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05 July 2008
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5
Jun
आज भी याद आते है आदिवासियों के मसीहा भीखा भाई 
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- कल्पना डिण्डोर

Bheekha Bhaiराजस्थान और राष्ट्रीय राजनीति में दशकों तक आदिवासियों के मसीहा और विकास पुरुष के रूप में पहचाने जाने वाले भीखा भाई ने समाजसेवा, शासन-प्रशासन कौशल और बहुआयामी विकास तथा आदिवासी उत्थान से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में जो ऐतिहासिक कर्मयोग का परिचय दिया है वह युगों तक याद रखा जाएगा।
वागड अंचल के छोटे से गांव बुचिया बडा में जन्मे भीखा भाई ने अपनी प्रतिभा, साहस और अद्भुत मेधावी व्यक्तित्व के साथ देश में अजीम शख्सयत के रूप में जो पहचान बनायी, वह सदियों तक वागड अंचल को गौरव प्रदान करती रहेगी।
इस महान शख्सयत भीखाभाई का जन्म २८ अप्रेल १९१६ को डूंगरपुर जिले के सागवाडा क्षेत्रा अन्तर्गत बुचिया बडा गांव म सामान्य जनजाति परिवार में घीवा भाई के घर हुआ। घर की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के दौर में भीखा भाई में बचपन से ही प्रतिभा दिखने लगी थी।
उन्होंने अपने बूते भविष्य संवारने और खुद कुछ बन कर अपने समाज के विकास में जुटने का संकल्प लिया और उस दिशा में आगे बढते ही गए।कितनी ही बाधाएं उनके सामने आयीं लेकिन इस अदम्य आत्मविश्वासी व्यक्तित्व की राह वे रोक नहीं पायी।
भीखा भाई ने इन्टरमीडिएट, बीए, एलएलबी आदि की उपाधियां श्रेष्ठतम अंकों के साथ उत्तीर्ण की। उन्होंने महाराणा भूपाल कॉलेज उदयपुर तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के मेधावी एवं सर्वश्रेष्ठ छात्रा के रूप में आपने खासी पहचान भी बनायी।
सागवाडा में ब्राह्मण परिवारों के सम्फ तथा पारिवारिक संस्कारों और संत-महात्माओं के सान्निध्य की वजह से धर्म-कर्म के प्रति रुचि और संस्कार उनमें बचपन से ही विद्यमान रहे। वे हनुमानजी के परम भक्त थे तथा रोजाना उनकी दिनचर्या की शुरूआत हनुमानजी के दर्शन के बगैर नहीं होती थी। घर से निकलते ही सबसे पहले वे हनुमानजी के दर्शन करते, उसके बाद ही सामान्य दिनचर्या की शुरूआत करते।
सहृदय भीखाभाई के मन में आम आदमी के प्रति प्यार और आत्मीयता का जज्बा था। यही वजह है कि लोग उन्हें बाबूजी कहकर संरक्षक के रूप म उन्हें आदर और सम्मान देते थे। भीखा भाई की याददाश्त का कोई जवाब नहीं था। बुढापे में भी उन्हें हर बात याद रहती। यहां तक कि स्थानीय ग्रामीण का नाम हो या सागवाडा से लेकर जयपुर, दिल्ली तक के टेलीफोन नम्बर। ये सब उन्हें कंठस्थ थे।
हिन्दी और आंग्ल भाषा दोनों पर उनका अधिकार था। अधिकारियों से वार्ता हो या महानगरों के कार्यक्रम या फिर विदेश यात्रााएं। हर कहीं उन्होंने धाराप्रवाह अंग्रेजी की धाक जमायी। जनजाति वर्ग में कानूनविद, शिक्षाविद्, कुशल शासक-प्रशासक और राजनेता के साथ ही लोकप्रिय समाजसेवी के रूप में उन्होंने जो   छाप छोडी, वह बेमिसाल है।
आदिवासियों के कल्याण और आदिवासी अंचलों के उत्थान में वे ताजिन्दगी लगे रहे। आदिवासियों के नेता और मसीहा के रूप में उन्होंने दशकों तक राज किया। देश के महान राजनेताओं के मन में भी भीखा भाई के प्रति अगाध आस्था का ज्वार लहराता रहा। पूर्व प्रधानमंत्राी स्व. राजीव गांधी उन्हें भीष्म पितामह तथा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. नरसिंहाराव उन्हें जनजाति वर्ग के पितामह के रूप में संबोधित करते थे।
डूंगरपुर रियासत में मुंसिफ मजिस्ट्रेट के रूप में सेवा आरंभ करने वाले भीखा भाई ने इस पद से त्यागपत्रा दे दिया तथा स्वतंत्राता आन्दोलन में कूद पडे। बाद में डूंगरपुर में उत्तरदायी सरकार में शिक्षामंत्री बनाए गए।
विभिन्न राष्ट्रीय आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, संगठन में अनेक महत्वपूर्ण पदों आदि पर रहने के साथ ही वे राजस्थान में अनेक बार विधायक, उप मंत्री, केबिनेट मंत्राी, अजजा कल्याण समिति सहित  विभिन्न समितियों के सभापति रहे और अपनी प्रतिभा की छाप छोडी।
आदिवासियों के उत्थान तथा आदिवासी क्षेत्रा विकास के लिए उनकी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भीखा भाई को सन् १९८६-८७ में महाराणा मेवाड फाउण्डेशन द्वारा उन्हें पूंजा अवार्ड से सम्मानित किया गया।
Trible God Bheekha Bhaiइसके अलावा कई प्रतिष्ठित सम्मानों और पुरस्कारों से उन्हें नवाजा गया। हॉकी एवं फुटबाल खेलों के साथ ही परम्परागत खेलों, मेलों, पर्वों, उत्सवों में में उनकी रुचि रही। अपने जीवनकाल में उन्होंने जापान, बर्मा, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड,हांगकांग, स्वीट्जरलैण्ड, इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, यूगोस्लाविया, लेबनान, कुवैत आदि देशों की यात्राा की तथा कई प्रतिनिधि मण्डलों का नेतृत्व किया।
भीखा भाई आज हमारे बीच नहीं हैं मगर उनका कर्मयोग से परिपूर्ण व्यक्तित्व और कार्यों की सुगंध आज भी व्याप्त है जो युगों-युगों तक नई पीढी के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। वागडवासी आज उनकी पंचम पुण्यतिथि पर भीखाभाई के प्रति कोटिशः श्रद्धान्जलि अर्पित करते हैं।
कल्पना डिण्डोर, सूचना केन्द्र, बांसवाडा




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