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दिल को छू गए आमिर के तारे
22 Dec 2007, 1612 Hrs

आमिर खान अपने पहले ही निर्देशन के प्रयास में पूरी तरह सफल हो गए हैं। कला और व्यावसायिकता का मिश्रण जिस खूबसूरती से उन्होंने तारें जमीन पर में किया है


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tare zameen parSaturday, 22 December 2007  आमिर खान अपने पहले ही निर्देशन के प्रयास में पूरी तरह सफल हो गए हैं। कला और व्यावसायिकता का मिश्रण जिस खूबसूरती से उन्होंने तारें जमीन पर में किया है उसके लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। निर्देशन- निर्माण और एक अभिनेता के रूप में वह छा गए हैं। हालांकि उनकी इस सफलता में उनके बचपन के दोस्त और तारें जमीन पर के असली नायक अमोल गुप्ते का भी बहुत बडा हाथ है। 

ईशान त्रिवेदी (दर्शील सफारी) एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त है जिसे शब्द याद नहीं रहते जिससे वह स्कूल में हमेशा पीछे रहता है। इस बीमारी को डिसलेक्सिरा कहा जाता है। अल्बर्ट आइन्स्टाइन, मशहूर चित्रकार वेन गॉग और आज के सफल सितारे अभिषेक बच्चन इसी बीमारी से ग्रस्त थे। ईशान के माता-पिता तो उसकी बीमारी को समझते ही नहीं, उसके शिक्षकों और दोस्तों को भी उसकी बीमारी के बारे में कुछ पता नहीं है। वह हमेशा बड़े बच्चों का शिकार बनता है। उसके माता-पिता भी उससे परेशान है। उन्हें लगता है कि वह मस्ती करना चाहता है इसलिए उसे सबक सिखाने के लिए बोर्डिंग स्कूल भेजा जाता है। वहाँ पर भी शिक्षक उसे बेकार समझते है। ऐसे में उस स्कूल में रामशंकर निकुंभ (आमिर खान) चित्रकला के टीचर के रूप में आ जाते हैं। निकुंभ ईशान की जानकारी इकट्ठा कर उसे मदद करते हैं क्योंकि बचपन में वे भी इसी बीमारी का शिकार हुए थे। वह ईशान में आत्मविश्वास जगाते हैं और वहीं पर फिल्म खत्म होती है। दब्बू बच्चा ईशान किस तरह एक होनहार होनहार ईशान में बदलता है, इस यथार्थ को आमिर ने बहुत ही खूबसूरती से परदे पर उतारा है।
इस फिल्म का सबसे सशक्त पहलू है दर्शील सफारी। दर्शील ने जिस तरह से ईशान के किरदार को परदे पर उतारा है उसे परदे पर देखकर ही अनुभव किया जा सकता है। आमिर की पहली जीत तो तो दर्शील को इस भूमिका में लेने से ही हो गई थी। इन दोनों के कंधों पर ही पूरी फिल्म है। उनके साथ ईशान के माता-पिता के रूप में विपिन शर्मा और टिस्का चोपड़ा और ईशान के बड़े भाई के रूप में सचेत इंजीनियर ने भी शानदार अभिनय किया है।
आमिर खान ने दिखा दिया है कि वह जितने अच्छे अभिनेता है उतने ही अच्छे निर्देशक भी । हालांकि यह बीमारी कोई नई बीमारी नहीं है इसके बावजूद इस कहानी को आमिर ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ परदे पर उतारा है। आमिर इस फिल्म को कला फिल्म बनाना नहीं चाहते थे और अमोल के निर्देशन में शायद यह फिल्म कला फिल्म ही बन जाती। फिल्म का क्लाइमैक्स पूरी तरह आमिर की व्यावसायिक बुध्दि का परिचय देता है।
तारे जमीन पर को सशक्त बनाने में संगीतकार शंकर अहसान लॉय का भी बहुत बडा हाथ है। शंकर महादेवन का गीत मैं कभी बतलाता नहीं पर अंधेरे से डरता हूँ, इस फिल्म के बाल नायक के दिल की बात कहता है। अगर आपको अपने आसपास की घटनाओं, मुसीबतों से जूझ रहे लोगों और लाचार जिंदगी जी रहे बीमरी से ग्रस्त बच्चों को देखने के बाद भी रोना नहीं आता है तो यह फिल्म आपको जरुर रुलाएगी। 




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