कौन कहता है आकाश में सुराख़ नही हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों
हिन्दी के पहले गज़लकार स्वर्गीय दुष्यंत ने जब यह बात कही थी तो शायद उनको पता नहीं था कि हिन्दी में कही गई उनकी इस बात को हिन्दी के प्रति समर्पित कुछ लोग एक दिन हकीकत में बदल देंगे। 'हिन्द युग्म' ने इंटरनेट के माध्यम से हिन्दी और हिन्दी के नवोदित रचनाकारों को भीड़ से अलग एक नया मंच देने की पहल की है। सरकारी हिन्दी विभागों से लेकर चुटकुलेबाज कवियों की मौजूदगी में होने वाले कवि सम्मेलनों और खबरिया चैनलों के अधकचरी हिन्दी जानने वाले एंकरों और संवाददाताओं से लहुलुहान हो रही हिन्दी को बचाने की दिशा में 'हिन्द युग्म' की कोशिशों पर प्रस्तुत है यह आलेख।
विडम्बना की बातें की जाती हैं, कि एक अरब की जनसंख्या वाले इस राष्ट्र में हिन्दी की दुर्दशा है। जब भी आँसू बहाने की बारी आती है हिन्दी के दिवस मनाये जाते हैं और फिर एक वर्ष का मौन व्रत। इस भाषा की तरक्की और विस्तार के लिये आखिर बुनियादी स्तर पर कार्य क्या हुआ है? सरकारी फाइलें जो भी कहती हों केवल आँकड़ों का खेल ही होगा। दशा पर बहुत चर्चाएँ हुईं, किंतु दिशा की बातें कम ही हुई हैं। जब मैं सोचता हिन्दी में हूँ, पुकारता हिन्दी में हूँ, खुश हिन्दी में होता हूँ, मन की भड़ास हिन्दी में, तो भाई यह अंग्रेज़ी कब तक गुप-चुप "मम्मी-लेंग्वेज " रहेगी?....।
चिड़िया की कहानी याद आती है। खेत में घोसला था और रोज किसान खेत काटने की बात करता और किसी न किसी रिश्तेदार को काम सौंप कर चला जाता। चिड़िया नित्य चर्चा सुनती और निश्चिंत होकर काम पर निकल जाती। एक दिन जब किसान ने कहा कि निकम्मे हैं सारे लोग "कल खेत मैं काटूंगा " चिड़िया बच्चों सहित खेत से उड गयी, जानती थी कि खेत ज़रूर कटेगा। और ऐसा ही हुआ। हिन्द-युग्म को ऐसा ही प्रयास कहा जा सकता है जहाँ युवा उर्जा ने यह ठान लिया कि हिन्दी के लिये अब हमें ही जुटना होगा, पूरी गंभीरता और ताकत के साथ।
"हिन्द-युग्म" को हिन्दी और हिन्दुस्तान की बेहतरी के लिये कार्यरत रचनात्मक उर्जा का युग्म कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस विचार की परिकल्पना सर्वप्रथम कुछ युवा विद्यार्थियों ने की। हिन्दी और हिन्दुस्तान में नवक्रांति करने के संकल्प के साथ इन युवा विद्यार्थियों एवं कवि मित्रों नें सम्मिलित हो कर "मेरे कवि मित्र " नाम का ब्लॉग बनाया जिस पर वे अपनी कविताएँ प्रस्तुत किया करते। अंतरजाल में सामूहिक रूप से किसी ब्लॉग पर कविता के इस प्रकार के प्रस्तुतिकरण को धीरे-धीरे सराहना प्राप्त होने लगी और यह प्रयास "कुछ कवि मित्रों" की परिधि से बाहर आ गया। कई सामयिक और रचनात्मक ऊर्जा से भरे हुए युवा इस प्रयास से जुड़े और इसे अभियान का स्वरूप मिलने लगा। कोई भी सामूहिक प्रयास ऊर्जा के साथ साथ स्तर की अपेक्षा भी रखता है। स्तर ही इस प्रयास के प्राण हो सकते थे और स्तर को बनाये रखने के लिये जरूरी था कि इस अभियान से जुड़ने वाली ऊर्जा पर्याप्त साहित्यिक सोच रखती हो। ऐसे में एक ही राह थी कि कविता की प्रतियोगिता इस मंच से आयोजित हो और राष्ट्रव्यापी इस प्रतियोगिता के विजेता स्वत: ही इस अभियान की मशाल थाम लें। प्रतियोगिता के विचार के साथ पुरस्कार की बात भी उठी, चूंकि पूर्णत: अव्यावसायिक इस प्रयास को धनराशि की आवश्यकता तो थी ही, यदि प्रयास को विस्तार प्रदान करना था। अंशदान (स्वैच्छिक) की परिकल्पना के साथ हिन्द-युग्म का संचालन आरंभ हुआ और "हिन्द युग्म " परिकल्पना से आगे निकल पड़ा।
यह प्रश्न प्राय: पूछा गया है कि "हिन्द युग्म " द्वारा अंतरजाल को ही माध्यम क्यों चुना गया। इस प्रश्न का उत्तर तकनीक और साहित्य के प्रयाग की ओर इंगित करता है। अखबारों में इन दिनों प्रकाशित हो रही कविताओं/कहनियो आदि को देखें तो लगता है कि या तो लेखन खो गया है या वास्तविक लेखन की प्रिंट-मीडिया तक पहुँच आसान नहीं रही। मंचों पर तो ऐसे कवियों का कब्जा है जो चुटकुला सम्राट हैं, यह अलग बात है कि पठन के अभाव में वर्तमान पीढ़ी इसे ही कविता मानती है। जो स्थापित पत्रिकायें हैं, उन तक पैंठ नये साहित्य सर्जकों की आसान भी नहीं...। फिर तकनीक के परिप्रेक्ष्य में अंतरजाल जैसे व्यापक माध्यम को अछूता क्यों छोड दिया जाय? अंतरजाल पर हिन्दी सामग्री अभी बहुत अधिक दृष्टिगोचर नहीं होती। कुछ वेब-पत्रिकायें, कुछ अखबारों के हिन्दी संस्करण तथा कुछ समाचार प्रधान साइटों के परे साहित्यिक हलचल से अंतर्जाल जगत अभी अछूता ही है। हाँ, हाल ही में यूनिकोड टाईपिंग द्वारा हिन्दी लिखना और उसका वेब-प्रस्तुतिकरण अवश्य आसान हुआ है। हिन्द युग्म ने अंतरजाल जगत की इसी नब्ज को और यूनिकोड की ताकत को पहचाना। अगर हिन्दी टाईप की जा सकेगी तो कागजों पर लिखा सृजन अंतरजाल तक आसानी से पहुँच सकेगा।
अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ साथ हिन्द-युग्म नें मुफ्त यूनिकोड प्रशिक्षण का कार्य भी आरंभ किया वह भी टेलीफोन द्वारा। इस प्रयास का सर्वत्र स्वागत हुआ है और हिन्द-युग्म के यूनिप्रशिक्षकों से यूनिकोड टाईपिंग सीखने वालों की तादाद दिन प्रतिदिन बढती जा रही है। सुखद यह है कि हिन्द-युग्म के यूनीप्रशिक्षकों ने देश ही नहीं विदेशों में भी यह प्रशिक्षण प्रदान किया है। हिन्दी की पुनर्स्थापना का रास्ता कंप्यूटर के कीबोर्ड से हो कर भी जाता है चूंकि हम जिस तकनीक का हवाला देते हैं, जिस तरक्की की दिशा तय करने का दावा करते हैं उसमें हिन्दी इसलिये पिछड़ जाती है चूंकि व्यापक विश्व मंच पर इसे प्रस्तुत कर पाना पहले सुविधाजन्य नहीं था। अब यूनिकोड जैसा हथियार है तो इसे उन सभी उंगलियों तक भी पहुँचाना आवश्यक है जिनमें हिन्दी के लिये छटपटाहट है, जिनकी कलम उठती तो है लेकिन उसे अंतरजाल पर रोमन अंग्रेजी में परोसने के अलावा कोई विकल्प नहीं और यह ऐसी भाषा है जिसमें अर्थ लिखा जाये तो अनर्थ समझा जा सकता है।
हिन्द युग्म के एक प्रचलित स्तंभ "काव्य-पल्लवन" की बात करना यहाँ आवश्यक है। एक ही विषय पर लिखी गयी अनेकों कवितायें। प्रत्येक माह खुले मंच में एक विषय सुनिश्चित किया जाता है जिस पर विश्व-भर से कवि अपनी रचनायें प्रेषित करते हैं। प्रतिमाह यह संकलन प्रकाशित होने से पूर्व श्रीमति स्मिता तिवारी जी के पास भेजा जाता है। वे इन रचनाओं पर अपनी पेंटिंग तैयार करती हैं और फिर हिन्द-युग्म पर यह दो विधाओं का अनोखा संगम प्रस्तुत होता है, जहाँ कविताओं पर पेंटिंग प्रकाशित होती हो। स्मिता जी के अलावा भी अनेक चित्रकार अब इस प्रयास का हिस्सा बने हैं।
केवल कविता पर कार्य करना ही तो हिन्द-युग्म का उद्देश्य नहीं था। इस मंच को तो साहित्यिक-सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये अपने पंख पसारने थे। गीतकार-संगीतकार-टेलीफिल्म निर्माता और गायकों को जोड़ कर हिन्द युग्म ने अपनी आवाज बुलंद करना आरंभ किया और देखते ही देखते इस में कई कवितायें पोडकास्ट हुईं। कुछ कविताओं को बाकायदा संगीतबद्ध कर प्रस्तुत किया गया तथा एक रचना पर वीडियो भी बनाया गया। हिन्दी कविता को यह स्वरूप प्रदान करने के पीछे युग्म की दूरदर्शिता उस वर्ग को आकृष्ट करने की है जो जानता ही नहीं कि अच्छे संगीत को भी अच्चे बोल चाहिये होते हैं। अपनी ताकत दिखाने के लिये हिन्दी कविता को इन मंचों पर उतरना ही होगा और हिन्द युग्म नें यह कार्य बखूबी किया है।
कहानी-कलश नाम से हिन्द-युग्म ने कहानियों पर केंद्रित अलग मंच बनाया। यह मंच नये अनुभवी कथाकारों का युग्म है। एक नई कहानी लगभग प्रत्येक ३-४ दिनों पर प्रकाशित होती है और अब लघुकथाये भी प्रकाशित हो रही हैं। कहानी-कलश को पाठको की बहुत अच्छी प्रतिक्रियायें प्राप्त हो रही हैं और शीघ्र ही कहानी विधा से जुड़े नये स्तंभ यहाँ प्रकाशित किये जायेंगे।
हिन्द युग्म का सबसे महत्वाकांक्षी स्तंभ है –बाल उद्यान। शून्य से ले कर तेरह वर्ष तक के बच्चों के किये कहानियाँ, कवितायें, आलेख, चित्रकथायें और भी बहुत कुछ है यहाँ। बच्चों के लिये हिन्दी में मौलिक सामग्री का नितांत अभाव है। पाठयपुस्तकों से ले कर बाजार में उपलब्ध हिन्दी बाल साहित्य अंग्रेजी कविताओं कहानियों का अनुवाद भर प्रतीत होता है। ऐसे में हिन्द युग्म के मंच के ऊपर एकत्रित हुए साहित्यकारों ने यह महसूस किया कि यह हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी है कि हम बाल साहित्य को समृद्ध करें। 'दीदी की पाती' और 'आओ चित्र बनाना सीखें' जैसे स्तंभ आरंभ कर इस मंच से बच्चों के लिये आनंद और ज्ञान का खजाना खोल दिया गया। बाल प्रतिभाओं की खोज भी इस मंच द्वारा आरंभ हुई और कई स्कूलों से छात्रों और अध्यापकों के पत्र और प्रतिक्रियाये हिन्द युग्म को प्राप्त होने लगीं जिसमें वे अपनी प्रतिभागिता भी चाहते थे। हिन्द-युग्म ने बच्चों के लिये यह मंच खोल दिया और हर्ष का विषय है कि बच्चों की जो मौलिक रचनायें प्रकाशित हुई हैं वे बताती हैं कि केवल थोड़े से प्रोत्साहन से हम कल के भारत को बेहतरीन साहित्यिक प्रतिभायें प्रदान कर सकते हैं।
बाल-उद्यान का भविष्य तब और भी सुरक्षित हो गया जब इस प्रयास से प्रसिद्ध बाल-साहित्यकार श्री जाकिर अलि "रजनीश " जी जुड़े। श्री रजनीश की पचास से अधिक बाल-साहित्य पर केंद्रित पुस्तके प्रकाशित हैं और अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से वे सम्मानित हैं। हिन्द युग्म गर्व करता है कि उन्होंने सहर्ष बाल-उद्यान का संचालन करना स्वीकार किया है। भविष्य में बच्चों के लिये यहाँ पिटारा खुलने ही वाला है।
हिन्द युग्म (www.hindyugm.com) वस्तुत: चार ब्लॉगों का युग्म है,
जिसमें कविता पर केंद्रित ( www.merekavimitra.blogspot.com),
कहानी पर केंद्रित-कहानी कलश (www.kahanikalash.blogspot.com),
और बाल साहित्य पर केंद्रित – बाल उद्यान ( www.baaludyan.blogspot.com )
सम्मिलित है। साथ ही कविता पर रिकार्ड हुए गीत, कवि की आवाज में रिकार्ड कवितायें, कविता पर बने वीडियो आदि (www.hindyugm.mypodcast.com ) भी सुने जा सकते हैं। हाल ही में विविध-भारती पर श्री यूनुस खान द्वारा संचालित कार्यक्रम में हिन्द-युग्म और उसकी गतिविधियों पर छ: मिनट का फीचर "यूथ एक्सप्रेस " कार्यक्रम में प्रसारित किया गया था जिसकी रिकार्डिंग को हिन्दयुग्म के मुख्य पृष्ठ से डाउनलोड कर सुना जा सकता है।
हिन्द-युग्म में रचना-प्रस्तोता साहित्यकारों को मार्गदर्शन मिल सके और इस मंच के स्तर में उत्तरोत्तर सुधार हो इसकेलिये वरिष्ठ साहित्यकारों से अनुरोध किया गया। हिन्द-युग्म के लिये यह गर्व का विषय है कि इस मंच पर प्रकाशित कविताओं पर साप्ताहिक समीक्षा श्री ऋषभ देव शर्मा द्वारा स्थायी स्तंभ के तौर पर की जा रही है। अंतरजाल पर सक्रिय एवं वरिष्ठ साहित्य मनीषी श्री जयप्रकाश मानस जी, कविताओं की मासिक समीक्षा करते हैं। इन वरिष्ठ कवियों की समलोचनाओं नें इस मंच से जुडे समकालीन कवियों को वह राह दिखाई कि एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा देखी जा सकती है। श्रीमति कविता वाचक्नवी जैसी विदूषी साहित्यकार युग्म के कविता निर्णायक मंडल में ही नहीं हैं अपितु उनके बहुमूल्य सुझावों नें युग्म को दिशा देने का भी कार्य किया है। युग्म में अतिथि कवि के रूप में वरिष्ठ कवि डॉ. कुमार विश्वास का जुडना भी उत्साहवर्धक रहा है।
हिन्द युग्म अपनी पारदर्शिता के लिये भी जाना जाता है। कविता प्रतियोगिता में प्रतिमाह लगभग चालीस से अधिक कवि प्रतिभागिता करते हैं और इस माध्यम से विजेता कवियों को पुरस्कारों के अलावा हिन्द-युग्म की सदस्यता भी प्राप्त होती है। साथ ही साथ हिन्द-युग्म के वरिष्ठ सदस्यों की एक कमेटी अंतरजाल पर प्रकाशित हो रही रचनाओं पर दृष्टि रखती है। बहुत अच्छा लिख रही युवा अथवा अनुभवी कलम से अनुरोध किया जाता है कि वे हिन्द-युग्म के मंच से अपनी बात कहें। इस तरह कम समय में ही हिन्द-युग्म समसामयिक अभिव्यक्ति का सश्क्त मंच बन गया है। हिन्द युग्म अपने सामाजिक सरोकारों को भी पूरा करना चाहता है इस लिये उसके भविष्य की योजनाओं में इस प्रयास का एक संस्था बन जाना सुनिश्चित है जिसकी पृष्ठभूमि में युग्म हिन्दी के प्रचार-प्रसार, साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन के अलावा कुछ एसे कार्य जैसे गरीब-मेधावी बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान करना आदि भी सम्मिलित है करना चाहता है।
किसी भी प्रयास को सराहना, सहयोग और मार्गदर्शकों की आवश्यकता होती है। हिन्द-युग्म अंतरजाल पर सक्रिय साहित्यकर्मियों का एक उत्साही समूह है जिसने ब्लॉगिंग की ताकत को समझा और रचनात्मकता को 'ज्योत से ज्योत जलाओ " से पिरो दिया। यदि यहाँ आने वाले आगंतुको की आवाजाही के आँकडों पर नज़र डाली जाय तो केवल दो महीनों में हिन्द युग्म 82 देशों के 56000 आगंतुकों तक पहुँचा और विश्व के 938 शहरों तक हिन्द-युग्म अपनी मशाल जला चुका है। ये आँकड़े उत्साहवर्धक तो हैं किंतु इसे युग्म की शुरूआत ही कहा जाना श्रेयस्कर होगा। मंज़िल अभी दूर है और चरैवेति, चरैवेति....। हिन्द-युग्म के ही एक युवा कवि आलोक शंकर के शब्दों में –
मैं युग्म, तुम्हारी भाषा का, हिन्दी की धूमिल आशा का;
मैं युग्म, एकता की संभव, हर ताकत की परिभाषा का
मैं युग्म हिन्द की अभिलाषा का, छोटा सा कोना भर हूँ
तुम एक पुष्प बस दे जाओ, मैं भारत का दोना भर दूँ