सन् १७५७ भारत के इतिहा में बडा महत्वपूर्ण वर्ष माना जाता है जब मई के महीन में क्लाइव ने अपनी तटस्थता की संधि को तोडकर अचानक चन्द्रनगर पर कब्जा कर लिया; किन्तु वाल्टर रेनहर्ट ने, जो जर्मन था और फेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सैनिक की हैसियत से भारत आया था, आत्मसमर्पण करने से इन्कार कर दिया। वह अपने साथियों सहित मुर्शिदाबाद चला गया जहँा उसे बंगाल के नवाब से संरक्षण मिला।
उसके बाद रेनहर्ट ने ग्रेगरी खान के मातहत नौकरी की जो मीर कासिम की सेना में एक आरमीनियम जनरल था। वहंा उसने अपनी विशिष्ट योग्यता दिखलाई तथा उसे सम्मानित किया गया। अब वह समरू के नाम से पुकारा जाने लगा जो ली सॉम्ब्रे उसके यूरोपियन साथियों द्वारा दिए गए नाम का बिगडा हुआ रूप था।
समरू का कार्य
समरू के अधीन एक पूरी बिग्रेड थी तथा उसका काम नवाब की सेना को यूरोपीय सेना के समान प्रशिक्षित तथा अनुशासित करना था। जब कभी नवाब और अंग्रेजों के बीच लडाई होती, सेना की बागडोर समरू को सौंपी जाती। २ अगस्त, १७६३ को उसने गेरिया की लडाई लडी जो अंग्रेजों और नवाबों के बीच हुई लडाइयों में सबसे अधिक भयानक और कठोर थी। यह लडाई केवल चार घंटे हुई, किन्तु इसमें अंग्रेजों को करारी मात खानी पडी तथा उन्हें बडा नुकसान उठाना पडा। उनका सामान लूट लिया गया तथा ८४वीं बटैलियन पूरी तरह से नष्ट कर दी गई।
नवाब अंग्रेज कैदियों को अपने साथ पटना ले गया, जहंा उनकी हत्या कर दी गई। कहा जाता है कि यह भयानक कार्य समरू के द्वारा किया गया। ऐसे ही कई कठोर और खतरनाक कार्यो के बाद महत्वाकांक्षी समरू ने सम्राट शाह आलम के एक विश्वासपात्र फारसी मंत्री नायब खान के पास नौकरी कर ली। उनकी बुद्धिमता और बहादुरी के लिए बादशाह ने उसे एक जागीर इनाम में दे दी। समरू ने जागीर के बीचोंबीच, जिससे उसे छः लाख रूपये वार्षिक आमदनी होती थी, सारधाना नाम गांव में अपना निवास-स्थल बनाया। यह स्थान भारत में ईसाई कालोनी के अन्तर्गत अपनी प्रेम-गाथाओं के लिए प्रसिद्ध था।
सन् १७६७ में जब समरू दिल्ली पर कब्जा करने के अपने कार्य में व्यस्त था, तब उसकी पहचान वहां की बेगम से हुई बाद में मुसलमानी रीति-रिवाजों के अनुसार, इनका विवाह समरू के साथ हो गया। गौर वर्ण, बडी-बडी काली आंखों तथा नाजुक नाक-नक्शे से युक्त यह बेगम बडी खूबसूरत लगती थीं। वह फारसी और हिन्दुस्तानी बहुत अच्छी तरह बोल लेतीं तथा बातचीत में बडी आतुर थी। वह अपने पति के साथ मृत्युपर्यन्त रहीं। उनके बीच कोई सन्तान नहीं हुई।
४मई, सन् १७७८ को समरू की मृत्यु के बाद अंगेज अफसरों ने बादशाह से प्रार्थना की कि समरू की विधवा बेगम को उनके पति के स्थान पर बटैलियन के चार्ज में रहने दिया जाए। बेगम की योग्यता और चतुराई को देखते हुए बादशाह ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
बेगम अब जोअन्ना जैबुन्निसा
पति की मृत्यु के तीन वर्ष बाद, बेगम ने रोमन कैथोलिक धर्म स्वीकार कर लिया और आगरा में ७ मई, १७८१ को उनका जोअन्ना के नाम से नामकरण संस्कार हुआ। सन् १९८३ में गुलाम कादिर ने दिल्ली पर धावा किया और बादशाह को कैद किया। यह खबर जब बेगम को मिली तब वे पानीपत में सिक्खों को दबाने में व्यस्त थीं, किन्तु सामाचार पाते ही वे तुरन्त दिल्ली रवाना हुई और राजमहल के लाहौर गेट के पास उन्होंने अपना पडाव डाल दिया। फिर उन्होंने किले के सामने तोपें लगा दीं और अन्त में और गुलाम कादिर की तोपों का बहादुरी से मुकाबला किया। अन्त में गुलाम कादिर को वापस जाना पडा और बादशाह को कैद से मुक्ति मिली।
इसके बाद बादशाह ने बेगम को ’जैबुन्निसा‘ नाम दिया, जिसका अर्थ -महिला जाती का आभूषण‘। कुछ लोगो का कहना है ’कि व्यक्तिगत रूप से बेगम का कई लोगों से अनैतिक सम्बन्ध रहता इन्हीं में जार्ज थामस नामक व्यक्ति भी था। जिसने बेगम की कृपा से उन्हींकी सेना में सेनापति पद तक प्राप्त किया।
५ अप्रेल, १७८८ को निज्जुफ कोलीखान ने दिल्ली के खिलाफ बगावत कर दी। वह रिवाडी के निकट गोकुलगढ में, जो दिल्ली से ४६ मील दूर दक्षिण-पश्चिम की ओर है, जागीदार था। उसकी शिकायत थी कि बादशाह ने उसकी जागीर को एक हिस्से का स्वामित्व छीन लिया है। उसने राजमहल को इस प्रकार घेर कि बादशाह और उनके परिवार की जानों को खतरा हो गया।
बेगम और जार्ज थामस ने शीघ्रता से पहुंचकर फिर बादशाह शाह आलम के प्राणों की रक्षा कि।
इस समय सभीने एक आवाज से
यदि समय पर पहुंचकर अपने बुद्धि-कौशल से काम न लेतीं तो बादशाह का बचना मुश्किल था।
शाह आलम ने भरे दरबार में सार्वजनिक रूप से बेगम का शुक्रिया अदा किया तथा उनका सम्मान किया। इसी समय उन्होंने दिल्ली के दक्षिण में स्थित बादशाहपुर का परगना बेगम को देकर उनकी इज्जत बढाई।
महत्वपूर्णं घटना
बेगम के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना १८६३ में घटी जब उन्होंने अपने आधीन एक फ्रांसीसी अफसर ’ली वायसु‘ से दूसरा विवाह कर लिया। यह इसलिए आवश्यक था क्यांकि इस बीच उनकी सेना ने कई बार अनुशासनहीनता का परिचय दिया था, तथा उसे नियंत्रण में रखने के लिए उन्हें किसी पुरूष की सहायता की जरूरत थी। किन्तु इस विवाह को लोगों ने पंसद नहीं किया। उनके आफीसर व अन्य लोग इसके बदले जार्ज थामस, भूतपूर्व सेनापति, के पक्ष में अधिक थे जो अवकाश प्राप्त कर दिल्ली चला गया था।
लोग ली वायसु के इतने खिलाफ हो गए कि उन्होंने उनकी सेना के लोगों को विद्रोह करने के लिए भडका दिया और बेगम वायसु के साथ एक रात चुपचाप भाग निकलीं। यह १७६५ की हैं। वे सारधाना से कुछ ही दूर पहुंचे होंगे कि सेना की एक टुकडी ने, जो उनका पीछा कर रही थी, उन्हें पकड लिया। बेगम पालकी में थीं और ली वायसु घोडे पर। पीछा करने वालों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। इस संघर्ष में गोलियां चली और कई लोग घायल हो गए तथा बेगम और ली वायसु भी एक दूसरे से बिछुड गए।
में छुरी भोंक ली
उनका पति मारा गया, बेगम ने दूख से भरकर अपने ही उनकी बांदिया यह दृश्य देख घबरा उठीं और फूट फूट कर रोने लगी। ली वायसु ने जो कुछ दूरी पर विद्रोहियों की भीड हुआ था; बांदियों के रोने का कारण पूछा। उसे बताया गया कि बेगम ने अपनी हत्या स्वंय कर ली है। पहले तो ली वायसु को विश्वास नहीं हुआ, किन्तु जब उसके बार-बार पूछताछ करने पर उसे यहीं उतर मिला और खून से भीगा बेगम का नकाब उसे दिखाया गया, तब ली वायसु ने अपना रिवाल्वर निकाला और स्वंय को उसका निशाना बना बपनी हत्या कर ली और इस प्रकार अपना यह वायदा कि बेगम और वह दोनों एक साथ मरेंगे, पूरा किया।
किनतु वास्तव में ली वायसु ने व्यर्थ ही अपनी जान दी; कारण बेगम केवल घायल हुई थीं-मरी नहीं थीं। वे कैद कर ली गई थी तथाउन्हें कई तरह की प्रतारणाएं व अपमानजनक व्यवहार दिया जा रहा था। अंत में जार्ज थामस ने उन्हें इस कष्ट से उबारा और उनकी रक्षा की। विद्रोही बेगम को वापस सारधाना ले गए तथा उन्हें कई दिनों तक बांधकर रखा गया।
कुछ कथाकारों ने, जिन्हें सम्भवतः गलत सूचनाएं मिलीं, लिखा है कि ली वायसु को मजबूरी में अपनी आत्महत्या करनी पडी; कारण, अपने तीन वर्ष के वैवाहिक जीवन में यह नार्मद साबित हुआ; किन्तु सचाई तो यह है कि बेगम स्वयं बांझ सिद्ध हुई। यह इस बात से साबित होता है कि समरू के साथ ग्यारह वर्ष का विवाहित जीवन व्यतीत करने पर भी उनकी एक भी संतान नहीं हुई, जबकि समरू की पहली बीवी से, जिसका बाद को दिमाग खराब हो गया था, तथा १८३६ में अपनी मृत्युपर्यन्त जो सारधाना में रही एक पुत्र जहीर-यब-खान पैदा हुआ था।
बेगम का अंत
लम्बा और उतार-चढाव से भरा बेगम का जीवन अपने अंत पर आ पहुंचा रहने के बाद अंत में उनका होश जाता रह फिर उन्हें होश नहीं आया। २७ जनवरी, १८३६ वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई।
सारधाना में बेगम समरू के द्वारा निर्मित गिरजाघर की शानदार इमारतें अब भी वहंा से गुजरने वाले यात्रियों का मन मोहती हैं तथा साहसी बेगम जोअन्ना जैबुन्निसा की बरबस याद दिलाती हैं। जो भी व्यक्ति गिरजाघर के अन्दर जाता है उसे संगमरमर की बनी कब्र दिखाई दिेती है जिस पर इटली के शिल्पकार एडमोटेडोलिनी ने सुन्दर काम किया हैं। वहां ऊंचे शाही सिंहासन पर भारतीय वेशभूषा से सुसज्जित बेगम समरू की मूर्ति है, जिसने १८३६ में अपनी मृत्यु के पहले ४८ वर्ष तक सारधाना की अपनी छोटी सी रियासत में एकच्छत्र शासन किया और अपना नाम इतिहास में अमिट कर दिया।
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