Friday, 25 September 2020
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अराजकता का दर्शन


संसदीय चुनावों की घोषणा के दिन भारत के कुछ शहरों में दो दलों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसक झड़पों  के बाद से ही अब राजनीतिक अराजकता का प्रारम्भ माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता केवल इसलिए आपा खो बैठे क्योंकि उनके नेता अरविंद केजरीवाल को गुजरात में पुलिस ने रोक लिया।  यह सही नहीं है। चूंकि केजरीवाल और उनके समर्थक नरेंद्र मोदी के साथ सीधी टक्कर लेते हुए दिखना चाहते हैं और यह दिखाना चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी का असली विकल्प केजरीवाल ही हैं, इसलिए भी उनके लिए यह प्रचारित करना जरूरी हो गया कि केजरीवाल को जानबूझकर रोका गया है। केजरीवाल स्वयं को अराजकतावादी घोषित कर चुके हैं। उनके अनुयायियों का अराजक आचरण और भाजपा कार्यकर्ताओं का तुरत वैसा ही अराजक एवं हिंसक जवाब लोकतंत्र के भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं करते। हम देखते हैं कि पिछले 67 सालों में भारत में असहिष्णुता की प्रवृत्ति काफी बढ़ी है। लेकिन यदि हम सोचें कि अराजकता वास्तव में है क्या तो यह तथ्य हमारी समझ को थोडा सही दिशा में ले जा सकता है। दरअसल अराजकता एक आदर्श स्थिति है जब शासक स्वेच्छाचारी, अपराधी और निरंकुश हों तो अराजकता प्रतिरोध के रूप में उठती है। अराजकतावाद राज्य को समाप्त कर व्यक्तियों, समूहों और राष्ट्रों के बीच स्वतंत्र और सहज सहयोग द्वारा समस्त मानवीय संबंधों में न्याय स्थापित करने के प्रयत्नों का सिद्धांत है। अराजकतावाद के अनुसार कार्यस्वातंत्र्य जीवन का गत्यात्मक नियम है, और इसीलिए उसका मंतव्य है कि सामाजिक संगठन व्यक्तियों के कार्य स्वातंत्र्य के लिए अधिकतम अवसर प्रदान करे। मानवीय प्रकृति में आत्मनियमन की ऐसी शक्ति है जो बाह्य नियंत्रण से मुक्त रहने पर सहज ही सुव्यवस्था स्थापित कर सकती है। मनुष्य पर अनुशासन का आरोपण ही सामाजिक और नैतिक बुराइयों का जनक है। इसलिए हिंसा पर आश्रित राज्य तथा उसकी अन्य संस्थाएँ इन बुराइयों को दूर नहीं कर सकतीं। मनुष्य स्वभावत: अच्छा है, किंतु ये संस्थाएँ मनुष्य को भ्रष्ट कर देती हैं। बाह्य नियंत्रण से मुक्त, वास्तविक स्वतंत्रता का सहयोगी सामूहिक जीवन प्रमुख रीति से छोटे समूहों से संभव है; इसलिए सामाजिक संगठन का आदर्श रूप समूहों का आपसे समन्वय होता है। जनता जब शासन की अकर्मण्यता, कानूनहीनता और भ्रष्ट आचरण से त्रस्त हो जाती है तो उसकी और से यह प्रतिक्रिया होती है जिसे केजरीवाल ने अपनी राजनीति का अस्त्र बनाया है। अब अराजकता को भारत में प्रचलित अर्थों के सन्दर्भ में देखने पर पर कुछ अलग ही चित्र उभरता है। अगर हम सम्यक विश्लेषण करें तो हम कह सकते हैं कि कांग्रेस इस देशकी पहली अराजक पार्टी है! संजय ब्रिगेड और युवक कांग्रेस का तांडव हम भले ही भूल चुके हों लेकिन आपातकाल की यादें तो आज भी हैं। सांप्रदायिक भाजपा का बाबरी मस्जिद ध्वंस और गुजरात जनसंहार क्या बहुत सौजन्यता और भलाई के काम थे ? कांग्रेस से उत्पन्न समाजवादी पार्टी तो अपनी अराजकता के लिए देशभर में कुख्यात रही है। अब ध्यान दें तो पता चलेगा कि शिवसेना हो या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना दोनों का डीएनए एक है। दोनों लोकतंत्र और संविधान को न मानने वाले दल हैं। हमारे लोकतंत्र की खामियों का फायदा उठाकर वे विधानसभा और संसद तक भले पहुंच जाएं पर वे कार्य और व्यवहार दोनो से अलोकतांत्रिक हैं। बाल ठाकरे के शिवसैनिक सालों से पत्रकारों और अपने विरोधी विचारों से इसी तरह निपटते आए हैं। क्योंकि लोकतंत्र में भरोसा होता तो ये पार्टी या राजनीतिक दल बनाते, सेना नहीं। मुम्बई में शिवसेना सहित सभी दल चुनाव में दबंगों और अपराधियों से मदद लेते है। उत्तरप्रदेश, बिहार तो राजनीति के अपराधीकरण के लिए बदनाम हो रहे है। दूसरे प्रदेशो में भी अब अपराधी और राजनेताओं में परस्पर सहयोग के लिए रिश्ते मजबूत होने लगे है। वोट की राजनीति में चुनाव में ज्यादा से ज्यादा वोट कबाड़ने के लिए राजनैतिक दल परोक्ष रूप से इलाकों के दबंगों और अपराधियों की मदद लेते रहे है, लेकिन अब जब इन असमाजिक तत्वों को अपनी ताकत का पता चल चुका है, तो उन्होंने सीधे अपने राजनैतिक मित्रों की मदद से राजनीति में घुसपैठ बढ़ा दी है। सही मायने में ये लोग लोकतंत्र में बाहुबल और शक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए आए हैं। इन्हें तर्क, संवाद और बातचीत में आस्था नहीं है। कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों की विफलता यही है कि वे ऐसी अराजक क्षेत्रीय ताकत के साथ खड़े नजर आते हैं। भाजपा जहां शिवसेना की साझीदार है वहीं कांग्रेस के ऊपर शिवसेना और अब मनसे को फलने- फूलने के अवसर देने के आरोप हैं। कभी कांग्रेस की राजनीति में कद्दावर रहे तमाम नेताओं के साथ शिवसेना प्रमुख के रिश्तों के चलते ही उसे महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़त मिली। आज आरोप यह है कि कांग्रेस की सरकार के ढीलेपन के चलते ही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना अपनी गुंडागर्दी जारी रखे हुए है। उनकी हिम्मत यह है कि वे विधानसभा में भी हाथापाई कर रहे हैं और विधायकों को पत्र लिखकर धमकाते हैं। मनसे स्टेट बैंक आफ इंडिया के अफसरों और उसके परीक्षार्थियों को धमकाने का काम करता है। सवाल यह है कि क्या देश का लोकतंत्र इन राजनैतिक दलों के हाथ में लोकतंत्र सुरक्षित है? क्या हमारे शासक इतने कमजोर हैं कि कोई व्यक्ति कानून और संविधान को चुनौती देता हुआ कभी विधानसभा, कभी मीडिया के दफ्तरों और कभी सड़कों पर आतंक मचाता फिरे और हम अपनी वाचिक कुशलता से ही काम चला लें। क्या ये मामले सिर्फ निंदा या कड़ी भत्सर्ना से ही बंद हो सकते हैं। इन्हें भड़काने वाले लोंगों की जगह क्या जेल में नहीं है। अराजक सिर्फ केजरीवाल ही नहीं है सभी इस राजनीतिक हमाम में वस्त्रहीन हैं।

प्रत्येक समय समाज में अनुकूल एवं विरोधी शक्तियां कार्यरत रहती हैं वे कभी मनुष्य के कर्तव्य पालन में सहायक बनती हैं तो कभी विरोध में नजर आती हैं। इसलिए न्याय का एक रूप, संघर्ष भी है। समाज चाहता है कि वहां न्याय के लिए कभी कोई खतरा न हो। यानी न तो व्यक्ति किसी दूसरे के अधिकारों के लिए संकट का कारण बने, न ही कोई उसके अधिकारों के लिए संकट की जमीन तैयार करे। यह आदर्श स्थिति है। राजनीति इस स्थिति को स्वीकार करने से कतराती है। व्यवहार में समाज में संघर्ष की स्थितियां बनी रहती हैं जिसका लाभ राजनेता उठाते हैं। यूं तो राज, समाज किसी के लिए भी यह संभव नहीं होता कि वह चैबीस घंटे व्यक्ति के अधिकार-संरक्षण तथा कर्तव्यपालन में लगा रहे इसलिए व्यक्ति को अपने अधिकारों और अस्तित्व पर संकट के समय, आत्मरक्षा अथवा संपत्ति की सुरक्षा के लिए समयानुसार प्रतिकार करने की छूट दे दी जाती है लेकिन अपने निहित स्वार्थों के लिए इस छूट का लाभ उठाना चतुराई है जो अनुचित है। हम देखते हैं कि हमारे राजनेता अब इन स्थितियों से बहुत ऊपर उठ चुके हैं, अनैतिकता ही अब उनका जीवन मूल्य है। भारतीय लोकतंत्र का जो एक सर्वाधिक खतरनाक अराजक पहलू है वह यह कि अपराध-राजनीति गठबंधन अपने चरम पर पहुँच चुका है। इसका सबूत यही है कि कुख्यात अपराधी अब सीधे राजनीति में शिखर तक पहुंचने लगे है और वे अपने दबंग सहयोगियों को भी राजनीति में प्रतिष्ठित करने लगे है, लेकिन किसी राजनैतिक दल को इसकी चिंता नहीं है। अकसर राजनीतिक दल सार्वजनिक मंच से मुनादी पीटते हैं कि राजनीति का अपराधीकरण लोकतंत्र के लिए घातक है। वे इसके खिलाफ कड़े कानून बनाने और चुनाव में दागियों को टिकट न देने की हामी भी भरते हैं, लेकिन जब उम्मीदवार घोषित करने का मौका आता है तो दागी ही उनकी पहली पसंद बनते हैं। दरअसल वे मान बैठे हैं कि दागियों के चुनाव जीतने की गारंटी है। जो जितना बड़ा दागी उसकी उतनी ही अधिक स्वीकार्यता की थ्योरी ने भारतीय लोकतंत्र को मजाक बनाकर रख दिया है। भारतीय लोकतंत्र के लिए इससे अधिक शर्मनाक क्या हो सकता है कि संसद और विधानसभाओं में पहुंचने वाला हर तीसरा सदस्य दागी है। उस पर भ्रष्टाचार, चोरी, हत्या, लूट और बलात्कार जैसे संगीन आरोप हैं। संसद और विधान सभाओं में वे हुडदंग करते हैं, एक दूसरे पर कुर्सियां फेंकते हैं, मिर्ची पाउडर फेंकते हैं, पेपर फाड़ डालते हैं यहाँ तक कि पोर्न फ़िल्म देखते हैं क्या यह शालीनता है ? सभी राजनैतिक दल कांच के मकानों में डेरा डाले हुए है, लेकिन राजनीति में अपराधीकरण की जब बात होती है, तो वे एक दूसरे पर पत्थर फैंकते रहते है। बहुजन समाज पार्टी की नजर में केवल समाजवादी पार्टी में ही अपराधियों का बोलवाला है तो समाजवादी पार्टी, बसपा पर अपराधियों को प्रश्रय देने का आरोप लगाती रहती है। भाजपा तो वोट के लिए इन दलों से निकाले गये तिरस्कृत नेताओं को शरण देने में शर्म महसूस नहीं करती है।
सिगमंड फ्रायड को सन 1932 में लिखे एक व्यक्तिगत पत्र में अल्बर्ट आइंस्टीन ने यह लिखा था कि नेताओं का कद जब बढ़ जाता है तब उनका व्यवहार भी बदल जाता है "वे महान लोग, जिनकी उपलब्धियाँ कैसे भी किसी क्षेत्र तक केंद्रित कर दी जातीं हैं, वही उपलब्धियाँ उन्हें अपने आसपास के लोगों से ऊँचा उठा देती हैं, समान आदर्श के अपरिहार्य विस्तार का सहभागी भी बनाती हैं। परन्तु, उनका प्रभाव राजनीतिक घटनाओं की विषयवस्तु पर कम है। यह करीब करीब ऐसे प्रतीत होता है, जैसे उसी क्षेत्र को हिंसा और राजनीतिक सत्ताधारियों की गैरज़िम्मेदारियों पर अपरिहार्य रूप से छोड़ दिया गया हो, जिस कार्यक्षेत्र पर राष्ट्रों की तकदीर निर्भर करती है। राजनीतिक नेताओं, सरकारों की वर्तमान स्थिति, कुछ बल और कुछ चर्चित चुनावों के कारण है। वे अपने-अपने राष्ट्रों में नैतिक और बौद्धिक रूप से, जनता के सर्वोत्कृष्ट प्रतिनिधि नहीं ठहराये जा सकते। बुद्धिजीवी संभ्रांतों का इस वक्त देशों के इतिहास पर कोई सीधा प्रभाव नहीं है: उनकी सम्बद्धता (प्रतिबद्धता) में कमी उन्हें समकालीन समस्याओं के निराकरण में, सीधे प्रतिभागिता करने से रोकती है। क्या आप नहीं सोचते  कि जिनके क्रियाकलाप और पूर्ववर्ती उपलब्धियाँ;  उनकी योग्यता और लक्ष्य की पवित्रता की गारन्टी का निर्माण करतीं हैं, उन लोगों के मुक्त संगठन के द्वारा इस दिशा में परिवर्तन किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति के इस गठबंधन के सदस्यों को आवश्यक रूप से शक्ति और विचारों के आदान-प्रदान, पत्रकारों के समक्ष अपना दृष्टिकॊंण प्रेषित करके आपस में संपर्क में रहना होगा।"
हमारे देश में ऐसे राजनीतिज्ञों की संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक रह गयी है, जिनपर अवैध तरीके से धन कमाने के आरोप नहीं हैं। पंचायत स्तर से लेकर केंद्र सरकार और विधायिक के स्तर तक लगभग प्रत्येक राजनीतिज्ञ के पास उसके ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति है। सत्ता और संपत्ति में घालमेल है, यानि दोनों एक दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं। इस देश में सत्ता का धर्म सामंती है। सामंती चरित्र कबीलों का धर्म होता है। प्राचीन काल से आज तक कबीलों ने राज्य का निर्माण किया है। आज पूंजीवाद की प्रधानता है यानि संपत्ति की प्रधानता बढ गयी है। वो सब लोग राजनीति कर सकते हैं, जिन्होंने देश को लूटने में कभी कोई कोताही नहीं बरती, इस देश में अपराधी राजनीति कर सकते हैं, खून में बेईमानी के जीन लिए हुए व्यापारी संसद में बैठ कर क़ानून बना सकते हैं, यहाँ तक कि, राज्य प्रायोजित दंगा कराने वालों को जन बहुमत मिल जाता है  और रिश्वत खाने वालों का चरित्र बेदाग माना जाता है। एक गैर सरकारी संगठन, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव और आगे होने वाले आम चुनाव में मद्देनगर राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया था। सर्वेक्षण 62 हजार 847 उम्मीदवारों के संबंध में किया गया, जिन्होंने साल 2004 में विभिन्न सीटों पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़े थे। एडीआर के विश्लेषण में कहा गया इन 62 हजार 847 उम्मीदवारों में से 11 हजार 63 उम्मीदवारों (18 फीसदी) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की घोषणा की है, जबकि पांच हजार 253 (8 फीसदी) उम्मीदवारों के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप है।
सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि जब मतदाताओं को किसी व्यक्ति का आपराधिक रिकॉर्ड मालूम होगा तो वह उसे किसी हालत में वोट नहीं देगा। परंतु जब व्यवहार में इसे देखा गया तो आपराधिक छवि के अधिक से अधिक लोग जीत कर आ गए और इस तरह के लोग सीना फुलाये संसद और विधान सभाओं में मौजूद होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने जब यह फैसला दिया कि जो लोग गम्भीर अपराधों के आरोप में फंसे हैं या जो किसी अदालत से अपराधी साबित हो चुके हैं अथवा सलाखों के पीछे हैं, वे चुनाव में खड़े नहीं हो सकते।  तो यह फैसला आज के सन्दर्भों में कुछ भी गलत नहीं था क्योंकि आज के राजनीतिज्ञों ने इस कदर कानून को मजाक बना दिया है कि निचली अदालतों से अपराधी घोषित होने के बाद भी वे उच्च अदालतों में अपील दायर करके कहते हैं कि वे दोषी तब तक नहीं हो सकते जब तक सर्वोच्च न्यायालय उन्हें अपराधी न घोषित कर दे। राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले से राजनीतिक दलों की घबराहट बढ़ गई। वे सब एक जुट हो गये। असल में उनकी यह एकजुटता किसी कोण से भी लोकतन्त्र बचाने की नहीं,बल्कि स्वयं को बचाने के लिए थी ताकि वे सदैव राजनितिक प्रभुत्व का आनंद ले सकें। नेताओं ने यह तर्क देते हुए कि संसद सर्वोच्च है, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के प्रति असहमति जतायी। संसद की सर्वोच्चता के प्रति किसी की असहमति नहीं हो सकती लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि संसद में बैठने वाले लोग कैसे हैं? राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के कारण ही आज अनेक केन्द्रीय मंत्री, राज्&