हिन्दुस्तान अध्यात्म संस्कृति को जीवन व्यवहार में ढालकर चलने वाला देश है। यहाँ का नागरिक अपनी आध्यात्मिक उन्नति के प्रति भी उतना ही सजग, सतर्क और संवेदनशील है जितना जीवन जगत् से जुडे दूसरे अनेक पक्षों के प्रति। यह हमेशा होता आया है कि संस्कृति में विकृति लाने का काम सत्ताएँ ही करती रही है। अब वह सत्ता चाहे धर्म की हो या अर्थ की अथवा राजनीति की इससे विकृति को व्यवहार में लाने की प्रकृति और प्रक्रिया पर कोई अधिक फर्क नहीं पडता । मध्यकाल से लेकर अब तक का इतिहास इस तथ्य की बानगी है कि धार्मिक सत्ताओं ने सदैव ही संस्कृति में विकृति पैदा करने की सर्वाधिक कोशिशें की हैं। यह एक अजीबोगरीब तथ्य है कि एक तरफ तो संस्कृति का मूल धर्म है। उसका नियामक धर्म है पर दूसरी ओर वही धर्म संस्कृति को उसके मूल सत्व से वंचित कर रहा हैं। हाल ही में योग गुरू के रूप में उदीयमान हो रहे बाबा रामदेवजी महाराज का बडबोलापन इसकी साक्षी है। भारत बाबाओं का देश भी है। आजकल भारत के सर्वोच्च न्यायालयों में चारपीठ हेतु ७२ शंकराचार्य अपना - अपना दावा जता रहे हैं और पांचवी पीठ के रूप में कांची कामकोटि का प्रकरण तो देश के सामने है ही । एक अनुमान के अनुसार इस समय हिन्दुस्तान में ५६ लाख रजिर्स्टड संत महात्मा आदि हैं। जो सुबह से शाम तक अपने बडबोलेपन की अनेक मुद्राओं का प्रदर्शन यत्र-तत्र-सर्वत्र करते रहते हैं। अब’बाबा वाक्यम प्रणाम‘ का समय बीत चुका है। न तो बाबा बाबा ही रहे हैं और नहीं बचे हैं उनके आप्त वाक्य । पता नहीं यह सच बाबा रामदेवजी महाराज के गले से क्यों नहीं उतर रहा हैं। मुझे सच्चिदानंद सिन्हा की एक पंक्ति याद आ रही है कि इंसान जिन चीजों को सबसे कम समझता है उन्हीं पर सबसे तेज् प्रतिक्रियाएं करता है। बाबाजी अपने ज्ञानदंभ में संभवतः इस सच से अलग होकर स्वयं को देखते हैं। आए दिन सुर्खिया में रहने के सुख का लोभ संवरण कर पाने में तो वे अक्षम हैं ही साथ ही हमारे समय के विराट व्यक्तित्वों के साथ छेडछाड कर माफी मांगलेना आजकल इनकी आदत में सूमार होता जा रहा है। पिछले दिनों उन्होंने आधुनिक विज्ञान वैज्ञानिकों एवं नेहरू को लेकर उन्होंने बयानबाजी की। चूंकि क्षेत्र विशेष के बारे उनकी जानकारी का स्तर कम होता है सो बाद मे क्षमा याचना के अलावा कोई अन्य विकल्प ढूंढने पर से भी नहीं मिलता अब कुछ दिन पूर्व ही उन्होंनं खबरों में बने रहने की एवज में गाँधी के व्यक्तित्व को लेकर की बयानबाजी की । हलांकि ऐसा करते समय इस तरह के बाबा भूल जाते हैं कि वे गांधी के पग को रज कण के तुल्य भी नहीं है उन्होंने गांधीजी को महान मानने से इन्कार किया । लेकिन अगले दो ही दिनों में अपने बयान को किसी शातिर राजनीतिज्ञ की भांति बदली मुद्रा में मीडिया की थाली में परोस दिया। आजकल वैसे भी बडबोला का युग है। यहां काम की जगह नाम ज्यादा पाने की होड अधिक मची है। बाबा रामदेवजी हो या कोई अन्य आध्यात्म गुरू सभी अपने अपने मीडिया मैनेजमेंट पर लाखों रूपये खर्च कर सुर्खिया में रहने के सुख को भोगते रहते हैं। रामदेवजी के चरित्र आचरण व व्यवहार में पहले कहना फिर मुकरना आम बात हो गई हैं। कारण साफ है कि किसी क्षेत्र विशेष में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति का दंभ अंतत् उसी क्षेत्र विशेष में व्यक्ति चरित्र के पतन का कारण बनता है। बाबाजी ने अब तक के अपने जीवन में योग से संबंधित कोई मौलिक विचार प्रस्तुत नहीं किया है और न ही पूरी तरह उसे जिया है तिसपर गांधी जैसे सत्य को जीने वाले विराट् चरित्र के प्रति बाबा का बडबोलापन अपने आप मे खोखला ही साबित होता है। गांधीजी ने अहिंसा को जन जन के हृदय पटल पर इस प्रकार प्रभावी किया कि सारा भारत एक स्वर, एक आवाज, एक मुद्रा में स्वतंत्रता की चाहना को साकार करने की मुद्रा में उद्दत हो गया लेकिन दुर्भाग्य से लाख मीडिया मैनेजमेंट के बाद भी बाबा योग को उस तरह से जन जन के मानस पर स्वतंत्रता की चाहना जैसा प्रभावी नहीं बना पा रहे है। अतः ऐसे बाबाओं को चाहिए कि वे जीवन द्वन्द्व से, अन्तविरोधों से, पहले स्वयं को उबारे फिर दूसरे क्षेत्रों की विराट् हस्तियों के समतुल्य अपने होने की साथ्र्ाकता को साबित करे।