पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अध्यक्षा तथा पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो हमारे बीच नहीं रहीं। इस्लाम के नाम पर पूरी दुनिया में दहशत फैलाने के ठेकेदारों ने अपनी चेतावनी पर अमल करते हुए गत् 27 दिसम्बर को पाकिस्तान के महानगर रावलपिण्डी में एक आत्मघाती हमले को अन्जाम देकर पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्षरत बेगम भुट्टो को शहीद कर दिया। बेनजीर भुट्टो को उनकी पाकिस्तान वापसी के पूर्व ही कट्टरपंथी ताकतों द्वारा चेतावनी दे दी गई थी कि उनकी पाकिस्तान वापसी पर उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। बेगम भुट्टो की हत्या के बाद इस्लामी आतंकवाद के प्रमुख समझे जाने वाले अलकायदा, एमन अल जवाहिरी तथा पकिस्तान में सक्रिय कट्टरपंथी आतंकवादी संगठन लश्करे झांगवी के नाम बेनजीर की हत्या के लिए जिम्मेदारों के रूप में उभर कर सामने आ रहे हैं। हालांकि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के विरोधी बेनजीर की हत्या पर राजनीति करने का कोई भी अवसर गंवाना नहीं चाह रहे हैं। बेनजीर की सुरक्षा में कमी व सुरक्षा में लापरवाही के लिए एक वर्ग मुशर्रफ को जिम्मेदार ठहरा रहा है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो राष्ट्रपति मुशर्रफ को सीधे तौर पर ही इस हादसे का दोषी मान रहे हैं। ऐसा आरोप लगाने वालों का कहना है कि बेनजीर की हत्या एक बडा षड्यन्त्र भी हो सकती है। इसी संदेह के मद्देनजर पाकिस्तान की राष्ट्रीय एजेंसियों को दरकिनार करते हुए अब इस हत्या की जांच अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों से कराए जाने की मांग जोर पकडने लगी है। दुर्भाग्यवश पाकिस्तान की राजनीति में किसी भी संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। अतः बेनजीर की हत्या किसी बडे आंतरिक षड्यन्त्र का हिस्सा है, इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर पाना भी संभव नहीं है। हां, इस आरोप के साथ एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर राष्ट्रपति मुशर्रफ को इस षड्यन्त्र से क्या लाभ हो सकते हैं? बेनजीर भुट्टो आखिर किस प्रकार से राष्ट्रपति मुशर्रफ की राह का रोडा साबित हो रहीं थीं कि उनके विरुद्घ ऐसे षड्यन्त्र को अंजाम देने की जरूरत पाकिस्तानी फौज या मुशर्रफ सरकार महसूस करती?
ठीक है, आज की दुर्भाग्यपूर्ण राजनीति का तकाजा ही यही है कि निशाना कहीं हो और निगाहें कहीं। इसलिए ऐसे संदेह व्यक्त करना या आरोप लगाना वर्तमान राजनीति में कोई खास बात नहीं रह गई है। घटना से संबंधित कुछ बातें भी ऐसी हो जाती हैं जो संदेह व आरोपों को ‘ऑक्सीजन’ प्रदान कर देती हैं। उदाहरण के तौर पर बेनजीर की सुरक्षा में कमी का जिम्मेदार कौन? सुरक्षा में चौकसी न बरत पाने व लापरवाही का जिम्मेदार कौन? हादसे के तुरन्त बाद घटनास्थल पर फायर ब्रिगेड की गाडियों का प्रयोग कर पानी की मोटी धार मारकर सफाई करा दी गई। संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि यह घटनास्थल से सुबूत मिटाने की कोशिश है। हादसे के बाद पहली खबरें थीं कि बेगम की हत्या उनके सिर व गर्दन में गोलियां लगने से हुई। गोलियों की संख्या भी पांच तक बता दी गई थी। 30 घंटे बाद पाकिस्तान के आधिकारिक सूत्रों ने घोषणा की कि बेनजीर की हत्या गोली लगने से नहीं बल्कि सिर में चोट लगने के कारण हुई है अर्थात् उन्हें गोली लगी ही नहीं। बेनजीर की लाश को पोस्टमार्टम किए बिना दफ्न कर दिया गया। इस विषय पर यह कहा जा रहा है कि बेगम बेनजीर के पति आसिफ जरदारी ने बेगम के शरीर का पोस्टमार्टम न किए जाने का निवेदन किया था जिसके कारण सरकारी तंत्रों ने लाश का पोस्टमार्टम नहीं कराया। इस घटनाक्रम को भी संदेह की नजर से देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि इसके पीछे भी हत्या के सुबूत मिटाने जैसी एक साजिश हो सकती है।
परन्तु इन सभी आरोपों व संदेहों के बावजूद बिल्कुल स्पष्ट है कि बेनजीर भुट्टो को तालिबानी विचारधारा फैलाने वाले आतंकवाद ने ही निशाना बनाया है और चेतावनी देकर निशाना बनाया है। इसका सबसे बडा सुबूत यह है कि बेगम बेनजीर पर उसी दिन हमला कर दिया गया था जिस दिन उन्होंने पाकिस्तान की धरती पर 8 वर्षों बाद अपने कदम रखे थे। इस हमले में बेशक बेनजीर भुट्टो बाल-बाल बच गईं थीं परन्तु 135 लोग इस आत्मघाती हमले में मारे गए थे। इतनी बडी संख्या में लोगों के हताहत होने से हमले की भयावहता व आतंकवादियों के हौसलों का अंदाजा बाआसानी लगाया जा सकता है। इस हमले के बाद बेशक बेगम भुट्टो ने अपनी हिफाजत और बढाने की मांग की थी परन्तु उन्होंने या उनकी पार्टी के किसी नेता ने अथवा किसी अन्य मुशर्रफ विरोधी नेता ने उस हमले के लिए न तो किसी षड्यन्त्र की बात की थी, न ही इसके लिए पाक सेना या सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। फिर आखिर बेनजीर की हत्या के लिए मुशर्रफ को षड्यन्त्र का हिस्सा मानने का अर्थ क्या है?
निश्चित रूप से मुशर्रफ इस समय एक बडे संकट से जूझ रहे हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पाकिस्तान के हालात इस समय इराक व अफगानिस्तान से भी बद्तर हैं। ऐसे में राजनैतिक रूप से मुशर्रफ को घेरने का इससे अच्छा अवसर मुशर्रफ विरोधी नेताओं को और दूसरा कोई नहीं मिल सकता। परन्तु गौर करना होगा कि मुशर्रफ, उनकी सरकार या पाक सेना को बेनजीर भुट्टो की हत्या में षड्यन्त्रकारी बताने वाले स्वयं कहीं एक बडा षड्यन्त्र तो नहीं रच रहे हैं? कहीं यह बढते आतंकवादी हौसलों की तरफ से ध्यान हटाने की कोशिश तो नह की जा रही है? कहीं यह साबित करने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है कि बेगम तालिबानी कट्टरपंथी आतंकवाद का निशाना बनी ही नहीं।
दरअसल लाल मस्जिद से लेकर बेगम भुट्टो की हत्या तक आतंक की एक ही सूरत है और वह है इस्लाम के नाम पर फैलाया जाने वाला आतंकवाद, जिसे हम इस्लाम का तालिबानीकरण करने वालों का नापाक एवं अमानवीय मिशन भी कह सकते हैं। मुशर्रफ ने निःसन्देह भारत के विरुद्घ इसी आतंकवाद को प्रोत्साहित किया था। आज भी वे या तो पाकिस्तान का कोई भी नेता, कश्मीर मिशन में सक्रिय आतंकवादियों को अपना नैतिक समर्थन देने से पीछे नहीं हटता। अफसोस के साथ कहना पडता है स्वयं बेनजीर ने कश्मीर मामले पर इन आतंकवादियों को शह ही दी है, उनका कभी विरोध नहीं किया। परन्तु अब जब पाक शासकों का यह आतंकवाद रूपी अजगर अपने बिल से बाहर निकल चुका है तथा पाकिस्तान की फिजाओं में जहर घोलने लगा है, ऐसे में यह भी दूसरा सत्य है कि मुशर्रफ उसी आतंकवाद के सबसे बडे दुश्मन के रूप में कमर कस चुके हैं। बेनजीर भुट्टो भी आतंकवाद के विस्तार तथा इस कारण पाकिस्तान की विश्व भर में हो रही फजीहत से पूरी तरह वाकिफ थीं। उनका रुख भी पिछले कुछ समय से पूरी तरह आतंकवाद विरोधी था। उन्होंने अपनी सभाओं में आतंकवादी विचारधारा फैलाने की जड समझे जाने वाले कट्टरपंथियों के मदरसों को भी सीधे तौर पर निशाना बनाना शुरु कर दिया था।
हकीकत तो यह है कि बेनजीर चाहे पूरी दुनिया की चहेती नेता क्यों न रही हों परन्तु वे कट्टरपंथी मुसलमान जो एक औरत को बेपर्दा देखना ही नहीं चाहते, वे बेगम भुट्टो को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री स्वीकार करते भी हिचकिचाते थे। इन शक्तियों ने तो पाक संसद में बेनजीर के विरुद्घ बाकायदा एक प्रस्ताव भी रखा था जिसमें मुस्लिम महिला को एक इस्लामी देश का प्रधानमंत्री न स्वीकार करने की बात कही गई थी। उस समय उदारवादी बहुमत ने कट्टरपंथियों के इस प्रस्ताव को धूल चटा दी थी। उसके बाद बेनजीर की लोकप्रियता आम पाकिस्तानियों के बीच बढती गई। यहां तक कि ‘बेनजीर को पाकिस्तान की तकदीर’ कहा जाने लगा। पाकिस्तान के वर्तमान राजनैतिक हालात भी कुछ ऐसी आहट दे रहे थे कि संभवतः बेनजीर ही पाकिस्तान की अगली प्रधानमंत्री बनेंगी। ऐसे में तालिबानी विचारधारा रखने वाले कट्टरपंथी इस्लाम के अलम्बरदार आखिर यह कैसे बर्दाश्त कर पाते कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री दोनों ही पदों पर ऐसे व्यक्ति आसीन हो जाएं जो उनकी जहरीली विचारधारा के दुश्मन हों? यही कारण था जिसने बेनजीर को शहादत की दहलीज तक पहुंचा दिया। संकट के इस दौर में भारत सहित पूरे विश्व की सहानुभूति पाकिस्तानी अवाम के साथ है। परन्तु इस्लाम के नाम पर फैल रहे इस जहरीले आतंकवाद से पाक अवाम को स्वयं ही जूझना होगा। इससे जूझने का उपाय केवल हथियार ही नहीं हैं। इस विचारधारा से स्वयं को दूर रखना, दूसरों को दूर रहने की सलाह देना, सामाजिक स्तर पर इस विचारधारा से जुडे लोगों का बहिष्कार करना भी इसके उपाय में शामिल है। पाकिस्तान के मुस्लिम भाईयों को यह समझना होगा कि इस्लाम के संरक्षक बनकर इन्हींअ तालिबानियों ने इस्लाम को आतंकवाद का पर्याय बनाकर रख दिया है। पाकिस्तानी भाईयों को याद रखना चाहिए कि सत्य वह नहीं है जो आतंकवादी लुक छुप कर बोल रहे हैं। सत्य हमेशा वह है जो सिर चढ कर बोलता है। जैसा कि बेनजीर का सत्य बोला। आतंकवाद का विरोध करने जैसा सत्य, कट्टरपंथी मदरसों की मुखालफत करने जैसा सत्य। बेशक सत्य बातें कट्टरपंथियों को अच्छी नहीं लगीं परन्तु बेनजीर ने जिस प्रकार सत्य को मुखरित करते हुए अपनी अमूल्य शहादत दी है, वह इस्लामी जगत के लिए एक बेनजीर शहादत साबित होगी। तनवीर जाफरी - tanveerjafri1@gmail.com
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