Home > Article >> Hindu Fast and Festival | भीमाष्टमी
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18 Aug 2008 Add comment Mail
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कहतेहै कि माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भीष्म पितामह ने अपने शरीर को छोडा था । इसलिए इस दिन उनका निर्वाण दिन है । जो भीमाष्टमी के रूप में मनाया जाता है । इस दिन भीष्म पितामह के निमित्त तिलो के साथ तर्पण तथा श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को सन्तान प्राप्त होती हैं ।
कथाः भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था । वह शान्तनु की पटरानी गंगा की कोख से उत्पन्न हुए थे । एक बार राजा शान्तनु शिकार खेलते खेलते गंगा के तट पार चले गए । लौटते समय नाव उनकी भेट हरिदास केवट की पुत्र मत्स्य गधा से होती है । वे उसके रूप लावण्य पर मधु हो जाते है । राजा शान्तनु हरिदास से उसका अपने लिए हाथ माँगते है परन्तु वह राजा के प्रस्ताव को ठुकरा देता है कि ”महाराज आपका ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत है । जो राज्य का उत्तराधिकारी है यदि आप मेरी कन्या के पुत्र को राज्य उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा करे तो मैं तैयार हूँ । शान्तनु ने इस बात को मानने से मना कर दिया परन्तु मत्स्य गंधा को न भूला सके । उसकी याद म व्याकुल रहने लगे । एक दिन देवव्रत ने उनसे व्याकुलता का कारण पूछा । सारा वृतान्त ज्ञान हने पर देवव्रत स्वय केवट हरिदास के पास गये और गंगाजल हाथ में लेकर शपथ ली कि मैं आजीवन अविवाहित रहूगा । इसी कठिन प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम भीष्म पितामह पडा । राजा शान्तनु ने देवव्रत से प्रसन्न होकर उसे इच्छित मृत्यु का वरदान दिया।
कौरव पाण्डव युद्ध में दुर्योधन ने अपनी हार होती देख भीष्म पितामह पर सन्देह व्यक्त करते हुए कहा कि आप अधूरे मन से युद्ध कर रहे है । आपका मन पाण्डवो की तरफ है । भीष्म यह सुनकर बडे दुःखी हुए तथा ” आज जौ हरिहि न शस्त्र गहाऊँ“ ऐसी प्रतिज्ञा की । तत्पश्चात् घमासान युद्ध हुआ । भगवान श्रीकृष्ण को भीष्म प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र को हाथ मे उठाना पडा । भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा भंग होते ही भीष्म पितामह युद्ध बन्द करके शरशैया पर लेट गये।
महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर जब सुर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हुए तब भीष्म पितामह ने अपना शरीर त्याग दिया । इसलिए माघ शुक्ल अष्टमी उनकी पावन स्मृति में उत्सव के रूप में मनाते है ।
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| | | Comments to this Article | | KAFI ACHHA HE , HEENA PAREEK (2009-08-31 18:19:55) | |
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