गुजरात में नरेंद्र मोदी के जीत जाने से अगर किसी को सबसे ज्यादा तकलीफ है तो वह कॉंग्रेस को नहीं बल्कि देश के खबरिया चैनलों और दिल्ली के अंग्रेजी अखबारों को है।
गुजरात में नरेंद्र मोदी के जीत जाने से अगर किसी को सबसे ज्यादा तकलीफ है तो वह कॉंग्रेस को नहीं बल्कि देश के खबरिया चैनलों और दिल्ली के अंग्रेजी अखबारों को है। जो चीख चीख कर इस बात का दावा कर रहे थे कि अगर मोदी दोबारा जीत गए तो तो सांप्रदायिक सद्भाव को खतरा पैदा हो जाएगा, पूरी दुनिया में गलत संदेश जाएगा और मुसलमानों का कत्लेआम होने लगेगा। लेकिन बिल्ली के भाग्य से छींका नहीं टूटता है, इसलिए सोनिया गाँधी द्वारा हत्या के सौदागर जैसे प्रमाण पत्र से नवाजे गए मोदी फिर ताल ठोककर जीतकर आ गए।
हम एक बात याद दिलाना चाहते हैं जो चुनाव के दौरान न तो भाजपा ने और न नरेंद्र मोदी ने उठाई। जिस समय आतंकवादियों ने कश्मीर में 80 हिन्दुओं को बेरहमी से मारा था उसी दिन गुजरात में एक मस्जिद को हटाने को लेकर हुए दंगो में दो दंगाई भी मारे गए थे, तब देश के स्वनामधन्य गृह मंत्री शिवराज पाटिल (जिनके बारे में कॉंग्रेस में चर्चा है कि अगर वो चुनाव जीत जाते तो मनमोहन सिंह की जगह प्रधान मंत्री की कुर्सी पर बैठे होते) कश्मीर नहीं गए वे भागकर बड़ौदा गए, दंगाईयों के परिवार वालों के जख्म सहलाने के लिए। जिस केंद्र सरकार के गृहमंत्री की संवेदना 80 हिन्दुओं की मौत से ज्यादा दो दंगाईयों के साथ हो, अगर उस सरकार की पार्टी हारती है तो संदेश साफ है कि आप देश के बहुसंख्यक मतदाताओं को और अधिक भ्रमित नहीं कर सकते।
इस चुनाव में मजे की बात यह रही कि कॉंग्रेस को मोदी के खिलाफ लड़ने के लिए मोदी द्वारा कॉंग्रेस में भेजे गए लोगों की ही मदद लेना पड़ी। देश की सरकार चलाने वाली किसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के लिए यह निश्चित ही शर्म और अफसोस की बात है कि उसे एक राज्य में विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कोई काबिल नेता तक नहीं मिला। कॉग्रेस को मोदी की हार की काल्पनिक भविष्यवाणियों से घबराए भाजपा में बैठे सत्तालोलुप नेताओं की मदद से ही गुजरात में चुनाव लड़ना पड़ा और मुँह की खानी पड़ी।
सोनिया गाँधी की मुसीबत यह है कि वे हिन्दी में पढ़े जाने वाले अपने भाषण का मतलब ही नहीं जानती। यह बात हमको तब पता चली जब महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के दौरान एक आमसभा में वे वोले जा रही थी कि आप लोग यहाँ बड़ी देर से तपती धूप में खड़े हैं- जबकि उस दिन बादल छाए हुए थे और मौसम बहुत सुहावना था और धूप का नामों निशान तक नहीं था। लेकिन सोनियाजी पूरे जोर शोर से अपने भाषण में बार बार तपती धूप का जिक्र करती रही। शायद ऐसा ही कुछ सोचकर उन्होंने मोदी को मौत का सौदागर कहा होगा। या फिर गुजरात चुनावों में कॉंग्रेस की संभावित मौत से आशंकित होकर सोनियाजी ने मोदी को मौत का सौदागर कह दिया होगा। निश्चित ही मोदी मौत के सौदागर निकले और उन्होंने डूबती और बीमार कॉंग्रेस को मौत की राह दिखा दी।
लेकिन मोदी की जीत पर उनकी तारीफों के पुल बॉंधने का यह मतलब नहीं कि हम भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिन्दू परिषद या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हिन्दू वादी नीतियों से इत्तफाक रखते हैं। राम मंदिर के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के सरकार में आने के बाद इस पार्टी ने, सत्ता के केंद्र में बने रहकर अपनी राजनीति चलाने वाले संघ के नेताओं ने और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने हिन्दू हितों के नाम पर जिस तरह हिन्दू और मुसलमानों के बीच साँप-छछूंदर का खेल खेला उसीका परिणाम था मोदी अपनी बेबाक और ईमानदार राजनीति की वजह से एक सर्वमान्य नेता के रूप में उभरकर सामने आए। भारतीय जनता पार्टी को यह बात स्वीकार कर लेना चाहिए कि अब चुनाव जीतने का दमखम न तो अटल बिहारी बाजपेयी के पास है, न जिन्ना के गुणगान करने वाले लालकृष्ण आडवानी के पास। हमें तो 'लाल' और 'कृष्ण' दोनों शब्द एक साथ होने का मतलब आज तक समझ में नहीं आया।
भारतीय जनता पार्टी के परंपरागत मतदाता आडवाणी, बाजपेयी और अन्य तमाम काठ की हांडियों को आजमा चुके हैं। अब इस देश के लोगों को नरेंद्र मोदी की जरुरत है, जिसके राज्य में आतंकवादी गतिविधियाँ नहीं होती, अक्षरधाम मंदिर में हमला करने वालों को सजा होती है। नेतृत्व विहीन इस देश के हिन्दी भाषी राज्यों को आज मोदी जैसे नेता की जरुरत है, दुर्भाग्य की बात है कि हिन्दी भाषी राज्यों में कॉंग्रेस और भाजपा दोनों ही के पास ऐसा जनाधार कोई वाला कोई नेता नहीं है, जो प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक सूझबूझ के मामले में मोदी व्यक्तित्व को चुनौती दे सके।
कार्टून किरदारों को मात करने वाले और प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले लालू यादव तो कॉंग्रेस के बार बार निवेदन किए जाने के बावजूद भी गुजरात में चुनाव प्रचार करने नहीं गए। मोदी को सींखचों में बंद करने का दावा करने वाले लालू अपने दम पर गुजरात में कम से कम एक उम्मीदवार तो जिता लाने की कोशिश तो करते।