आजकल बंद का बाजार तेज है। समस्या राष्टीय हो या व्यक्तिगत सत्ता के संबंधों कासमीकरण ठीक करने के लिए तकनीक एक ही उपयुक्त है बन्द। असल में बन्द पीछे जो सोच कामकरता है वह सार्वजनिक सहानुभूति का है। किसी घटना, हादसे या सैद्धान्तिक प्रतिरोधकी यह पद्धति गांधी के सविनय अवज्ञा, असहयोग और् सत्याग्रह के मिले-जुले विचार कीव्यावहारिक मिसाल है। क्योंकि जिस घटना, हादसे या प्रकरण पर व्यक्ति अपनेआत्मविश्वास को मजबूत नहीं पाता और साथ ही अहिंसक विरोध के माध्यम से अपनी बात भीरखना चाहता है। उसका सबसे अच्छा तरीका है बन्द। बन्द का इतिहास इसतथ्य की गवाही देता है कि अधिकांशबन्द जो हुए हैं, के मूल में राष्टीय हित और सामाजिक सदभाव कीभावना कम और् निहित व्यक्तिगत स्वार्थो की भावना सर्वोपरि रही है। इसके चलते हीबन्द जैसे अहिंसक प्रक्षेपास्त्र का उपयोग इतने घटिया स्तर हुआ कि अब इसकी मारकक्षमता,कमजोर होती जा रही है। परिणाम-स्वरुप 'आंशिक बन्द' 'आधा बन्द' जैसे बन्दों कीसंख्या की सूची दिन-ब-दिन बढती जा रही है। इस कनफोड और चिल्लाहट भरे समय मे बिनाशस्त्र अपनी बात को पूरे वजन के साथ सामाजिक स्वीकृति की मोहर सहित रखना बन्द कीउपादेयता को बढाता रहा वहीं अब इसकी सबसे कमजोर नाडी साबित हो रहा है। ऐसे में अबइसकी जरुरत महसूस की जाने लगी है कि 'बन्द' के स्व्ररुप व किया पक्ष पर विचार कियाजाना चाहिए। क्योंकि यह अर्थ युग है। सारा तंत्र अर्थ की गति पर ही निर्भर है। अत:बन्द से भारी नुकसान एवं राष्ट्रीय क्षति होती है। जिसकी पूर्ति असंभव है। वैसेभी यह एक सभ्य समाज के लिये आवश्यक है कि वह अपने चमकते कंगूरे को बचाने के लियेनींव की ईंट पर विशेष ध्यान दे। राज और समाज दोनों ही मिलकर यह तय करें कि 'बन्द' का व्यावहारिक स्वरुप बदली परिस्थितियों कैसी हों? क्या सभी संस्थाओं को इस हेतुस्वीकृति दी जानी चाहिए? क्या ऐसा संभव नही हो सकता कि हम केवल कुछ एक संस्थाओ कोइसके लिए पंजीकृत कर सकते जो सामाजिक जिम्मेदरी और् दायित्व बोध के भाव से जुडी हो? अब समय यह संकेत कर रहा है कि हमे अपनी जीवन चर्या और् सोच में बदलाव लाकर नए ढंगसे नये जीवन की ओर अग्रसर होना था। अत: बन्द किन परिस्थितियों में हो? कौन इसकेलिए अधिकृत हो? इसका व्यावहारिक् स्वरुप क्या हो? जैसे अनेक प्रशनो के उत्तर हमेखोजकर मंजिल की अपने कदम बढाने हैं।