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14
Jan
भाषा प्रौद्यौगिकी पर भी गौर करें
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dr_b_r_joshiमानव निर्मित सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भाषा की अहम भूमिका है। अन सभी क्षेत्रों के कार्य व्यवहार को संपूर्ण प्रतिनिधित्व देते हुए भाषा अपना बहुआयामी व्यक्तित्व गढती है। इस प्रक्रिया में भाषा स्वयं संस्कारित, परिष्कृत और परिवर्धित होती है। उसका लचीला व्यवहार उसे नये परिवेश में नये आयाम स्थापित करने की शक्ति देता है। अगर भाषा अपने व्यवहार में ऐसा परिवर्तन न लाए तो ही वह ’’भाषाई ब्लैक होल‘‘ का ग्रास बनने से बच जाती है। अंग्रेजी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
इस प्रौद्यौगिकी बहुत समय में भाषा के सामने भी अनेक जटिल चुनौतियाँ मुँह बांए खडी है। उसका पहला लक्ष्य है अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं एवं विघ्नों का शीघ्र निस्पादन यह काम भाषा नहीं करेगी वरन् यह दायित्व भाषा के प्रयोगकर्ता का है कि वह अपनी भाषा के लिए कुछ करें। उदाहरण के तौर पर अंग्रेजी व इस इलेक्ट्रोनिक युग के समय में जीवन जी रहे अमेरिकियों की अंग्रेजी में कितना बदलाव आया है।
अतः अस प्रौद्यौगिकी बहुत समय में हमें प्रौधौगिकी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर  चलना होगा। २० सदी के छठवें दशक में  “Structure of Fechnical English By : A.J.Herbev”    की पुस्तक हमारे लिए आदर्श हो सकती है जिसमें तकनीकी विषयों से जुडी संज्ञा, क्रिया, विवेचन शब्द पद विन्यास वाक्य विन्यास आदि का संदर्भगत अध्ययन प्रस्तुत कर उसे विश्लेषित करने का प्रयास भी किया गया।
असल में हिन्दी में इस संबंध में जो काम हुए हैं वे अंग्रेजी से अनुवाद होकर आए है। लेकिन स्वयं हिन्दी को एक तकनीकी भाषा के रूप में समझना और स्थापित करना एक अलायदा बात है। यानी अब हमें भाषा को तकनीक की राह पर प्रौद्यौगिकी बनने की ओर ले जाना है। पारिभाषिक कोश, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दालियों की व्यावहारिकता को लेकर आए दिन परिद्श्य में विचार विमर्श होता रहता है। लेकिन इतना अवश्य ही कहा जा सकता है कि इन सब प्रयासों के बावझूद हिन्दी स्वयं एक तकनीक बनकर उभर नहीं सकी है।
हालांकि माननीय उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय इस राह में हमारी प्रयोजनशीलता को गति देने के वाला साबित हुआ है। उच्चतम न्यायलय ने अपने एक फैसले में उन नियुक्त को हराने का निर्देश देना पडा। जिनमें वैध के साथ तकनीकी शब्दावली आयोक की तकनीकी शब्दावली हटाएं ः सुप्रीम कोर्ट, एम. खबर, नवभारत, नागपुर (तारीख १२-०९-२००४ पृ. सं. १२)
अतः समय रहते हमें हिन्दी के अध्ययन अध्यापन को प्रौद्यौगिकी के रूप में देखते हुए काम करना होगा। इस दिशा में महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रयास सराहनीय कहे जा सकते हैं। सरकारी एवं गैर-सरकारी स्तर पर कुछ साफ्टवेयर पर भी हिन्दी में आये है और आ रहे हैं। देश के आई.आई.टी. संस्थान इस दिशा में विशेष काम कर रहे है।




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