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वर्ष 2008-09 में 10 विदेशी विद्यार्थियों ने यहां किया शोध बीकानेर, संस्कृति व सभ्यता की दृष्टि से खास पहचान रखने वाले बीकानेर के अभिलेखागार में हर वर्ष करीब 500 शोधार्थी विभिन्न विषयों पर शोध करने आते है। यहां शोध के लिए आने वाले शोधार्थियों में विदेशी छात्र भी शामिल है। रियासत कालीन समय में कच्चे घरों पर की जाने वाली रंग बिरंगी छपाई एवं पशु पक्षियों के शिकार की घटनाओं पर आज भी विदेशों से विद्यार्थी यहां आकर शोध करते है। अभिलेखागार के निदेशक डा. महेन्द्र खडगावत ने बताया कि विदेशों से आने वाले शोधार्थी रियासतकाल में होने वाले आय-व्यय एवं उनके काम करने की प्रक्रिया पर ज्यादा शोध करते है। खडगावत ने बताया कि वर्ष 2008-09 में बीकानेर के अभिलेखागार में 10 विदेशी विद्यार्थियों ने विभिन्न विषयों पर शोध कर पीएचडी की डिग्री हासिल की है। विदेशी विद्यार्थियों में यूएस की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में पीएचडी करने वाली जूली हुजेज ने यहां रहकर राजाओं द्वारा जानवरों व पक्षियों के शिकार करने की प्रक्रिया पर रिसर्च किया। इसी तरह इटली के इसरे बंग ने बीकानेर में करीब 6 माह रहकर बीकानेर व जोधपुर रियासतों में दस्तावेजों को रखने एवं उनके काम करने के तरीके पर शोध किया है। लंदन के चेलकोट में रहने वाले नाडा ने पुराने समय में कपडों पर होने वाली छपाई एवं कढाई का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की है। वर्तमान में न्यूयार्क की यूनिवर्सिटी ऑफ बफालों की प्रोफेसर रामिया श्रीनिवासन ने 18वीं शताब्दी के समय की कानून प्रक्रिया और जातिवाद पर शोध कर रही है। वहीं इटली की रिटा पावलिनी ने 1896 से 1963 तक किस प्रकार नये भारत का उदय हुआ एवं आजाद भारत में राजाओं की भूमिका क्या रही पर रिसर्च कर रही है। अभिलेखागार के निदेशक ने बताया कि भारत के बेहतरीन विश्वविद्यालयों से विद्यार्थी यहां आते है जिसमें नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जामिया मीलिया, अलीगढ मुस्मिल यूनिवर्सिटी, पंजाब की चंडीगढ यूनिवर्सिटी, बनासर विश्वविद्यालय प्रमुख है। खडगावत के अनुसार वर्ष 2004 से पहले यहां आने वाले शोधार्थियों की संख्या बहुत कम थी लेकिन जैसे-जैसे यहां पर रियासतकालीन अभिलेखों को नया रूप दिया जा रहा है वैसे-वैसे शोधार्थियों की संख्या भी बढ रही है। रियासतकालीन दस्तावेजों का हो रहा है डिजिटिलाईजेशन
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