Wednesday, 16 October 2019
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आलीजा है मेरा शहर


Shyam Narayan Ranga

राजस्थान के पश्चिम के थार के दूर तक फले मरूस्थल में एशिया के सबसे बडे गॉव के नाम से विख्यात एक ऐसा शहर जिसकी पहचान भुजिया व पापड के साथ साथ साझा संस्कृति के लिए भी पूरी दुनिया में की जाती है। मैं बात कर रहा ह बीकानेर की, मेरे शहर बीकानेर की। बीकानेर में आते ही एक मस्ती और उमंग का अनुभव होता है। बीकानेर की गलियों में संस्कृति बसती है, अपनापन बसता है, यहाँ के लोग स्वभाव से फक्कड व मस्त है लेकिन यहाँ के लोगों में आदमीयत की पहचान है। मेरे शहर में आकर आप किसी का पता पूछोगे तो साथ चलकर उस पते के घर तक छोड कर आएगा मेरे शहर का आदमी और बाहर से ही आवाज लगाएगा ’भाईजी थोरे कोई आयो है‘ । बीकानेर के लोग बाहर से आने वाले को यह नहीं पूछते कि घर ढढने में परेशानी तो नहीं हुई। इक्कसवीं सदी के विकास के इस दौर में विज्ञान की सफलताओं के साथ मेरे शहर ने तहजीब व अपनेपन से किनारा नहीं किया है। मेरा शहर पाटों व धूणियों पर बसता है। यहाँ के लोग दिन भर की मेहनत के बाद अपने समाज व दोस्तों के साथ बैठना नहीं भूलते। बीकानेर के लोग हिन्दी फिल्मों व गानों को सुनते व गुनगुनाते तो है मगर गणगौर के वक्त पाटों पर बैठकर गणगौर के गीत भी गाते है।
मेरे शहर में आदमी के साथ साथ जानवरों की भी चिन्ता की जाती है, यहाँ आज भी जब कुत्तों के पिल्ले होते हैं तो गली मौहल्ले के लडके अपने पूरे मौहल्ले में घूमकर आटा व तेल इकट्ठा करते है और अपने गली की कुतिया के लिए हलवा बनाते ह। आज भी शहर के बडा बाजार सहित कईं स्थानों पर रात को लोग रोटीयाँ बनाते मिलेंगे अपने लिए नहीं बल्कि शहर के जानवरों के लिए। जी हाँ फिर ये सारी रोटियाँ घूमघूम कर शहर के जानवरों को खिलाई जाती है और यह काम एक दिन का नहीं रोज का है। यहॉ के जानवर भी अपने लोगों की भाषा पहचानते है अगर आपको इसका नजारा देखना हो तो कभी लक्ष्मीनाथजी के मंदिर या भैरव कुटिया की तरफ जाइएगा जहाँ किसी के लूना के हार्न की आवाज सुनकर कए इक्ट्ठे हो जाते हैं तो कहीं किसी की टिचकारी पर गायें आ जाती है। कोई अपने साईकिल की घंटी से कबूतरों को बुलाता है तो कोई अपने आने की आहट मात्र से कुत्तों को इकट्ठा करता है और ये सब लोग किसी न किसी तरह इन जानवरों को चुग्गा दाना या रोटी डालते है।
समाजवाद के सिद्धांत को अमलीजामा पहना देंखेगे आप इस शहर में। यहाँ अमीर गरीब में भेद नहीं है। चाहे कितना भी बडा सेठ साहूकार हो या गरीब से गरीब आदमी शाम के वक्त पाटों पर धूणियों पर और मंदिरों में चौक में आपको सब एक साथ नजर आएंगे। आज भी मेरे शहर में भाई भाई की कदर करता है। इसकी मिसाल यह है कि एक घर में अगर दो भाई है और एक बेराजगार है तो कमाता खाता भाई अपने दूसरे भाई की पूरी मदद करता है और इसके बच्चों की शादी व सारे सामाजिक दायित्व भी निभाता है। यहाँ बुजुर्गों का सम्मान होता है, आपको मेरे शहर में बडे बुजुर्गों की कद्र करते लोग व उनको ’पगेलागणा‘ व ’राम राम‘ करते लोग मिल जाएंगे। शायद यही कारण है कि मेरे शहर में अनाथालयों व वृद्धाश्रमों की संख्या नही ंके बराबर है।
मेरे शहर ने अपने स्वभाव को नहीं छोडा है। यहाँ के इंसानों को इंसान की पहचान है और शायद यही कारण है कि अपनी स्थापना के सवा पाँच सौ साल के इतिहास में कभी मेरे शहर में कोई साम्प्रदायिक उन्माद नहीं हुआ है। जिस दिन बाबरी मस्जिद का विवादित ढाँचा टूटा था उस दिन पूरे देश में हाहाकार था लेकिन बीकानेर में शहर के मौजीज लोग सडकों पर थे जिनमें हिन्दू व मुसलमान दोनों थे और एक कंकर भी किसी पर नहीं उछाला किसी ने, ऐसा है मेरा शहर।
बीकानेर में प्रत्येक त्यौंहार साम्प्रदायिक सौहार्द व अपनेपन के साथ मिलकर मनाया जाता है। होली पर यहाँ के लोग खुल कर मस्ती करते हैं सारा शहर पूरे दिन होली के रंग मे सरोबार रहता है और यहाँ की होली मुसलमान व हिन्दू या कोई और धर्म के लोग एक साथ मनाते हैं। बीकानेर में दिपावली का त्यौंहार भी हिन्दू मुसलमान दोनों द्वारा मनाया जाता है। बीकानेर के मुसलमान भाईयों की दुकानों पर आपको माँ लक्ष्मी व भगवान गणेश के चित्र देखने को मिल जाएंगे। बीकानेर के पूर्व महापौर मकसूद अहमद के घर दिपावली की रौनक किसी हिन्दू के घर से कम नहीं रहती। वे अपने सब बच्चों को नए कपडे व मिठाई दिलाते हैं और इनके बच्चे पटाखे छोड कर दिपावली का स्वागत करते है। मेरे से एक बार बातचीत के दौरान मकसूद भाई ने कहा कि दिपावली का समय है सो घर की औरतें साफ सफाई में लगी है, मतलब यह कि यहाँ सिर्फ हिन्दू ही दिपावली के समय अपने घरों का रंग रोगन कर सफाई नहीं करते बल्कि यहाँ के मुसलमान भी दिपावली को बडी शिद्दत व भाव से मनाते ह। पुराने बाजार में रंग के पुराने व्यापारी बरकत भाई जी के लडके से बात करने पर पता चलता है कि वो किसी वैष्णव से कम नहीं है, अपने घर का ही पानी पीते हैं और अपने घर का बना ही खाना खाते है। मेरे शहर के नामचीन मुसलमान व्यापारी हारून मेमन साहब आज भी प्रतिदिन बडा गणेश जी के मंदिर जाते है। गणेश जी के मंदिर के पुजारी भी हारून साहब का इंतजार करते हैं। इसी तरह मेरा दोस्त शराफत हनुमान जी का भक्त है और हनुमान जी का बडा प्रसाद होने पर वह जरूर आता है और अपनी तरफ से भी प्रसाद में हिस्सेदारी निभाता है। ईद के दिन जब मुसलमान भाई शहर की सबसे बडी ईदगाह पर नमाज पढने आते हैं तो उन्हें ईद की मुबारक बाद देने मनोहर जी पहलवान व नू महाराज व नीना भाईजी जैसे लोग तैयार मिलते हैं। यहाँ ईद के दिन ईद की सेवाईयाँ खाने अजीत भुट्टा के घर शहर के सब पत्रकारी पहचते हैं। शहर की इस सबसे बडी ईदगाह में जितना समय मुसलमान भाईयों ने नहीं बिताया होगा उससे ज्यादा समय यहाँ के आस पास रहने वाले हिन्दू भाईयों ने व्यतीत किया है। बीकानेर के दो पीर व हाजी बलवान सैयद साहब के समने से गुजरते वक्त हर व्यक्ति का सिर सजदे होता है। मैं अपने बारे में बताता ह कि मुझे खुद मोहर्रम वाले दिन ताजिये के नीचे से निकाला गया था जब मैं छोटा था मुझे वो दिन आज भी याद है क्योंकि मेरी नानी ने यह मन्नत मांगी थी कि अगर मेरे नाती होता है तो उसे ताजिये के नीचे से निकालूंगी। इसी तरह बीकानेर की सब समाजों की शादियों में ’मीनू‘ चाहे जो कुछ हो पर होगा बिना प्याज लहसुन का। चाहे रूबी की रूखसाना की शादी हो या शराफत की बारात। यहाँ के सभी जाती के लोगों को पता है कि उनकी शादियों में शहर के पुष्करणा ब्राह्मण भी बडी संख्या में शरीक होते है जो प्याज लहसुन नहीं खाते तो यहाँ की शादियों में प्याज लहसुन का सामान्यतः प्रयोग नहीं किया जाता, ऐसा है मेरा शहर।
मेरे को शायर अजीज साहब की पंक्तियाँ याद आ रही है कि .........बस एक रात मेरे शहर में गुजार कर तो देख सारा जहर न उतर जाए तो कहना।
इसी तरह लक्ष्मी नारायण रंगा जी की कही पंक्तियों में भी बताया गया है कि
बीकानेर की संस्कृति में सबका साझा सीर, दाउजी मेरे देवता, नौगजा मेरे पीर। 
 

श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर