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17
Mar
अस्थिर पाकिस्तान में मचा राजनैतिक घमासान
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पाकिस्तान की राजनीति के लिए गत् सप्ताह बडे ही राजनैतिक उथल-पुथल से भरपूर सप्ताह के रूप में गुजरा। पूरी दुनिया की निगाहें पाकिस्तान के राजनैतिक घटनाक्रम पर लगी हुई थीं। चारों ओर इन अटकलों का बाजार गर्म था कि किसी भी समय पाकिस्तानी सेना सत्ता पर कब्जा जमा सकती है। इन्हीं अटकलबाजियों के बीच प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तथा सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कयानी के मध्य अलग-अलग होने वाली गुप्त वार्ताओं का दौर भी जारी था। एक बार तो मीडिया में यह खबर तक आ गई थी कि सेना द्वारा तख्ता पलट किए जाने के भयवश राष्ट्रपति जरदारी अदृश्य हो गए हैं। उस समय तो ऐसा लगा कि गोया अगले ही क्षण पाकिस्तान में लोकतंत्र का गला एक बार फिर घुटने जा रहा है तथा सेना पुनः सत्ता पर काबिज होने जा रही है। परन्तु राष्ट्रपति भवन से इन्हीं अफवाहों के मध्य यह विज्ञप्ति जारी की गई कि जरदारी राष्ट्रपति भवन में ही हैं तथा वे पूर्णतयः सुरक्षित हैं।

पाकिस्तान में गत् सप्ताह चली इस राजनैतिक उथल-पुथल का कारण दरअसल जो दिखाई दे रहा था वह यही था कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के प्रमुख तथा पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य पूर्व न्यायाधीश जस्टिस इफ्तिखार चौधरी सहित समस्त बर्खास्त जजों की बहाली की मांग करते हुए इस्लामाबाद की ओर एक विशाल मार्च का आयोजन कर रहे थे। पाकिस्तान में आतंकवाद तथा अराजकता का जो वर्तमान दौर चल रहा है उसके अन्तर्गत इस मार्च को पूर्णतयः असुरक्षित तथा खतरों से भरा हुआ कदम माना जा रहा था। बहरहाल इस राजनैतिक गहमागहमी का पटाक्षेप उस समय हो गया जबकि 16 मार्च को प्रातः काल प्रधानमंत्री गिलानी द्वारा यह घोषणा की गई कि 21 मार्च को वर्तमान पाक मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हमीद डोंगर की सेवानिवृत्ति के बाद बर्खास्त मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी सहित समस्त बर्खास्त न्यायाधीशों को बहाल कर दिया जाएगा तथा चौधरी ही अगले मुख्य न्यायाधीश का पदभार ग्रहण करेंगे। निश्चित रूप से इसे नवाज शरीफ की एक बडी जीत तथा राष्ट्रपति जरदारी को शरीफ द्वारा दिए गए एक बडे राजनैतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम पर नजर डालने से पहले हमें नवाज शरीफ तथा आसिफ अली जरदारी दोनों के राजनैतिक व्यक्तित्व पर नजर डालना जरूरी होगा। नवाज शरीफ हालांकि पाकिस्तान के बडे उद्योगपतियों में जरूर गिने जाते हैं। परन्तु वास्तव में वे जमीनी तौर पर राजनीति से भी हमेशा ही जुडे रहे। उनकी इसी राजनैतिक सक्रियता ने उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री तक बना डाला। वे पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के प्रमुख भी हैं। ठीक इसके विपरीत जुलाई 1955 में जन्मे आसिफ अली जरदारी हालांकि पाकिस्तान के उद्योगपतियों में अपना पांचवां स्थान रखते हैं तथा पकिस्तान के अमीरों में भी उनकी गिनती पांचवे नम्बर पर होती है परन्तु इनकी प्रसिद्घि तथा राजनीति में इनके परिचय का सिलसिला उस समय शुरु हुआ जबकि 18 दिसम्बर 1987 को इनका विवाह बेगम बेनजीर भुट्टो के साथ रचा गया। अपने विवाह के बाद जरदारी ने अपने जीवन की राजनैतिक पारी खेलनी शुरु की। सर्वप्रथम जरदारी 1990 से लेकर 1996 के दौरान दो बार पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेम्बली के सदस्य चुने गए। इसी दौरान 1993 से 1996 के मध्य जरदारी को दो बार पाकिस्तान के मंत्री रहने का भी अवसर मिला। 1997 से 1999 के मध्य यह सीनेटर भी रहे। जबकि इनकी पत्नी स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो दो बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत रहीं।

आतंकवादियों द्वारा 27 दिसम्बर 2007 को एक चुनावी सभा के बाद जब बेगम भुट्टो की हत्या कर दी गई, उस समय बेनजीर व जरदारी के पुत्र बिलावल चूंकि पूरी तरह परिपक्व नहीं थे, अतः जरदारी को ही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के लोगों ने सहानुभूतिवश पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। यहां यह बात भी गौरतलब है कि बेगम भुट्टो की हत्या के पश्चात पाकिस्तान में उपजी सहानुभूति के चलते जरदारी को पार्टी का मुखिया बना तो जरूर दिया गया परन्तु पाक अवाम इस बात को पचा नहीं पा रही थी कि यह वही   जरदारी साहब हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में कई वर्षों तक जेल में भी रहना पडा था। और यह भी कि यह वही जरदारी हैं जिन्हें पाकिस्तान में रिश्वतखोरी के चलते ‘मिस्टर टेन परसेन्ट’ के नाम से जाना जाता था। बहरहाल चूंकि जनरल परवेज मुशर्रफ के दौर के सताए हुए पाकिस्तान के दोनों ही बडे नेता जो पाकिस्तान से बाहर बैठकर मुशर्रफ की कथित तानाशाही के विरुद्घ लामबद्घ हो रहे थे, इन दोनों नेताओं ने पाकिस्तान में लोकतंत्र की रक्षा तथा बहाली के मद्दनेजर सन् 2006 में चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी नामक एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। शरीफ व बेगम भट्टो के मध्य हुए इस समझौते में मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर कार्य किया जाना था। पहला यह कि पाकिस्तान में किसी भी कीमत पर लोकतंत्र बहाल किया जाए। दूसरा यह कि परस्पर टकराव से बचने के प्रयास किए जाएंगे। और तीसरा यह कि देश की राजनीति में सेना की भूमिका को समाप्त कर दिया जाएगा।

यहां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी तथा पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के विषय में एक बात का उल्लेख करना और जरूरी है कि पाकिस्तान में यह दोनों पार्टियां उसी प्रकार से समझी जा सकती हैं जैसे भारत में कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी। जिस प्रकार भारत में इन दोनों पार्टियों का एक साथ आना असम्भव सा प्रतीत होता है, ठीक वैसे ही पाकिस्तान में भी यह दोनों पार्टियां दो विपरीत ध्रुवों के रूप में देखी जाती हैं। यह तो मुशर्रफ की वर्दी का चमत्कार था जिसने इन दोनों विपरीत विचारधारा के नेताओं को भी एक प्लेटफार्म पर खडा कर दिया और वह एक प्लेटफार्म था मुशर्रफ अर्थात् सेना के चंगुल से पाकिस्तान को मुक्त कराना तथा लोकतंत्र बहाल कराना। परन्तु चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही बेगम भुट्टो की हत्या के बाद तो राजनैतिक समीकरण बिगडते साफ नजर आने लगे थे। बेगम की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर की नजाकत को देखते हुए तो नवाज शरीफ ने भी उन्हें उस समय अपनी बहन के ही समान बताया था। दरअसल शरीफ का भुट्टो के प्रति ऐसा हमदर्दाना बयान परिस्थितियोंवश दिया गया बयान था न कि अन्तरात्मा से दिया गया सच्चाई भरा बयान। उसी मौके की नजाकत को भांपते हुए शरीफ ने थोडी बहुत नानुकर करने के बाद हालात से समझौता करते हुए जरदारी को पाकिस्तान का 11वां राष्ट्रपति भी स्वीकार कर लिया था। परन्तु भारत हो या पाकिस्तान, यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिज्ञ हमेशा ही मौके की तलाश में ही रहते हैं।

जरदारी परिस्थितिवश राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुंच तो जरूर गए थे परन्तु उनके राष्ट्रपति बनने से लेकर अब तक यही देखा जा रहा था कि पाकिस्तान में आतंकवाद दिन-प्रतिदिन बढता ही जा रहा था। तालिबानी ताकतें पहले से अधिक संगठित तथा मजबूत हो रही थीं। आत्मघाती हमलों में बढोतरी दर्ज की जा रही थी। तालिबानों की ताकत इतनी बढ गई थी कि उन्होंने नाटो सैनिकों के एक बडे डिपो को आग के हवाले कर दिया था। पाकिस्तान में फैली अराजकता के इस वातावरण में पाक सरकार को सबसे बडी शर्मिन्दगी उस समय उठानी पडी थी जबकि गत् 3 मार्च को पाकिस्तान खेलने पहुंची श्रीलंका की क्रिकेट टीम को 12 आतंकवादियों ने दिन-दहाडे घेरकर उनकी बस पर गोलियां बरसा दीं। इस घटना ने पाक राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से शर्मिन्दगी महसूस किए जाने पर मजबूर कर दिया था। दूसरी ओर इन्हीं हालात के चलते अमेरिका पाक सरकार पर बार-बार यह दबाव बना रहा था कि वह इन बिगडते हालात से उबरने के यथाशीघ्र उपाय करे।

जाहिर है नवाज शरीफ जैसा चतुर, परिपक्व तथा अवसरपारखी राजनीतिज्ञ ऐसे सुनहरे अवसर को क्योंकर हाथ से जाने देता। नवाज शरीफ ने तुरन्त गर्म लोहे पर चोट की। इस्लामाबाद की ओर मार्च करना तथा मुशर्रफ के समय बर्खास्त किए गए जजों की बहाली तो महज एक मुद्दा मात्र था। हकीकत में तो शरीफ जरदारी को एक बडा झटका देना चाहते थे। शरीफ यह दिखाना चाहते थे कि बेनजीर भुट्टो के बाद देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अब उनका मुकाबला करने वाला कोई नहीं है। अब ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि 21 मार्च को बर्खास्त जजों की बहाली के बाद जहां पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था पर शरीफ का दबदबा बढेगा वहीं जरदारी भी शरीफ के सामने राजनैतिक रूप से बौने हो जाएंगे। इस बीच अटकलें यह भी लगाई जा रही हैं कि यथाशीघ्र प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी, नवाज शरीफ के साथ मिलकर कोई ऐसा राजनैतिक खेल भी खेल सकते हैं जिसके चलते जरदारी की राष्ट्रपति पद से छुट्टी की जा सके। बहरहाल इन राजनैतिक गहमागहमियों के मध्य दुनिया के लिए पाकिस्तान को लेकर एक सुखद समाचार यही रहा कि पाकिस्तान सैन्य शासकों की गिरफ्त में आने से एक बार फिर बच गया।


तनवीर जाफरी




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