Sunday 12 Feb 2012 Sign In   New Member: Sign Up  RSS


Home > Article >> Editorial
भाजपा या झगडपा

09 Oct 2006      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

Dr B R Joshi

 इन दिनों प्रदेश भाजपा के सितारे गर्दिश में हैं। भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्त समाज की परिकल्पना को साकार करने वाली पार्टी अपनी अन्तर्कलह से परेशान ही नहीं हतप्रभ भी है। भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ इसकी आवाज जितनी बुलंद थी आज घर के संकट में इन्हीं तीनों की उपस्थिति से वह मन्द से बन्द की ओर अग्रसर है।
प्रदेश भाजपा के मुखिया इन दिनों डाँ. महेश शर्मा हैं। वे छल, छन्द् और उठापटक की राजनीति से परे 'मिस्टर क्लीन' की छवि वाले नेताओं में अग्रणी हैं। पर उनकी नेतृत्व क्षमता की असफलता भाजपा बोर्डों के भंग होने के अलावा सत्ता व संगठन के तालमेल को ठीक नहीं बैठा पाने के अतिरिक्त अपने विधायकों, मंत्रियों और कार्यकर्ताओं को 'पार्टी लाइन' पर न ला पाने की क्षमता में स्पष्ट देखी जा सकती हैं। वे बौद्धिक हैं पर चतुर सुजान नहीं] वे सैद्धान्तिक हैं] पर व्यावाहारिक, नहीं वे पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ता हैं, पर पार्टी व कार्यकर्ता उनके लिए समर्पित नहीं। उनके द्वारा प्रदेश भाजपा प्रमुख का पद सम्हालने के बाद पार्टी में  अनुशासनहीनता की एक अविराम श्रंखला आरम्भ हो गई है। जिसे आए दिन हम देखते, पढते और सुनते रहते हैं। वे सरल हैं  , पर राजनीति जटिल है वे मार्मिक हैं ,  पर राजनीति निर्मम। अत: अनुशासनहीनता इन दिनों अपने परवान पर है।
हालात यह है कि नगरपालिका के चुनाव से लेकर जिले व प्रदेश के शीर्ष पदों के चुनाव में मारपीट या हिंसक वारदाते मानो चुनावी प्रकिया  का अनिवार्य हिस्सा हो गई है। प्रदेश की प्रमुख मौन है लाचार भी। वे चाहते हुए भी कुछ न कर पाने की व्यथा से दु:खी है । उनकी हालात तो इस तरह कि उन्हें न मन का चैन है और न दूसरों को उनसे आराम पर 'कहाँ जाय का करि' वाली उक्ति इन दिनों उन पर चरितार्थ हो रही है।
सरकार के तीन वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। संगठन और सत्ता तीन वर्ष में पास आने बजाए एक-दूसरे से दूर ही हुए हैं। यह शुभ संकेत नहीं है । यह तो गनीमत है कि इधर विपक्ष की मुद्रा व रणनीति उतनी आक्रमक नहीं है जितनी होनी चाहिए अन्यथा तो पार्टी अब तक बद से बदत्तर हालत में जा चुकी होती। कांग्रेस के मुखिया इन दिनों 'महयम मार्ग' पर हैं। वे गांधीवादी मूल्यों के संवाहक हैं। इसलिए वे भाजपा के जले पर अधिक-अधिक नमक लगाने के 'मूड' में नहीं हैं। प्रदेश की राजनीति मौन है,  आवाम् हैरान है, लोग अनिर्णय की स्थिति में हैं।
भाजपा के लिए समय रहते आपसी कलह व अंदरुनी उठापटक की संकीर्ण नीति का त्याग करना अनिवार्य हो गया है। अन्यथा जिस प्रकार गेंहू को घुन लग जाता है। वैसे ही ये निजी स्वार्थों के कीडे और आपसी झगडे पार्टी को टुकडो के कगार पर ले आएंगे। झगडों की लम्बी सूची ने भाजपा को 'झगडालूओं की पार्टी' के रुप में स्थापित करना शुरु कर दिया हैं। झगडा घर, परिवार व समाज को नष्ट करता हैं। अत: संगठन के शीर्ष व विचारवान लोगों को चाहिए कि वे भाजपा को भाजपा ही रहने दें झगडपा यानी झगडा पार्टी न बनाए। इसी में सत्ता, संगठन और समाज(भाजपा) की भलाई हैं।
सम्पादक
डॉ ब्रजरतन जोशी
 
 




 Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 




Post your resume

Latest Articles
» 

» 

» 

» 

» 


Articles By Writers Most Read Articles
» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 


Jain Calendar Launched at Terapanth Bhawan, Gangasahar
More Photo

Download Trial of Jewellery Accounting Software

Insight : 
Home | Business | Entertainment | Celebrity | Sports | Education | Health | Sci-Tech | National | World | Article | Photo Gallery | Video Gallery | E-card | Forums | Camel Festival | Vartmaan Sahitya | Nagar Ek - Nazaare Anek
Company : 
About Us | Feedback | Advertise with us | Terms of use | Privacy Policy | Archives | Site Map | Can't See Hindi? | News Ticker | RSS
Our Network : 
RajB2B.com
UniqueIdea.net
PelagianDictionary.com
PelagianSoftwares.com
HindiNotes.com
Follow us on : 
         
Copyright @ 2010 Natraj Infosys All rights reserved