बांसवाडा, २३ सितम्बर/साधना के जरिये ईश्वर की कृपा प्राप्ति और साक्षात्कार के मुमुक्षुओं के लिए गणेश उपासना नितान्त अनिवार्य है। इसके बगैर न तो जीवन में और न ही साधना में कोई सफल हो सकता है। उक्त उद्गार जाने-माने प्राच्यविद्यामनीषी, गायत्री मण्डल के अध्यक्ष ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल ने रविवार को वनेश्वर के समीप गायत्री मण्डल वेद विद्यालय परिसर में प्राच्यविद्या शोध संस्थान के तत्वावधान में ‘‘गणेश उपासना का तांत्रिक महत्त्व‘‘ विषयक आध्यात्मिक संगोष्ठी में व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि श्री गुरु चरणों की अनुकंपा प्राप्त कर साधना पथ की ओर अग्रसर होने वाले साधकों के लिए महागणपति की साधना नितान्त आवश्यक है क्योंकि जिस मार्ग पर चल कर हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचना है उसमें आने वाले विघ्नों, अपसारण तथा कण्टाकीर्ण पथ को कुसुम-कोमल बनाने के लिए भगवान गणपति का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त कर लेना साधक का सर्वप्रथम कर्त्तव्य बन जाता है।
पं. शुक्ल ने कहा कि गणपति केवल विघ्न दूर करने वाले देव ही नहीं हैं वरन् ऋद्धि-सिद्धि के दाता, विद्याप्रदाता, मांगलिक कार्यों के पूरक, संग्राम-संकट के निवारक तथा सर्व विध मंगलकारी हैं। यौगिक साधना की पूर्ति में भी महागणपति की कृपा प्राप्ति अत्यावश्यक है।
गणेश उपासना के पुरातन महत्व और उपासना पद्धति पर विस्तार से जानकारी देते हुए मशहूर तंत्र-मंत्रविद् ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल ने रूद्रयामल सहित अनेक तंत्र ग्र्रंथों के उद्धरण देते हुए कहा कि गणेश उपासना के अनेक प्रकार हैं। स्वतंत्र देव के अतिरिक्त इन्हें षट्कुमार, पंच बालक, सप्तबालक आदि गणो में भी सम्मिलित माना गया है।
उन्होंने बताया कि गणपति की साधना के अनेक प्रकार हैं। पार्थिव गणेश प्रयोग ४२ दिन तक किया जाता है। गणपति तर्पण प्रयोग भी अपने आप में अनेक कामनाओं की पूर्ति करने वाला है।
ब्रह्मर्षि पं. शुक्ल ने बताया कि गणेश उपासना के अन्य प्रयोगों में एकाक्षर गणेश, हरिद्रा गणेश, विरिन्चि विघ्नेश,शक्ति गणेश, चतुरक्षर सिद्धि गणेश, लक्ष्मी गणेश, क्षिप्रप्रसादन गणेश, हेरम्ब गणेश, सुब्रह््मण्यम गणेश, वक्रतुण्ड गणेश, उच्छिष्ट गणेश आदि के प्रयोग अति महत्वपूर्ण हैं। इन मंत्रों के जाप, हवन और तर्पण के प्रयोगों के माध्यम से षट् कर्म सिद्धि, तिलक सिद्धि, अणिमादि अष्ट सिद्धि एवं स्वर्ण, यश, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति के उपाय भी बताये गए हैं। इन्हीं में चूर्ण साधन, धूप साधन, यंत्र धारण एवं निर्माण आदि विद्याएं भी सम्मिलित हैं। पृथक-पृथक कार्य साधन के लिए गणेश जी की विविध पदार्थों की मूर्तियों के निर्माण का विधान है।
वयोवृद्ध सिद्ध तांत्रिक पं. शुक्ल के अनुसार पौराणिक उक्ति ‘‘कलौ चण्डी विनायकौ‘‘ के अनुसार कलियुग में गणेश साधना का खास महत्त्व है। कलियुग में गणेशजी एवं चण्डी की साधना तत्काल कार्य सिद्ध करने वाली है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि गणपति की साधना गुरु या विद्वान ब्राह्मण से पूर्ण समझकर करने से सभी कार्यों की शीघ्र सिद्धि होती है। संगोष्ठी में राजेश त्रिवेदी, विनय भट्ट, नरेन्द्र आचार्य, विद्यासागर शुक्ल, चन्द्रकान्त मेहता, प्रदीप शुक्ला, राकेश शुक्ला, कन्हैयालाल जोशी, देवेन्द्र शुक्ल आदि ने विचार रखे।