बीकानेर, उम्र के जिस पडाव में मनुष्य आध्यात्मिकता की और अग्रसर होता है। वही बीकानेर के एक युवा बुर्जुग ने अपने मन के भावों को जिस तरह चित्रों के जरीये उकेरा है उसे देखकर लगता है मानो ये चित्र अभी बोलकर अपने भावों की अभिव्यक्ति कर देग। इन कलाकृतियों में जो हाव-भाव दर्शाये गये है, उन्हें देख कर कोई दंग रह जाये। 1955 में सार्दुल स्कूल में पढने वाले कक्षा 8 के छात्र अजीत सिहं राठौड को जब चित्रकला के विषय में पूरक घोषित कर इस विषय को नहीं लेने की सलाह अध्यापकों ने दी तो इस घटना ने राठौड को झकझोर दिया। जबरन विज्ञान विषय लेकर चिकित्सा की उपाधि लेने वाले डॉ. अजीत सिहं का कलाकार अभी भी जिन्दा था और उन्होनें 1976 में अपनी इस कला को पुर्नजीवीत किया। डॉ. राठौड की यह कला 2003 तक तो अपने कमरे तक ही सीमित रही। जब उनके दौस्तों ने उनकी इस अदाकारी को भांपा तो वे डॉ. राठौड को प्रेरित करने में पीछे नहीं रहें। इसके बाद एक-एक करके इस कलाकार ने सैकडो की संख्या में चित्र बना डाले। प्रकृति, राजस्थानी परिवेश, विभाजन का दर्द, लचीले लोकतंत्र की व्यथा जैसी भावनाएं उनके चित्रों में स्पष्ट झलकती है। 68 वर्षिय राठौड कहते है कि मैं विदेश यात्रा के दौरान घंटो विश्व के ख्यातनाम व्यक्तित्वों की मजार पर बैठा यह सोचता कि जीवन में आये है तो कुछ कर के जाना चाहिए। डॉ. रविन्द्र टेगोर की किताबों से जो प्रेरणा मिली। उसी के परिणाम स्वरूप मैनें अपने अन्दर के इस कलाकार को कभी मरने नहीं दिया। अब डॉ. राठौड चिकित्सक पेशे के साथ-साथ इसे अपनी पूजा मानकर लिन्न होकर चित्र उकेरने में लगे है। और आमजन को अपनी भावनाएं दर्शाने के लिये दो तारीख से तीन दिवसीय अक्टुबर को बीकानेर के जूनागढ में एक चित्र प्रदर्शनी लगाने जा रहे है। इतना ही नहीं वेबसाइट के जरिये देश-दुनिया को नजर आयेगा। कला का यह पुजारी कि्रकेट व फोटोग्राफी में भी अपना हुनर दिखा चुका है। उनके दो फोटोग्राफ 1981 में विश्व फोटोग्राफी प्रदर्शनी में लगाये गये है ।