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भारतीय संस्कृति और संस्कारों से ही समाज निर्माण संभव - मुनि ऋषभविजय
22 Apr 2008

आध्यात्मिक चिन्तक, ज्योतिष सम्राट ऋषभविजय महाराज ने भारतीय संस्कृति और संस्कारों से परिपूर्ण समाज की रचना के लिए ब्राह्मणों से आगे आने और समाज को दिशा-दृष्टि का बोध कराने का आह्वान किया है और कहा है कि अब समय आ गया है जब पूरे विद्वत् समाज को प्राण-प्रण से जुटकर अपने युगीन दायित्वों का निर्वाह करना है।


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विद्वत समाज की ओर से मुनिश्री का अभिनंदन

बांसवाडा, राष्ट्रीय ख्याति के आध्यात्मिक चिन्तक, ज्योतिष सम्राट ऋषभविजय महाराज ने भारतीय संस्कृति और संस्कारों से परिपूर्ण समाज की रचना के लिए ब्राह्मणों से आगे आने और समाज को दिशा-दृष्टि का बोध कराने का आह्वान किया है और कहा है कि अब समय आ गया है जब पूरे विद्वत् समाज को प्राण-प्रण से जुटकर अपने युगीन दायित्वों का निर्वाह करना है।
अध्यात्म विभूति ऋषभ विजय महाराज ने मंगलवार रात बांसवाडा औदिच्यवाडा में सांवरिया धर्मशाला में राजस्थान ब्राह्मण महासभा के तत्वावधान में आयोजित सारस्वत सभा में ज्येातिषियों, कर्मकाण्डियों, वेद विद्वानों, पुरोहितों और प्रबुद्धजनों को संबोधित करते हुए यह उदगार व्यक्त किए।
सभा की अध्यक्षता प्राच्यविद्यामर्मज्ञ ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल ने की जबकि राजस्थान ब्राह्मण महासभा के प्रान्तीय पदाधिकारी एवं प्रसिद्ध ज्योतिर्विद पं. लक्ष्मीनारायण द्विवेदी, सामाजिक चिन्तक नारायणलाल पण्ड्या, चन्दूलाल उपाध्याय, मशहूर अभिभाषक लक्ष्मीकान्त त्रिवेदी विशिष्ट अतिथि थे।
ऋषभविजय महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि संकल्प मजबूत होता है वह काम अवश्य पूरा होता है। समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कभी नहीं मिलता। जब समय आता है तब सब काम होने शुरू हो जाते हैं। लेकिन व्यक्ति कितनी ही कठिन स्थितियों में क्यों न हो, गुरु का आशीर्वाद पा लेने पर पलक झपकते ही कार्य सिद्धि हो जाती है।
उन्होंने माता, पिता, शिक्षक और धर्म को मनुष्य का समग्र जीवन बनाने वाले चार गुरुओं की संज्ञा दी और कहा कि इनका आदर-सम्मान हो जाने पर जीवन आशातीत सफलताओं की राह पर अपने आप बढ चलता है। इसलिए माता-पिता की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, गुरु के बताए मार्ग पर चलना चाहिए और धर्म के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
मौजूदा परिप्रेक्ष्य में जीवन और समाज निर्माण के लिए भारतीय संस्कृति और संस्कारों के साथ ही मौलिक शिक्षाओं के संवहन पर जोर देते हुए उन्हने कहा कि आज की शिक्षा न दायित्व की सीमाओं से बंधी है, न अनुशासन से। ऐसे में अपनी मौलिक शिक्षा और संस्कारों को आत्मसात कर ही संस्कृति की रक्षा की जा सकती है।
उन्हने कहा कि जमाने के अनुरूप विकास के लिए शिक्षा और दूसरे आयाम बहुत जरूरी हैं। आज शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चला है मगर शिक्षा के साथ धर्म का संपुट हो, संस्कारों की भावना हो और मौलिक संस्कृति के आदर्श मूल्यों का समावेश होना जरूरी है। इसी से व्यक्ति और समाज विकास और आनंद की प्राप्ति कर सकता है।


मानवता की सेवा करो
मुनि ऋषभविजय महाराज ने कहा कि आज सबसे बडी जरूरत पीडत मानवता की सेवा करने की है। किसी का दिल जीतना है तो इसके लिए सेवा करो, ताकत के बूते किसी का दिल नहीं जीता जा सकता। रोगी व सुख की कोई जात नहीं होती। सेवा के क्षेत्रा अनन्त हैं। इनमें से अपनी रुचि के मुताबिक कोई भी सेवा क्षेत्र चुन लें और जुट जाएं निष्काम सेवा में। वस्तुतः दुःख में पडे हुए की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। इसी से हृदय और मस्तिष्क स्वच्छ होते हैं और समाज के हित में अच्छी व सकारात्मक सोच पैदा होती है। सर्वधर्म समभाव रखते हुए किसी के दुःख बांटे और सेवा करें। सुख बांटना सहज है लेकिन दुःखस बांटना उतना ही कठिन।  दुःख बांटने से ही दुष्कर्मों का नाश होता है और सच्चे सुख की प्राप्ति। यही मुक्ति का सबसे सहज जरिया है।


मुनि ऋषभविजय महाराज का अभिनंदन
सभा में बांसवाडा के सभी ब्राह्मण समाजों के प्रतिनिधियों और ज्योतिष, वेद एवं कर्मकाण्ड के विद्वानों की ओर से पं लक्ष्मीनारायण द्विवेदी, जयप्रकाश पण्ड्या, लक्ष्मीकान्त त्रिवेदी आदि ने शाल ओढाकर मुनि ऋषभविजय महाराज का अभिनंदन किया। ब्राह्मण महिलाओं की ओर से श्रीमती त्रिवेदी ने भी मुनिश्री को शॉल ओढायी।

लोढी काशी सदियों से रही है अव्वल
सभा की अध्यक्षता करते हुए जाने-माने प्राच्यविद्यामर्मज्ञ , गायत्री मण्डल के संरक्षक ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल ने लोढी काशी की पुरातन प्राच्यविद्या परम्पराओं और गौरव का स्मरण कराया और कहा कि यह क्षेत्र सदियों से इस मायने में अग्रणी रहा है।

राष्ट्रनिर्माण में ब्राह्मण अहम्
सभा में अपने उद्बोधन में राजस्थान ब्राह्मण महासभा के प्रदेश पदाधिकारी ज्योतिर्विद पं. लक्ष्मीनारायण द्विवेदी ने देश के उत्थान में ब्राह्मणों की भूमिका के इतिहास का स्मरण कराया और कहा कि ब्राह्मण समाज और राष्ट्र को दिशादृष्टि प्रदान करने वाले रहे है। इसके साथ ही संतों और ऋषि-मुनियों के आशीर्वाद की परम्पराओं ने भारतीय संस्कृति को संरक्षित किया है।
पं. द्विवेदी ने मुनि ऋषभविजय महाराज का परिचय दिया और लोक मंगल, गौसेवा तथा समाजोत्थान में किए जा रहे अनथक एवं व्यापक प्रयासों की जानकारी दी। सभा का संचालन सहस्र औदीच्य समाज के अध्यक्ष पं. जयप्रकाश पण्ड्या ने किया।




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