जयपुर। मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा है कि साहित्यकार अपने सामाजिक सरोकार और चिंतन से समाज और शासन का मार्गदर्शन करता है। इसी कारण उनका हर युग में सम्मान होता रहा है। गहलोत सोमवार की शाम जवाहर कला केन्द्र में के.के. बिडला फाउण्डेशन द्वारा स्थापित बिहारी पुरस्कार-2008 के समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने हिन्दी एवं राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार, नंद भारद्वाज को फाउण्डेशन की ओर से प्रशस्ति, फाउण्डेशन प्रतीक एवं एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की। गहलोत ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष द्वीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया तथा वीणा अकादमी की कलाकारों ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। गहलोत ने कहा कि किसी भी मुल्क, प्रदेश या क्षेत्र में जो भी चुनौतियां सामने आती हैं तो लेखक, पत्रकार, चिंतक और साहित्यकार उनका मुकाबला करने के लिए आगे आते हैं जिससे समाज में भी उन चुनौतियों का मुकाबला करने का माद्दा पैदा होता है। गहलोत ने कहा कि एक कवि के रूप में महाकवि बिहारी ने अमिट छाप छोडी और शासन को दिशा प्रदान की। ऐसे कवियों पर हमें गर्व है। गहलोत ने शब्द शक्ति की महत्ता की चर्चा करते हुए कहा कि आजादी से पहले साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने शब्दों के जरिये समाज और देश में जागृति लाने का मार्ग प्रशस्त किया। हमारे समाचार पत्रों में छपी खबर का असर गांव और ढाणी तक पहुंचता है और लोग उनका विश्वास करते हैं। गहलोत ने कहा कि समाज और शासन सदैव साहित्यकारों और पत्रकारों के प्रति संवेदनशील है और उनका साथ देना चाहता है। उन्हें कोई कष्ट होता है तो उसका इन सभी को दर्द होता है। ऐसे में सरकार हर स्थिति में उनके सम्मान और दुःख-सुख में साथ खडी रहेगी। उन्होंने स्मरण कराया कि हमने एक करोड रूपये की राशि का पत्रकारों और साहित्यकारों के लिए कल्याण कोष बनाया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि समाज को साहित्यकारों के महत्व का अहसास है। उनकी ओर से जो भी सुझाव आयेंगे उन पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जायेगा। उन्होंने देश की आजादी के आंदोलन में प्रवासी राजस्थानियों के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि उस समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्व. जी.डी. बिडला ने साथ दिया था। हमारे लिये फक्र की बात है कि आजादी की जंग में प्रवासीजन ने पूरा साथ दिया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उनकी भावी पीढी भी उस रिश्ते को कायम रखेगी। गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल में आयोजित राजस्थानी कॉनक्लेव का स्मरण कराते हुए कहा कि उसमें सभी घराने शामिल हुए थे। उस सम्मेलन का मकसद था कि प्रवासीजन का राजस्थान से रिश्ता कायम रहे। उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि प्रवासी चाहे मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, अथवा तमिलनाडु, उडीसा, कर्नाटक एवं केरल या वहां के दूरदराज इलाकों में रहते हों, वे घरों में राजस्थानी भाषा में बातचीत करते हैं। साथ ही अपनी जन्म भूमि से रिश्ता बनाये रखते हैं। अकाल के समय चारा एवं पानी का बंदोबस्त हो अथवा गांवों में स्कूल और अस्पताल बनाने हों, वे उनके जरिये अपने रिश्ते को कायम रखते है। गहलोत ने के.के.बिडला फाउण्डेशन के संस्थापक स्व. के.के. बिडला एवं उनसे अपने संबंधों का स्मरण कराते हुए कहा कि वे आखिरी सांस तक देश, प्रदेश और दिल्ली में सक्रिय रहे। उनका सोच उद्योगपति के साथ-साथ विज्ञान, इतिहास, साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र के विकास में भी रहा। उन्होंने इन क्षेत्रों में पात्र लोगों को सम्मान देकर पूरे समाज को संदेश दिया। आज वे हमारे बीच नहीं है लेकिन फाउण्डेशन की अध्यक्ष, श्रीमती शोभना भरतिया उनके काम को आगे बढा रही है और वे भी स्व. बिडला की भांति यहां आती रहेंगी। गहलोत ने सम्मानित साहित्यकार नंद भारद्वाज को इस पुरस्कार के लिए हार्दिक बधाई देते हुए उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व और आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से मिले सम्मान की चर्चा करते हुए कहा कि लेखक, समीक्षक तथा दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के माध्यम से उन्होंने जनता से संवाद में भागीदारी निभाई। गहलोत ने बिहारी पुरस्कार की निर्णायक समिति की अध्यक्ष प्रो. रमासिंह की हिन्दी साहित्य की सेवा और उनके अंदाजेबयां पर खुशी जाहिर करते हुए साधुवाद दिया और कहा कि उनके सान्निध्य में पुरस्कार के लिये कृति के चयन जैसा कठिन कार्य किया गया। इससे पूर्व वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज ने अपनी साहित्य यात्रा पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अन्य कार्यों की भांति साहित्य जीवन का सहज कर्म है। उन्होंने कहा कि व्यंजित काव्य का असर मुखर से भी अधिक होता है। उन्होंने कहा कि लोक और तंत्र एक दूसरे के पूरक होकर ही कारगर हो सकते हैं। के.के. बिडला फाउण्डेशन की अध्यक्ष, श्रीमती शोभना भरतिया ने अपने स्वागत भाषण में बताया कि स्व. के.के. बिडला ने सन् 1991 में इस फाउण्डेशन की स्थापना के साथ ही बिहारी पुरस्कार की शुरूआत की। वे स्वयं पुरस्कार समारोह में मौजूद रहते थे। उन्होंने उस परम्परा को कायम रखने का विश्वास जताया तथा कहा कि प्रदेश के साहित्य एवं संस्कृति के विकास में उनका योगदान हमेशा रहेगा। उन्होंने मंचासीन सभी अतिथियों का पुष्प गुच्छ से स्वागत किया। बिहारी पुरस्कार निर्णायक समिति की अध्यक्ष, प्रो. रमासिंह ने श्रीनंद भारद्वाज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय देते हुए कहा कि उनका अंदाजेबयां अनूठा एवं शब्दावली जनजीवन की है। उनकी पुरस्कृत कृति ‘‘हरी दूब का सपना’’ में सामाजिक सरोकार का संदेश दिया गया है। फाउण्डेशन के श्री निर्मल कांति भाचार्जी ने पुरस्कार की प्रशस्ति का पठन किया तथा अंत में सभी के प्रति आभार ज्ञापित किया। समारोह में ऊर्जा मंत्री डा. जितेन्द्र सिंह, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री एमादुद्दीन अहमद, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री महिपाल मदेरणा, कृषि मंत्री हरजीराम बुरडक सहित बडी संख्या में साहित्यकार, प्रबुद्घजन एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।