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असमंजस का उदार चेहरा

15 Jan 2007      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

dr_b_r_joshiधर्म निरपेक्ष मूल्यों पर संकट का सैलाब और प्रभावी होता जा रहा है। क्योंकि पिछले कुछ लम्बे समय से भारतीय मुसलमान इन मूल्यों की विश्वसनीयता पर संदेह करने लगे हैं। जाति मुखर है पर उसका अंतरतम मौन। सच्चर कमेटी की रिर्पोट के बाद से तो इन संदेहों की प्रमाणिकता और पुष्ट होगी।
पहले भी कई आयोग यह कह चुके हैं कि अपने मजहबी कठमुल्लेपन की शिकार यह जाति पिछडी हुई है। अतः राजिन्दर सच्चिर कमेटी से यह बात और प्रमाणित होती है तो कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। असल में कठिनाई उदार वादी मुसलमान की है। क्योंकि वे मुसलमान अपनी जाति के बन्द माथे  की खिडकियों से खुली हवा को प्रवेश देने की कोशिशें लगातार कर रहे है। ऐसे पहले पहले  में तो कट्टरपंथी ही उनकी टांग खींचते है। अगर उदारवादी अपना रूख परम्परागत धार्मिक मूल्यों के खिलाफ अपनाते है। तो जातिय विरोध की मानसिकता से संघर्ष की स्थितियाँ पैदा हो जाने का खतरा है। उदारवादी मुसलमान ने अपना आदर्श कमाल पाशा के बजाय फ्रेंच के आक्रामक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों वाली व्यवस्था में अपनी आस्था व्यक्त की इसलिए ही उदारवादी मुसलमान सत्ता प्रतिष्ठानों पर आरम्भ से अपना प्रभाव नहीं जमा सके जैसा कट्टरपंथियों का यह ले या और  आज भी है। विभाजन की त्रासदी स्वीकार कर भारत में बसे ऐसे उदारवादी मुसलमान की सोच भी यह रही  होगी  कि इसी धर्म निष्पेक्षता के जरिये वह अपने धार्मिक मूल्यों को बचाकर रख  सकेगा। शायद इसी सोच ने उन्हें आरम्भ से कांग्रेस को समर्थन देने की प्रेरणा दी। इधर कांग्रेसियों ने भी अपनी भूमिका का निर्वहन बखूबी किया यानी  धर्मनिरपेक्षता एक ऐसा मिलन स्थल था जहाँ कांग्रेस व भारत की अधिसंख्या अल्पसंख्यक जाति मुसलमान एक साथ थी। कालान्तर में यही चीज कांग्रेस के सामने एक बडी समस्या के रूप में भी आई । उग्रहिन्दूवादी ताकतों ने कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों के लिए इसे तुष्टीकरण की नीति करार दिया। खुद कांग्रेस में भी जब आंतरिक संकट आये तो उसने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को आघात पहुँचाया। ११ सितम्बर २००१ की दहशत भरी दास्ता के बाद तो उदारवादी मुसलमान की वेदना में और बढोतरी हुई। इसके बाद तो लगभग समूचे विश्व ने इस्लाम को एक असहिष्णु धर्म के रूप में देखना शुरू कर दिया। जिससे कारण भी उदारवादी मुसलमान को अपने परिवार में परिवर्तन की हवा को प्रवेश देने  में हो रही कठिनाईयों में और कठिनाई होने लगी। क्योंकि उदारवादी मुसलमान की सोच, समझ और व्यवहार भले ही ठीक हो पर अपने धर्म मूल्यों और आम मुसलमान के लिए भी खडा होना उसकी मजबूरी है। अतः उसने बचाव के लिए इस थीसिस को जन्म देकर स्थापित करना आरम्भ कर दिया है कि धर्मनिरपेक्षता ने हमारे जातीय  स्तर को सुधारने में किसी भी प्रकार की मदद नहीं की है। जिस प्रकार पिछडी हिन्दू जातियों ने बीती सदी में अपनी जातिगत पहचान से अपनो रसूख बनाया है उसी प्रकार राजनीतिक क्षेत्र में इस्लाम के वजूद की कवायद को तेज करना होगा। इधर की राजनीति में गठबंधन के दौर की सफलता का रहस्य भी यह जाति आधारित राजनीति है। इससे अखिल भारतीय स्तर के दलो के अस्तित्व का संकट और गहरा होता जा रहा है। मुसलमानों के बौद्धिक आका भी अब इस ’ट्रेम्पकार्ड‘ (जाति आधारित राजनीति) को अपना अस्त्र बनाकर अपना भविष्य सुरक्षित रखने की सलाह निस्तर दे रहे है। कांग्रेस शिक्षा और नौकरियों में मुस्लिम कोटे के लिए मानस बनाने की और अग्रसर है। अगर ये व्यवहारिक रूप में परिषत होता है तो हिन्दू कट्टरपंथी बहुसंख्यक समुदाय को इस भय दिखाकर माहौल को गरमाने में आगीवान रहेंगे। देखतें है वोट बैंक की राजनीति का ऊँट अब कौन सी करवट लेने वाला है।
डॉ ब्रजरतन जोशी




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