राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात का सीमावर्ती, वनवासी बहुल वागड क्षेत्रा प्राचीनकाल से देवी उपासना और तंत्रा-मंत्रा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। इस अंचल में देवी उपासना की प्राचीन परम्परा में कई लोक रस्में, टोने-टोटके और उपासना पद्धतियां रही हैं जिनका दिग्दर्शन वर्ष में विभिन्न अवसरों पर होता है। इनमें देवी उपासना की कई परम्पराएं आज भी जीवन्त हैं।
आदिवासी संस्कृति में देवी उपासना की पुरातन श्रृंखला में वाड अंचल के डूंगरपुर जिले में बिछीवाडा पंचायत समिति की बोखला ग्राम पंचायत में एक अनूठी देवी है जो दूर-दूर के आदिवासियों की श्रद्धा का केन्द्र है। पहाडयों के बीच बरसाती नाले के पास एक पहाड की माँद में देवी शीतला की मूर्ति है जिसके प्रति लोक आस्था का ज्वार उमडता रहा है।
यहां मनौती पूरी हो जाने पर बकरों व पाडों की बलि दी जाती है और ध्वज चढाये जाते हैं। यहां खासकर निस्सन्तान लोगों की यहाँ विशेष श्रद्धा है। निस्संतान दम्पत्ति संतान की कामना पूरी हो जाने पर लकडी या पाषाण का अश्व समर्पित करते हैं। इसके अलावा देवी कृपा से संतान पाने वाले चट्टानों के बीच बसी देवी को बच्चे का पालना (बाँस का बना झूला) भेंट चढाते हैं।
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि देवी मैया कई प्रकार के रोगों को दूर करती है। पशुओं के रोग निवारण व फसलों की रक्षा के लिए नारियल की पार बाँधने, दीप प्रज्वलन आदि की परम्परा चली आ रही हैं।
चमडी का रोग होने पर लोग यहां हूरण (एक प्रकार का शाक, जो सब्जी-फलाहार में प्रयुक्त होता है) चढाते हैं। किसी व्यक्ति को शरीर में जलन की शिकायत होने पर देवी माँ को मिर्च चढाते हैं। शरीर में ठण्डेपन की बीमारी होने पर हाकर खाण्ड (मिश्री) चढाने की बाधा ली जाती है। मान्यता है कि इससे इन रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
विभिन्न बीमारियों से त्रास्त लोग यहां आकर देवी की बाधा लेते हैं। गांवों से श्रद्धालु पूरे परिवार के साथ ढोल-ढमकों की धुन पर थिरकते यहां आते हैं और देवी के चरणों में नमन कर श्रद्धा अभिव्यक्त करते हैं।
मन्दिर के पुजारी जीवा/हरजी वंश परंपरा से यहां सेवा-पूजा कर रहे हैं। इसे बुराई कहें या अन्ध श्रद्धा, मगर आस-पास के लोग बताते हैं हर साल दशहरे पर यहां भैंसे की बलि दी जाती है।
देवी का पीहर गामडी देवल गाँव माना जाता है इस दृष्टि से पीहरिया वहां से आता है। नई फसल होने पर किसान यहाँ देवी मैया के चरणों में चढाने के बाद ही इसका उपयोग करना शुरू करते हैं। इस वन में देवी की मूर्ति के पृष्ठ भाग में अवस्थित सुरंग में अजगर, चीता, सांप आदि वन्य जीव भी बताए जाते हैं।
पहाडों के बीच देवी मैया के स्थानक पर नैसर्गिक रूप से पानी के दो कुण्ड बने हुए हैं, जहाँ वर्ष भर पानी रहता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु एक जल कुण्ड में ही हाथ-पाँव धो सकते हैं। दूसरे कुण्ड में हाथ-पाँव धोना वर्जित है।
लोगों का अनुभव है कि ऐसा करने पर काफी संख्या में साँप निकल आते हैं। माना जाता है कि अशुद्ध अवस्था में किसी के यहां आ जाने पर पास के पेडों और चट्टानों से भँवरे निकल कर आक्रमण कर देते हैं। यहां पहाडी गुफा के द्वार पर विराजमान देवी की मूर्ति के साथ ही पास ही ज्योत माई हैं। जाने कितनी सदियों से पहाडी देवी लोक श्रद्धा का केन्द्र रही है।