडल, मेजा आदि अनेक अनेक गांवों के तालाबों के पेटे की जमीन और चरागाहों को सामन्ती शिकंजे से छुडवा कर किसानों को दिलवाने के लिए कडा संघर्ष किया था, वह एक गौरवशाली अध्याय के रूप में सदैव याद किया जाएगा। गोकुल प्रसाद जी वाणी के धनी और ओजस्वी वक्ता थे। आवाज की बुलंदगी और सर्व साधारण की भाषा में उर्दु-हिन्दी की गंगा जमनी धाराएँ श्रोताओं को बांध देने में बहुत सक्षम थीं। समाज के कमजोर, शोषित, उत्पीडित, दलित और सर्व साधारण के लिए जैसे वे समर्पित थे।  लोगों की समस्याएँ सुनकर वे खामोश बैठे रहने वालों मे से नहीं थे। लोगों की समस्याएँ सुनकर वे खामोश बैठे रहने वालों में से नहीं थे, न ही ऐसे लोगों की हिमायत के लिए बोलते समय उन्हें शब्दों का चयन करने या भाषण तैयार करने की जरूरत पडती थी। वे अंतस से बोलते थे, सही मुद्दे पर चोट करते थे और तब तक चैन नहीं लेते थे,  जब तक कि लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं करा देते थे या चाहने वालों को उनके हक नहीं दिला देते थे। तभी तो उन्हें विधान सभा में श्रद्धांजली देते समय कॉमरेड शोपतसिंह बोल उठे थे कि जब भैरोंसिंह जी बोलते थे तब शायद पसीना नहीं आता था सुखाडियां जी को , मगर गोकुल प्रसाद जी बोलते थे तब जरूर पसीने की बुंदे उनके माथे पर आती थी। वे इस ट्रेजंरी बेन्च पर बैठे लोगों को बिलकुल हिला देते थे।
श्री गोकुल प्रसाद सन् १९५९ में सहाडा पंचायत समिति के प्रधान निर्वाचित हुए थे। वहाँ ग्रामीण जनता के आर्थिक स्तर को सुधारने तथा सामाजिक रीति रिवाजों में सुधार लाने के लिए नई  चेतना जागृत की । पथरीली भूमि के  कुओं में जलस्तर ऊँचा करवा कर सिंचाई के इस अभिनव प्रयोग की इनकी सूझ बूझ को आज भी वहाँ की ग्राम्य पीढया सम्मान के साथ सराहना करती है। वे सन् ६२ से ७२ तक विधानसभी के निर्वाचित कॉग्रेसी सदस्य रहे थे। विधानसभा के पटल पर उन्होने जिस जागरूकता से अपने अंचल के लोगों की आकांक्षाएँ पूरी करने हेतु कार्य किए तथा साथ ही साथ राजस्थान के विकास हेतु अपनी पार्टी के कार्यो हेतु आवाज उठाई, वह सब दस्तावेजी साहित्य सहज ही उपलब्ध है। विधानसभा में उनके बजट पर दिये गये भाषण तथा वांचू कमीशन के परिप्रेक्ष्य में विरोधी स्वर निम्न एवं मध्यम वर्ग की हिमायत के आज भी पहचान बने हुए हैं। उनके प्रबल प्रयासों से राजस्थान नहर परियोजना का कार्यालय बीकानेर आया और इस अंचल के हजारों लोगों को नहरी क्षेत्र की भूमि का आवंटन हुआ। बडी पापड उद्योग बिक्री कर से मुक्त हुआ। लोहे के कामगारों को कच्चा माल आवंटित हुआ, कॉलेज में एल.एम.एम, एम.एड और एम एस सी की कक्षाएं खुलीं स्टेट ऊन मिल स्थापित हुई। पुष्करणा स्टेडियम का निमार्ण सम्पन्न करवाकर तो वे अमर हो गये। विधायक के रूप में उन्होंने पहले मांडल क्षेत्र में और फिर बीकानेर अंचल में विकास की अनेक योजनाओं का सूत्रपात किया था। उनका सम्पूर्ण जीवन शोषितों के पक्ष में उनके हकों की लडाई हेतु समर्पित रहा था। ऐसे क्रियाशील मजदूर नेता थे कि जिनकी नस्लें ही आज विरल होने लगी हैं। उन्होंने मेवाड में अभ्रक खानों के मजदूरों के लिए निर्णायक संग्राम छेडे और न्युनतम मजदूरी, सवेतन छुट्टियाँ तथा काम के निर्धारित घंटों का कानून लागू करवाया। उन्होंने केन्द्र सरकार से अथक प्रयास करके अभ्रक खान श्रम कल्याण कोष की स्थापना करवाई, जिसके आप वर्षों उपाध्यक्ष रहे थे। मजदूरों के लिए लेबर कॉलोनी, स्कूल, अस्पताल व मनोरंजन केन्द्रों के निर्माण का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। बीकानेर आने के बाद श्री पुरोहित ने जामसर में भूख हडताल करके जिप्सम मजदूरों को सवेतन छुटिट्यां और अन्य परिलाभ दिलाये । मजदूरों के पक्ष की ४८ मांगों के चार्टर पर १२ जून १९६६ का अवार्ड मजदूर जगत की जीत का बेमिसाल दस्तावेज है। प्रशासन से भी संघर्ष करके राजस्थान नहर के कामगारों को १४ प्रतिशत डेजर्ट एलाउन्स और १० प्रतिशत हार्ड ड्यूटी एलाउन्स के अभूतपूर्व परिलाभ दिलाये थे। स्वातंत्रोंत्तर बीकानेर में कांग्रेस की नींव उन्होनें ही डाली थी उन्होने ही डाली थी और जन जन में कांग्रेस को पहचाया था। श्री गोकुल प्रसाद पुरोहित को दलित, प्रपीडत मानवता के पक्ष में खडे होकर उसके लिए संघर्ष का शंख फुंकने का मंत्र जन्मघुट्टी में मिला था । ऐसे में वे इस बात की रंच मात्र परवाह नहीं करते थे कि  वे किसके विरूद्ध संघर्ष कर रहे हैं। सन् १९७३ में राज्य कर्मचारियों की राज्यव्यापी हडताल के दौरान श्री पुरोहित ने आंदोलन का सर्मथन किया था तथा धारा १४४ तोड कर गिरफ्तारी दी थी । आपातकाल की विकट परिस्थितियों में प्रतिबंध होते हुए भी उन्होने ऊन मिल की तालाबंदी का कडा विरोध किया था । उन्होंने प्रदर्शन किया, जिससे आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत ४ सितम्बर १९७५ को उन्हें गिरफ्तार किया गया और नौ माह तक जेल की यातना भुगतनी पडी। उन्होंने  जेल के यातना काल में भी कैदियों पर होने वाले जुल्म से डटकर विरोध किया और प्रशासन को जेल नियमों के अनुसार व्यवहार करने के लिए बाध्य कर दिया था। ये दृष्टान्त इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि श्री पुरोहित श्रम सिद्धान्तों और श्रमिकों के प्रति कितनी अडिग आस्था रखते थे। तथा बैखौफ उनके लिए कष्ट झेलने  को तैयार रहते थे। श्री पुरोहित के प्रयासों  से मझदूर संगठन इंटक की राजस्थान में पृथक से राज्य शाखा स्थापित हुई और वे उसके प्रथम उपाध्यक्ष बने । उनकी कार्य क्षमता, संगठन क्षमता, संघर्ष क्षमता और वक्तुत्व क्षमता उनुपमेय थी । वे अपनी मिसाल खुद थे । उनकी राजनीति महलों, हवेलियों , व्यवसायिक प्रतिष्ठानों  और प्रशासन तंत्र के बीच खेली जाने वाली शतरंजी बिसात नहीं थी। अपितु किसान , मजदूर , कारीगर, कर्मचारी, विद्यार्थी, दुकानदार, दलित और आम आदमी की राजनीति थी, जो नित्य प्रति खेत खलिहान, मिल कारखानों, कॉलेज, बाजार, गली, मोहल्लों और सडकों पर जीवंत सरसराती थी।  उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व से बडे बडे लोग प्रभावित थे। श्री माणिक्य लाल वर्मा तथा श्री मोहन लाल सुखाडिया दुरूह राजनैतिक समस्याओं पर उनसे परामर्श लेते थे और उनके सुझावों को मान्यता देकर उन्हें आदर से ’’गुरूजी‘‘ सम्बोधित करते थे। बिहार में रामनारायण सिंह और अर्जुन पांडे को आपने तैयार किया तथा राजस्थान में भी उन्हें अनेक नई प्रतिभाओं को राजनीति में लाने का श्रेय है। सर्वश्री शिवचरण माथुर, गिरधारीलाल व्यास, रामपाल उपाध्याय, रामप्रसाद लढ्ढा, रतन लाल ताम्बी आदि अनेक व्यक्ति उन्हीं की प्रेरणा से राज्य की सक्रिय राजनीति में प्रविष्ट हुए थे। श्री पुरोहित प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे तथा जीवन से जुडे सभी क्षेत्रों में उनका अनुभव बहुत गहरा था । विधानसभा की सदस्यता के दौरान वे राजकीय उपक्रम समिति, बजट समिति, जेल सलाहकार समिति, वित्त समिति, तथा प्राक्कलन समिति जैसी अनेक समितियों के सक्रिय सदस्य थे । चाहे समितियां हों, चाहे संवाद या विशाल सभाएँ श्री पुरोहित की वाणी कहीं भी अनसुनी नहीं रह सकती थी यह उनके व्यक्तित्व का कमाल था कि भीषण अकाल के दिनों में स्थिति का जायजा करवाने केन्द्रीय वित्तमंत्री श्री मोरारजी देसाई को बीकानेर जिले में हाथ पकड कर ले आये थे। ऐसा उदाहरण अन्यत्र कहीं भी  देखने में नहीं मिलेगा। बीकानेर में आकर जहाँ उन्होने यहाँ पर विकास की विविध दिशाओं में अपने प्रयास तेज किए, वहीं अपनी नेतृत्व क्षमता और लोक कल्याणकारी दृष्टि से सभी वर्गो के लोगों का स्नेह अर्जित किया वे जात बिरादरी से ऊपर उठकर सभी जातियों वर्गो में मुक्त भाव से रमने वाले फक्कड थे । निम्न और दुर्बल वर्गो ने जहाँ उनमें अपने मसीहाके दर्शन किए, वहीं ब्राह्मण बनियों साहूकारों मजदूर किसानों और सभी धम सम्प्रदाय के अनुयायियों में भी  उनके प्रति गहरा लगाव था। मुसलमानों में भी वे उतने ही लोकप्रिय थे  जितने ब्राह्मणों , सिक्खों, दलितों  या अन्य लोगों में । बीकानेर के सार्वजनिक जीवन में उभरने वाले सर्वश्री मोहम्मद उस्मान आरिफ, श्री गोपाल जोशी, श्री बुलाकी दास कल्ला, मक्खन जोशी, स्व. उमेश आचार्य जैसे अनेक नौजवानों-प्रौढ को उन्होंने राजनीति के अग्रिम मोर्चे पर कमान संभालने का हौंसला दिया था। श्री पुरोहित उन लोगों में से थे, जिनके लिए पार्टी बडी नहीं थी, इंसान बडा था, इंसानी व्यथाएं और परिस्थितियाँ बडी थीं । विधानसभ में ऐसे अनेक अवसर आये थे। जब वे अपनी ही पार्टी के विरोध में सच्ची बात को निर्भयतापूर्वक कहने से नहीं चूके। उनके देहांत के अवसर पर बोलते हुए एक बार श्री भैरोंसिंह शेखावत ने विधानसभी में अपने उद्गार यों प्रकट किए थेः वे जो भी भाषण देते थे। इस सदन को एक गोकुल प्रसाद के रूप में ही इस प्रकार का सदस्य मिला था, जो सत्तापक्ष या विरोधी पक्ष को निडर होकर अपनी बात कहता था । आज श्री पुरोहित जी नहीं है, पर उनकी संस्थागत राजनीति की स्कूल मौजूद हैं। बीकानेर की कृतज्ञ जनता अपने आदरणीय एवं लोकप्रिय नेता की मूर्ति स्थापित करके हृदय से चाहती है कि वह वंदनीय विभूति अनंतकाल तक बीकानेर के नागरिकों को प्रेरणा देती रहे तथा नौजवान उनसे अपने भीतर श्रेष्ठ मानवीय गुणों के अर्जन की प्रेरणा ग्रहण करें।