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| 05 December 2008 |
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बीकानेर में दीपावली के अगले दिन सुबह गोवर्धन पूजा की धूम रही। महिलाओं ने सुबह जल्दी उठकर गोवर्धन पूजा की । घर के सभी बडे व बच्चों गोवर्धन की पूजा की व तिलक लगाकर परिक्रमा निकाली। गोवर्धनपूजा को लेकर यह मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपने गाँव में इंद्र की पूजा होते देखी तो उनसे रहा न गया। घर जाने पर नंद बाबा भी इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे। कृष्ण ने पूरे गाँव को इंद्र की पूजा करने से मना कर दिया व कहा कि गोवर्धन पर्वत हमारे जीवन का आधार है। यहीं पर हमारी गाऍं चरती है और हमें दूध देती है इसलिए अगर किसी की पूजा होनी चाहिए तो गोवर्धन की होनी चाहिए। कृष्ण के कहने पर पूरे गाँव ने गोवर्धन की पूजा की। इंद्र ने इस घटना को अपना अपमान समझा और पूरे नंद गाँव को पानी में डूबने के लिए जमकर वर्षा की। इंद्र का घमंड उतारने के लिए कृष्ण भगवान ने स्वयं अपनी कनिष्का अंगुली पर गोवर्धन धारण कर गॉव की रक्षा की व इंद्र का घमण्ड दूर किया। इंद्र ने कृष्ण से माफी मांगी और तब से पूरे देश मे तब से गोवर्धन पूजा की रस्म पड गई। बीकानेर में भी गोवर्धन पूजा धूमधाम से की गई। पहले गोबर का लेप कर घर की चौखट के बाहर गोवर्धन बनाया गया फिर उस पर लाल मिट्टी व सफेद मिट्टी से मांडणे बनाए गए और गोबर से स्वास्तिक बनाकर पूजा की गई। इस गोवर्धन पर बूर लगाकर पूजा की जाती है और जो प्रसाद लक्ष्मी पूजर के समय लक्ष्मी माता के लगाया जाता है वही प्रसाद गोवर्धन के लगाकर घर में समृद्धि की कामना की जाती है।
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